Monday, September 25, 2017

दुनियामें मसाला उत्पादनमें भारत 70% योगदान !!


मसाले का इस्तेमाल हर कोई गृहिणी करती है, क्या आप जानते है? विश्व में 70% मसाले का उत्पादन भारत कर रहा है। हींग, लाल मिर्च, इलायची, सफेद मिर्च, काली मिर्च, काला जीरा, दालचीनी, लौंग, धनिया, सौंफ, मेथी, गरम मसाला, लहसुन, अदरक, आंवला, लंबी काली मिर्च, राई, सूखे जायफल, खसखस, तिल के बीज, केसर, इमली, पुदीना, हल्दी, सूखे मिर्च, आदि विभिन्न प्रकार के मसाले की खेती व्यापक रूप से भारतके अलग अलग राज्यों में हो रही है। 2010 से भारत विश्व मसाला उत्पादन के क्षेत्र में सबसे आगे है। 

भारतमें सब जगह मसाला का उत्पादन होता है पर सबसे ज्यादा उत्पादन केरल तथा आंध्रप्रदेश में किया जाता है जिसकी मांग यूरोप तक रहती है। केरल को ‘मसाले का बगीचा’ से जाना जाता है; वहा पर मसाला अनुसंधान संस्था भी है। हरियाणा तथा हिमाचल लहसुन और अदरक के उत्पादनमे सबसे अव्वल राज्य है। भारतमें सब प्रकार के मसाला प्राप्त होने के कारण उसे ‘मसाला का घर’ से जाना जाता है। 


मसाला का उत्पादन में भारत विश्व भर में पहचान बनाई है; इसके लाभ से भारतकी गृहिणी के लिए एक रोजगारी की तक पैदा हुई जो मसाला का उत्पादन करके सभी जगह बिकने का कारोबार चला रही है। यह उद्योग भारत का सबसे सफल उद्योग साबित हुआ है क्युकी दुनिया का तमाम प्रकार का मसाला भारतमें मिलाता है जहाँ भारत मसाला अधिक से अधिक निकास करता देश है।

 

 


Thursday, September 21, 2017

प्राकृतिक रबर कैसे तैयार किया जाता है???


कुदरती रबर क्या है?

प्राकृतिक रबर एक आइसोप्रीन का प्रकार है वे भौतिक तथा रासायनिक गुण प्रदर्शित करता है; यह पेड़ या लताओं में से निकले रबरक्षीर से बनता है जो दूध जिसे लेटेक्स कहा जाता है। सबसे अधिक रबर हैविया ब्राजीलिएन्सिस से प्राप्त होता है। यह अमेरिका के अमेजन नदी के जंगलो में उगता है अब भारत के कोचीन, मैसूर शहर में भी इसकी खेती होती है। रबर का वृक्ष पांच साल का होने पर रबर देना शुरू करता है तथा ४० वर्षो तक रबर निकालता है।
रबर बनाने की प्रकिया:
रबर मुख्यत्वे पेड़ो के छेवने, उसके काटने से निकाला जाता है यह पानी से भी हल्का होता है इसमें रेजिन, शर्करा, प्रोटीन, खनिज जैसे प्रदाथ रहेते है। रबर को तिन तरीके से तैयार किया जाता है; पहला रबर का स्कंदन होता है जहा उसे मिट्टी के गड्ढे में गाड़ दिया जाता है। जिसमे पानी मिलाकर रबर गड्ढे रुप में एकत्रित रह जाता है। दूसरा जो पेड़ पर ही उसका स्कंदन किया जाता है जिसमे पानी सुखकर निकल जाता है ओर रबर जमा हो जाता है। तीसरा धुआ से स्कंदन किया जाता है जिसमे काठ के पात्र में रबर रखकर धुए के घर में रख देते है। जिसमे रबर पीला और द्रढ बन जाता है उस पर दूसरा स्तर जमा करके ‘पारा रबर’ प्राप्त किया जाता है।
रबर की विशेषता:
रबर में न रंग होता है न गंध यह पारदर्शक होता है बैक्टीरिया के कारण उसका रंग पिला हो जाता है। इसका वैद्युत गुण उत्तम होता है, तथा वल्कनिकरण और जीर्णन से रबर घट हो जाता है। शुद्ध रबर कठिनता से प्रपात होता है। कच्चे रबर में भौतिक या यांत्रिक बल कम मिलता है। रबर को अधिक उपयोगी बनाने के लिए त्वरक, पूरक, वर्णक, गंधक जैसे तत्वों को मिलाया जाता है।
रबर का उत्पादन तथा उपयोग
रबर का उत्पादन अनिश्चित रहता है मानसून के समय कम रबर प्राप्त होता है। उसका उपयोग जूते, गेंद, गुब्बारे, खिलौनों, ट्यूब, टायर, वोटर प्रूफ कपडे बनाने के लिए किया जाता है। प्राकृतिक रबर और कृत्रीम रबर बहुत ही अलग होता है। रबर का प्रथम उपयोग पेन्सिल के लिखने पर मिटाने के लिए उसका प्रयोग होता था पर आज यह एक व्यवसायिक फसल बन गया है। भारत में रबर व्यापक रूप से पैदा होता है जिससे कही छोटे-छोटे उद्योग रबर की बनी वस्तुए बनाकर रोजगार पैदा करते है।

मिस्र के पिरामिड 

टाइटैनिक जहाज

 






दुधसागर जलप्रपात



गुमाना किसे पसंद नहीं होता किन्तु बारिश में गुमने की मजा ही कुछ ही ओर होती है। वर्षा ऋतू बहुत हो सुहानी ऋतू है चारों ओर प्रकृति की हरी चादर दिखाई देती है; तब हमें पर्वत, नदियाँ, तालाब आदि जगह गुमने का मन होता है।

हमारे देश में कही एसी जगह है जहां कुदरत ने चारों ओर से सुंदरता बक्षी है एसी जगह कही दुर्लभ ही देखने को मिलती है। मानसून के समय हर जगह हरियाली ही दिखाई देती है; तब प्रकृति से अधिक प्रेम करने वालों के लिए दुधसागर जलप्रपात अमूल्य एवं अद्वितीय भेंट है। वहा उसे जलप्रपात का सुंदर नजारा देखने को मिलता है।

दुधसागर जलप्रपात भारत के गोवा तथा कर्णाटक राज्य के बिच माण्डवी नदी पर स्थित है; जो चारों भागों में बिखरा हुआ है। यह जलप्रपात भारत के सबसे ऊंचाई से बहेने वालों में से एक है। जिसकी ऊंचाई 310 मीटर तथा लम्बाई 30 मीटर जितनी है। 


यहाँ जलप्रपात बहुत ही ऊंचाई से नीचे बहता है तब ऐसा लगता है की पहाड़िया में से दूध निकल रहा है; इसीलिए उसे दुधसागर जलप्रपात कहा गया है। मानसून के समय इसको देखने के लिए यहाँ पर्यटक का मेला लगता है क्युकी यहाँ घने जंगल, ऊँचे शिखर सबका मन मोह लेते है। उस समय दुनिया का सबसे सुंदर, अदभुत द्रश्य देखने मिलाता है। 


यह जलप्रपात सह्याद्रि पर्वत माला में स्थित भगवान महावीर अभ्यारण तथा मोलेम राष्ट्रीय उद्यान के बिच संरक्षक क्षेत्र में है। माण्डवी नदी के कारण ही कर्णाटक तथा गोवा की सरहदे अलग होती है। यह गोवा के रमणीय बिच से एकदम दूर अंतराल पहाड़िया विस्तार में स्थित है। यह दुनिया के विशिष्ट जलप्रपात के लिस्ट में सामिल है।

गोवा के इस नयनरम्य जलप्रपात पर कही फिल्मों की शूटिग भी हुई है जैसे चेन्नई एक्सप्रेस। 

Wednesday, September 20, 2017

भेड़ाघाट - धुंआधार जलप्रपात

मध्य प्रदेश का जबलपुर जो नर्मदा नदी के तट पर स्थित एक महत्वपूर्ण शहर है। यह पर्यटन स्थलों में महत्वपूर्ण माना जाता है। जबलपुर जिले में स्थित भेड़ाघाट में संगेमरमर की पहाड़ियों है। इस वजह से उसे संगेमरमर का शहर भी कहा जाता है। 
 
 यहा संगेमरमर की चट्टानों में धुआंधार नामक जलप्रपात बड़ा मनमोहक है, जो पर्यटकों को आकर्षित करता है। इस की उत्पति नर्मदा से होती है। इस प्रपात के गिरने की आवाज दूर-दूर तक सुनी जा सकती है। इसमें नन्ही बुँदे बिखरकर धुंए जेसा दृश्य बनाती है। इसलिए इसे ‘धुआंधार प्रपात’ नाम से जाना जाता है। चांदनी रात में यहा नौकायन करना यादगार पल बन जाता है।



नर्मदा नदी के दोनों तटो पर संगेमरमर की सौ फुट ऊँची चट्टानें भेड़ाघाट की खासियत है। यह सुरम्य पर्यटन स्थल को देखने के लिए हर साल कई प्रवासियो आते है। आजादी पूर्व एक विदेशी टूरिस्ट यहाँ का प्राकृतिक सुंदरता का उल्लेख अपनी पुस्तक में किया था। यह स्थान विदेशी को भी लुभाता है भारत का पूरातत्व द्वारा सरक्षित ‘चोसठ जोगनी मंदिर’ यहाँ पर ही स्थित है। इस की कुदरती करामत सिनेमा जगत को भी अपनी ओर खिचती है कही फिल्मो की शूटिग यहाँ पर हुई है। यहाँ प्रमुख रूप से दो चीज सबसे अधिक आकर्षित है; मार्बल रोक्स तथा धुआधार


धुआधार को दूर से देखने पर ये धुआ लगता है पर पास आने पर उससे प्यार हो जाता है इतना सुंदर है। यहाँ पर रोप –वे की सुविधा भी है। यहाँ होटल तथा रिसोर्ट भी स्थित है ताकि पर्यटकों को यहाँ रहने में ओई मुश्केली नहीं होती है। यहाँ पर आरसका नक्षीकाम जेवर, गिफ्ट आर्टिकल आदि विख्यात है।

 


Tuesday, September 19, 2017

पवित्र स्थल माता के मढ़



पवित्र स्थल माता के मढ़ गुजरात राज्य के कच्छ जिल्ले में स्थित है। भुज से 90 कि.मी. के अंतर पर माँ आशापुरा का मंदिर स्थित है; जो गुजरात भर में 'माता के मढ़' से प्रसिद्ध है। यह मंदिर चारो और से छोटी छोटी टेकरीओं और पहाड़ो से घिरा हुआ है और यहाँ माँ आशापुरा कि 6 फुट ऊँची और 6 फुट चौड़ी प्रतिमा स्थित है। 

कहाँ जाता है के आज से लगभग डेढ़ हजार वर्ष पूर्वे देवचंद नामक मारवाड़ का कराड वैश्य कच्छ में व्यापर करता था। उस दौरान आज जहाँ माता आशापुरा के मंदिर है वहाँ आश्विन माह में नवरात्री होने के कारण वे माताजी कि स्थापना की और भक्ति-भावपूर्वक माता की आराधना की। इस से माता जी खूश होकर देवचंद को स्वप्न में दर्शन देते हुए कहाँ कि ‘जिस जगह पर तूने मेरी स्थापना की है वहाँ मेरा मंदिर स्थापन करना किन्तु 6 माह तक इस मंदिर का द्वार मत खोलना। इस वणिक ने खूश होकर माताजी ने जो कहाँ वो किया और मंदिर कि देखभाल के लिए गृह त्याग कर के यहाँ आकर बस गया।

5 माह पूर्ण होते ही मंदिर के द्वार के पीछे एक बार वणिक को पायल और गीत का मधुर आवाज़ सुनाई दिया और इस से रहा न गया। इसके कारण वे मंदिर का द्वार खोल दिया और मंदिर के भीतर जाते ही उसको दैवी के भव्य मूर्ति का दर्शन हुआ। किन्तु उसे याद आया कि वे माताजी वचन विरुद्ध द्वार खोल दिया है; जिसके कारण माताजी के अर्ध विकसित मूर्ति का ही निर्माण हुआ है।

अपनी भूल के बदल वे माताजी से माफ़ी मांगी और माताजी भी उसकी भक्ति से प्रसन्न हुए और वरदान मांगने को कहाँ। वरदान में वणिक ने पुत्र रत्न की मांग की किन्तु माताजी ने उसे कहाँ कि तेरी जल्दबाजी के कारण में मेरा चरणों का प्रागटय अर्ध ही रह गया। 

नवरात्रि दौरान माँ आशापुरा के दर्शन के लिए लाखो तीर्थयात्रीयों पैदल दर्शन के लिए जाते है और अपनी अपनी मनोकामना पूर्ण करते है।