Tuesday, June 25, 2019

हात्मा गांधी की समाधि : राजघाट


स्वतंत्रता दिवस के मौके पर राजघाट पर महात्मा गांधी की समाधि पर श्रद्धांजलि दी जाती है। भारत की आजादी में महात्मा गांधी का बड़ा योगदान था। राजघाट वो जगह है जहां महात्मा गांधी की समाधि बनाई गई है। 2 अक्टूबर को प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक देश के बड़े नेता यहां बापू को श्रद्धांजलि देने आते हैं।
  • महात्मा गांधी की समाधि काले पत्थर से बनाई गई है जिस स्थान पर यह समाधि बनाई है वहीं महात्मा गांधी का अंतिम संस्कार किया गया था। इस समाधि के साथ में ही एक ज्योति हमेशा जलती रहती है।
  • राजघाट दिल्ली में यमुना नदी के किनारे स्थित है यहां दो संग्रहालय है जो आपको पुराने समय में वापस ले जाएंगे अगर आप राजघाट जा रहे हैं तो इन संग्रहालय को भी देखने जरूर जाएं। यह संग्रहालय आपको भारत की आजादी से जुड़े प्रत्येक पहलू से रूबरू कराएंगे।
  • राजघाट एक बडे़ क्षेत्र में फैला है यहां दुनिया की कई बड़ी हस्तियों ने पेड़ लगाए हैं जिसमें क्वीन एलिजाबेथ-2, अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहावर और वियतनाम के बड़े नेता हो-ची-मिन शामिल हैं।
  • राजघाट में महात्मा गांधी की समाधि के अलावा देश के दूसरे बड़े नेताओं की समाधि भी है। राजघाट के उत्तर में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की समाधि शांतिवन स्थित है।
  • भारत के प्रधानमंत्री रजीव गांधी की समाधि भी राजघाट के उत्तर में स्थित है। राजीव गांधी की 1991 में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
  • राजघाट के पास ही के आर नारायण मेमोरियल एकता स्थल, लाल बहादुर शास्त्री का मेमोरियल शक्ति स्थल भी स्थित है।


Saturday, June 22, 2019

रानी की वाव

रानी की वाव भारत के गुजरात राज्य के पाटण में स्थित प्रसिद्ध बावड़ी (सीढ़ीदार कुआँ) है। इस चित्र को जुलाई 2018 में RBI द्वारा रु. 100 के नोट पर चित्रित किया गया है तथा 22 जून 2014 को इसे यूनेस्को के विश्व विरासत स्थल में सम्मिलित किया गया। 

पाटण को पहले 'अन्हिलपुर' के नाम से जाना जाता था, जो गुजरात की पूर्व राजधानी थी। कहते हैं कि रानी की वाव (बावड़ी) वर्ष 1063 में सोलंकी शासन के राजा भीमदेव प्रथम की प्रेमिल स्‍मृति में उनकी पत्नी रानी उदयामति ने बनवाया था। रानी उदयमति जूनागढ़ के चूड़ासमा शासक रा' खेंगार की पुत्री थीं। सोलंकी राजवंश के संस्‍थापक मूलराज थे। सीढ़ी युक्‍त बावड़ी में कभी सरस्वती नदी के जल के कारण गाद भर गया था। यह वाव 64 मीटर लंबा, 20 मीटर चौड़ा तथा 27 मीटर गहरा है। यह भारत में अपनी तरह का अनूठा वाव है। 


वाव के खंभे सोलंकी वंश और उनके वास्तुकला के चमत्कार के समय में ले जाते हैं। वाव की दीवारों और स्तंभों पर अधिकांश नक्काशियां, राम, वामन, महिषासुरमर्दिनी, कल्कि, आदि जैसे अवतारों के विभिन्न रूपों में भगवान विष्णु को समर्पित हैं। 

'रानी की वाव' को विश्व विरासत की नई सूची में शामिल किए जाने का औपचारिक ऐलान कर दिया गया है। 11वीं सदी में निर्मित इस वाव को यूनेस्को की विश्व विरासत समिति ने भारत में स्थित सभी बावड़ी या वाव (स्टेपवेल) की रानी का भी खिताब दिया है। इसे जल प्रबंधन प्रणाली में भूजल संसाधनों के उपयोग की तकनीक का बेहतरीन उदाहरण माना है। 11वीं सदी का भारतीय भूमिगत वास्तु संरचना का अनूठे प्रकार का सबसे विकसित एवं व्यापक उदाहरण है यह, जो भारत में वाव निर्माण के विकास की गाथा दर्शाता है। सात मंजिला यह वाव मारू-गुर्जर शैली का साक्ष्य है। ये करीब सात शताब्दी तक सरस्वती नदी के लापता होने के बाद गाद में दबी हुई थी। इसे भारतीय पुरातत्व सर्वे ने वापस खोजा। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने सायआर्क और स्कॉटिस टेन के सहयोग से वाव के दस्तावेजों का डिजिटलाइजेशन भी कर लिया है। 

20 जुलाई 2018 को RBI द्वारा प्रस्तावित 100 रु. के नए नोट पर इस विरासत को प्रदर्शित किया गया है।

Friday, June 21, 2019

भारत की प्रथम महिला विमान चालक

लाहौर हवाई अड्डा और साल 1936| इक्कीस वर्षीया सरला ठकराल ने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया और जा बैठीं जिप्सी मॉथ नामक दो सीटों वाले विमान में| आँखों पर चश्मा चढ़ाया और ले उड़ीं उसे आकाश में| 


इस तरह वो भारत की पहली महिला विमान चालक बनीं| सरला ठकराल ने 1929 में दिल्ली में खोले गए फ़्लाइंग क्लब में विमान चालन की ट्रेनिंग ली थी और एक हज़ार घंटे का अनुभव बटोरा था| वहीं उनकी भेंट अपने भावी पति से हुई| शादी के बाद उनके पति ने उन्हें व्यावसायिक विमान चालक बनने के लिए प्रोत्साहन दिया| 

सरला ठकराल जोधपुर फ्लाइंग क्लब में ट्रेनिंग लेने लगीं| 1939 में एक विमान दुर्घटना में उनके पति मारे गए| फिर दूसरा विश्व युद्ध छिड़ गया और जोधपुर क्लब बंद हो गया| उसके बाद उन्होंने अपने जीवन की दिशा बदल ली| 

उनके माता-पिता ने उनका दूसरा विवाह किया और वो विभाजन के बाद लाहौर से दिल्ली आ गईं| 

Thursday, June 20, 2019

अरावली

अरावली भारत के पश्चिमी भाग राजस्थान में स्थित एक पर्वतमाला है। भारत की भौगोलिक संरचना में अरावली प्राचीनतम पर्वत है। यह संसार की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला है जो राजस्थान को उत्तर से दक्षिण दो भागों में बांटती है। अरावली का सर्वोच्च पर्वत शिखर सिरोही जिले में गुरुशिखर (1722 /1727 मी.) है, जो माउंट आबू(सिरोही) में है। 


अरावली पर्वत श्रंखला की कुल लम्बाई गुजरात से दिल्ली तक लगभग 800 किलीमीटर है, अरावली पर्वत श्रंखला का लगभग ८० % विस्तार राजस्थान में है, दिल्ली में स्थित राष्ट्रपति भवन रायसीना की पहाड़ी पर बना हुआ है जो अरावली पर्वत श्रंखला का ही भाग है, अरावली की औसत ऊंचाई ९३० मीटर है तथा अरावली के दक्षिण की ऊंचाई व चौड़ाई सर्वाधिक है, अरावली या अर्वली उत्तर भारतीय पर्वतमाला है। राजस्थान राज्य के पूर्वोत्तर क्षेत्र से गुज़रती 550 किलोमीटर लम्बी इस पर्वतमाला की कुछ चट्टानी पहाड़ियाँ दिल्ली के दक्षिण हिस्से तक चली गई हैं। शिखरों एवं कटकों की श्रृखलाएँ, जिनका फैलाव 10 से 100 किलोमीटर है, सामान्यत: 300 से 900 मीटर ऊँची हैं। यह पर्वतमाला, दो भागों में विभाजित है- सांभर-सिरोही पर्वतमाला- जिसमें माउण्ट आबू के गुरु शिखर (अरावली पर्वतमाला का शिखर, ऊँचाई (1,722 मीटर ) में और (5649.606 फ़ीट ) सहित अधिकतर ऊँचे पर्वत हैं। सांभर-खेतरी पर्वतमाला- जिसमें तीन विच्छिन्न कटकीय क्षेत्र आते हैं। अरावली पर्वतमाला प्राकृतिक संसाधनों (एवं खनिज़) से परिपूर्ण है और पश्चिमी मरुस्थल के विस्तार को रोकने का कार्य करती है। अरावली पर्वत का पश्चिमी भाग मारवाड़ एवं पूर्वी भाग मेवाड़ कहलाता है। यहां अनेक प्रमुख नदियों- बनास, लूनी, साखी एवं साबरमती का उदगम स्थल है। इस पर्वतमाला में केवल दक्षिणी क्षेत्र में सघन वन हैं, अन्यथा अधिकांश क्षेत्रों में यह विरल, रेतीली एवं पथरीली (गुलाबी रंग के स्फ़टिक) है। 

अरावली की अन्य उच्च चोटियां:- १ गुरु शिखर - सिरोही (1722 m) २ सेर - सिरोही (1597m) ३ दिलवाडा - सिरोही( इसे हाल ही में जोड़ा गया है, इसी पर्वत पर प्रसिद्ध जैन मंदिर स्थित हैं). (1442m) ४ जरगा - उदयपुर. (1431m) ५ अचलगढ - सिरोही (1380m) 6 रघुनाथगढ(1055 m) - सीकर ७ खो(920) - जयपुर ८ तारागढ - अजमेर (870 m) ९ भेराच - अलवर

Tuesday, June 18, 2019

मशीन लर्निंग क्या है?


मूल रूप से मशीन लर्निंग एक प्रकार का एल्गोरिथम है जो किसी सॉफ्टवेयर को सही रूप से चलाने में मदद करता है। इसके लिए वह यूजर द्वारा देखे गए कुछ परिणामों के आधार पर एक नमूना तैयार करता है और उस नमूने के आधार पर भावी पूछे जाने वाले प्रश्नों के पैटर्न को तैयार कर लेता है।
इस प्रकार कम्प्यूटर मानव मस्तिष्क की भांति सोचने और कार्य करने की क्षमता प्राप्त कर लेते हैं जिसमें समय के साथ निरंतर विकास होता रहता है।
मशीन लर्निंग को आर्टिफ़िशियल इंटेललिजेंस का उपयोग या एप्लिकेशन भी माना जाता है। इसके अंतर्गत एक विचार के माध्यम से आंकड़ों को डिजिटल डिवाइस तक इस प्रकार पहुंचाया जाता है जिससे वो स्वयं ही काम करना सीख लें।
मशीन लर्निंग कैसे करती है काम ?
मशीन लर्निंग के काम करने के तरीके को समझने के लिए इसके प्रकार को समझना बहुत जरूरी है। सामान्य रूप से मशीन लर्निंग एल्गोरिथम सामान्य रूप में दो प्रकार के होते हैं :

निरीक्षित एल्गोरिथम (Supervised Algorithm)
मशीन लर्निंग के इन दोनों प्रकार के एल्गोरिथ्म के लिए अलग-अलग प्रकार के विशेषज्ञ की ज़रूरत होती है। निरीक्षित या सुपरवाइज्ड एल्गोरिथ्म के निर्माण का काम डेटा विशेषज्ञ और विश्लेषक या एनेलिस्ट के द्वारा किया जाता है। इन लोगों को मशीन लर्निंग तकनीक का सम्पूर्ण ज्ञान होता है और मशीन को सही ढंग से काम करने के लिए प्रोग्राम तैयार करता है। डेटा विशेषज्ञ का मुख्य विशेष रूप से देखते हैं कि इस एल्गोरिथ्म के निर्माण के लिए किस वैरिएयब्ल और फीचर का प्रयोग किया जाना चाहिए। इस निर्माण के पूरा होते ही यह एल्गोरिथ्म नए डेटा पर स्वयं ही लागू हो जाती है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि निरीक्षित एल्गोरिथ्म का निर्माण डेटा विशेषज्ञ की देख-रेख या निगरानी में होता है।
अनिरीक्षित एल्गोरिथम (Unsupervised Algorithm)
इस एल्गोरिथ्म के निर्माण के लिए विशेष निरीक्षण या प्रशिक्षण की जरूरत नहीं होती है। इसके निर्माण में जिस तकनीक का प्रयोग किया उसे इंटरेटिव एप्रोच या डीप लर्निंग कहा जाता है। इस एल्गोरिथ्म को नियुरल नेटवर्क्स के नाम से भी जाना जाता है। मुख्य रूप से यह तकनीक जटिल प्रोसेसिंग जैसे इमेज रेकीगनेशन, स्पीच तो टेक्स्ट और नैचुरल लैंगवेज़ जैनरेशन आदि क्षेत्रों में काम आती है। इस प्रकार के नियुरल नेटवर्क्र्स लाखों प्रशिक्षित डेटा को अपने आप जोड़कर वेरिएबल के साथ संबंध बना लेते हैं।
यह डेटा प्रशिक्षित होते ही नया डेटा सरलता से एल्गोरिथ्म का प्रयोग करते हुए काम करता है और नए डेटा को इंटरप्रेट भी सरलता से कर देता है।  इस एल्गोरिथ्म में बिग डेटा का भी इस्तेमाल होता है क्योंकि इसके निर्माण के लिए बड़ी मात्रा में डेटा की आवश्यकता होती है।
मशीन लर्निंग एल्गोरिथ्म कितने प्रकार के होते हैं:
सामान्य रूप से मशीन लर्निंग एल्गोरिथ्म निम्न प्रकार के हो सकते हैं:
डीसीजन ट्री :
एल्गोरिथ्म की इस तकनीक में इसे प्रभावी ढंग से काम करने के लिए एक विशेष प्रकार के वैरिएयबल को ढूंढा जाता है।
के मीन्स क्ल्स्ट्रींग:
इस तकनीक में विशिष्ट प्रकार के डेटा का समूहिकारण करके सम्पूर्ण डेटा को व्यवस्थित कर दिया जाता है।
नियुरल नेटवर्क्स:
इस तकनीक में एल्गोरिथ्म के निर्माण के लिए प्रशिक्षित डेटा का प्रयोग करते हुए उनमें परस्पर संबंध स्थापित किया जाता है। इस प्रकार डेटा इस प्रकार से व्यवस्थित किया जाता है जिससे यह बाद में इनकमिंग डेटा को भी समूहों में विभाजित करके सारे डेटा को अच्छी प्रकार से दिखाता है।
मशीन लर्निंग का उपयोग कहाँ किया जा सकता है:
फेसबुक न्यूज फीड और मोबाइल एप के अतिरिक्त मशीन लर्निंग का उपयोग बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। जैसे ऑनलाइन शॉपिंग करते समय वेबसाइट पर लेंड करते ही जो आप विज्ञापन देखते हैं, वो मशीन लर्निंग तकनीक का ही कमाल है।
इसके अलावा मशीन लर्निंग का उपयोग ऑनलाइन धोखा-धड़ी को पकड़ने, स्पैम फिल्टर करने, थ्रेट पकड़ना और नेटवर्क सिक्यूरिटी के क्षेत्र में भी किया जाता है।
इसी प्रकार सभी ऑनलाइन सेल वाली वेबसाइट में कस्टमर प्रबंधन, व्यावसायिक इंटेलिजेंस के सॉफ्टवेयर में भी मशीन लर्निंग तकनीक का इस्तेमाल होता है। मानव संसाधन एवं प्रबंधन क्षेत्र में भी कर्मचारियों के काम और विशेषज्ञता के आधार पर छंटनी करने के लिए मशीन लर्निंग तकनीक का ही उपयोग किया जाता है।
सेल्फ ड्राईविंग कारों और वर्चुअल असिस्टेंट टेक्नोलोजी में भी मशीन लर्निंग तकनीक का ही उपयोग किया जाता है।
भविष्य में मशीन लर्निंग का उपयोग अधिकतम  चीजों में किए जाने की संभावना है जिसमें आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का रोल बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।