Monday, September 9, 2019

दुनिया का दूसरा सबसे विशाल मकबरा गोल गुम्बद

गोल गुम्बद कर्नाटक राज्य के बीजापुर शहर में स्थित आदिलशाही वंश के सातवें शासक मुहम्मद आदिलशाह का मक़बरा है। यह विश्व का दूसरा सबसे विशाल गुम्बद है। इस विशाल गुम्बद के बनने में बीस वर्ष का समय लगा था। 


इसके फर्श का क्षेत्रफल 18337 वर्गफुट है जो रोम के पेंथियन सेंट पीटर-गिर्जे के गुम्बद से कुछ ही छोटा है। इसकी ऊँचाई फर्श से 175 फुट है और इसकी छत में लगभग 130 फुट वर्ग स्थान घिरा हुआ है। इस गुम्बद का चाप आश्चर्यजनक रीति से विशाल है। दीवारों पर इसके धक्के की शक्ति को कम करने के लिए गुम्बद में भारी निलंबित संरचनाएं बनी हैं, जिससे गुम्बद का भार भीतर की ओर रहे। यह गुम्बद शायद संसार की सबसे बड़ी उपजाप वीथि है। जिसमें सूक्ष्म शब्द भी एक सिरे से दूसरे तक आसानी से सुना जा सकता है। 
  1. यहाँ स्थित उद्यान काफ़ी ख़ूबसूरत है।
  2. इस गुम्बद के ऊपर से बीजापुर शहर का पूरा दृश्य दिखाई पड़ता है।
  3. गोल गुम्बद सेंट पीटर्स के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गुम्बद वाला स्मारक है।

Sunday, September 8, 2019

भारत की कौन सी जगहों पर जाने के लिए "स्पेशल परमिशन" लेनी पड़ती है?

भारत में कुछ जगहें ऐसी है जहां लोगों के जाने पर बैन लगा हुआ है। अगर आप इन जगहों पर जाना चाहते है तो आपको स्पेशल परमिशन लेनी पड़ेगी। स्थानीय लोगों को छोड़करदेश-दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से आए तमाम टूरिस्टों के लिए इनर लाइन परमिट लेना अनिवार्य है। 

दरअसल यह सभी स्थान दूसरे देशों की सीमाओं के नजदीक स्थित हैंऐसे में सुरक्षा कारणों से कारण टूरिस्टों को बगैर परमिशन के एंट्री नहीं मिलती है। तो आइये जानते है उन जगहों के बारे में जहां जाने के लिए आपको इनर लाइन परमिट लेने की जरूरत पड़ेगी।


इनर लाइन परमिट होता है क्या?
दरअसल इनर लाइन परमिट भारत का आधिकारिक यात्रा दस्तावेज है, जो कि देश-विदेशों से आए पर्यटकों को संरक्षित क्षेत्र (Protected area) में जाने के लिए अनुमति देता है। यह परमिट एक निश्चित समय और सीमा के लिए मान्य होता है। वर्तमान में भारत के केवल तीन राज्य मिजोरम, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश के लिए इस परमिट की आवश्यकता पड़ती है। हालांकि, इन राज्यों के अलावा दूसरे देशों के बॉर्डर लाइन पर भी इस परमिट की आवश्यकता होती है

नागालैंड

कोहिमा


कोहिमा नागालैंड राज्य की राजधानी है। पहाड़ की ऊंची चोटी पर बसा सुंदर शहर है, कोहिमा ।इस शहर में अधिकतर नागा जनजाति के लोग रहते हैं। इन आदिवासियों की संस्कृति बहुत रंग-बिरंगी है, जो पर्यटकों को बहुत पसंद आती है। कोहिमा के संरक्षित क्षेत्रों में यात्रा करने के लिए इनर लाइन परमिट की आवश्‍यकता पड़ती है। विदेशी पर्यटकों को कोहिमा के संरक्षित क्षेत्र में प्रवेश करने व भ्रमण करने के लिए जिले के विदेशी पंजीकरण अधिकारी के पास पंजीकृत कराना होता है। पंजीकरण कराने के 24 घंटे के अंदर ही विदेशी पर्यटक आराम से सैर कर सकते हैं।
दीमापुर

दीमापुर नागालैंड का सबसे बड़ा शहर है। यह नागालैंड में यात्रा करने के लिए दिलचस्प जगह है।यह नागालैंड के प्रवेश द्वार भी है। दीमापुरधनसिरी के तट पर स्थित है। अक्सर इसे यूरोपीय विद्वानों द्वारा ईंट सिटी के रूप में वर्णित किया जाता है।
मोकोकचुंग

मोकोचुंग एक लोकप्रिय आकर्षण जिला संग्रहालय है। जो ढाल, तलवारें और परंपरागत गहने जैसे नागा कलाकृतियों को प्रस्तुत करता है। आपको यहाँ से नागा हिल्स का एक शानदार दृश्य भी मिलेगा।यह सच है कि दीमापुर और कोहिमा के बाद नागालैंड में तीसरी सबसे महत्वपूर्ण शहरी केंद्र मोकोचुंग है।

अरुणाचल प्रदेश

ज़ीरो
भारत में अरुणाचल प्रदेश के ज़ीरो वैली को विश्व विरासत स्थल (World Heritage Site) में शुमार किया गया है। इस राज्य में देशी-विदेशी पर्यटकों को देखने के लिए कई शानदार टूरिस्ट स्थान हैं, लेकिन ज़ीरो वैली काफी प्रसिद्ध है। लेकिन यहाँ के लिए आपको इनर लाइन परमिट लेने की आवश्यकता है।

तवांग

तवांग में 400 वर्षीय पुराना मठ है । वह भारत में सबसे बड़े मठों में से एक है । ल्हासा के बाहर सबसे बड़ा मठ है।तवांग के पश्चिम में भूटान की सीमा और उत्तर में तिब्बत जिला है।लगभग 3048 मीटर की ऊंचाई पर स्थित, कई महत्वपूर्ण और सुंदर मठों के लिए जाना जाता है और दलाई लामा के जन्म स्थान के रूप में प्रसिद्ध है।

भालुक्पोंग

अरुणाचल प्रदेश के पश्चिम कामेंग जिले में हिमालय की तलहटी में स्थित एक छोटा सा शहर है, भालुकोंग। यह अपनी प्राकृतिक सुंदरता और शांत माहौल के लिए जाना जाता है, जो हर आगंतुक पर जादू करता है।यह ऐन्गलिंग और राफ्टिंग करने के लिए बहुत अच्छा स्थान है। यह पख्तुई वन्यजीव अभयारण्य के घने जंगल और कामेंग नदी के किनारे पर स्थित है।

मिजोरम

ऐज़ावल
ऐज़ावल भारत के मिजोरम राज्य की राजधानी है। ऐज़ावल में म्यूजियम, हिल स्टेशन, शानदार प्लेसेस हैं, जिसे देखने के लिए दुनियाभर से लोग आते हैं। यह पूर्व और दक्षिण में म्यांमार और पश्चिम में बांग्लादेश के बीच स्थित होने के कारण भारत के पूर्वोत्तर कोने में मिजोरम सामरिक दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण राज्य हैं।
लुंगलेई


लुंगलेई अपनी प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध है। यह एक आदर्श गंतव्य है, उनके लिए जो एक ब्रेक लेना चाहते है और प्रकृति के सरल बनावट का मज़ा लेना चाहते है।यह शहर मिजोरम राज्य के दक्षिणी हिस्से में स्थित है, और इसका नाम पत्थर जैसे वास्तविक पुल के नाम पर रखा गया है। यह शहर ऐज़ावल शहर के करीब होने की वजह से काफी मशहूर है।

मणिपुर

लोकतक लेक


लोकटक झील भारत के मणिपुर राज्य की एक झील है। लोकटक झील अपनी सतह पर तैरते हुए वनस्पति और मिट्टी से बने द्वीपों के लिये प्रसिद्ध है, जिन्हें कुंदीकहा जाता है। लोकटक झील तैरते हुए भूखंड के टुकड़े मिट्टी, पेड़-पौधों और जैविक पदार्थों से मिलकर बनी हुई हैं। मिट्टी से बने भूखंड के छोटे-छोटे टुकड़े, पर्यटकों को अपनी ओर खूब आकर्षित करते है। हालांकि, इस झील को देखने के लिए भी इनर लाइन परमिट लेने की आवश्यकता है।

सिक्किम

छंगू झील


छंगू झील सिक्किम राज्य की सबसे खूबसूरत और प्रसिद्ध झील है। यह झील करीब एक किलोमीटर लम्बी, आधा किलोमीटर चौड़ी और 15 मीटर गहरी है. स्थानीय लोग इसे छंगू लेक (Changu Lake) और सोमगो लेक (Tsomgo Lake) दोनों नाम से पुकारते हैं। समुद्र तल से इसकी ऊँचाई लगभग 3757 मीटर (11271 फीट) है। सर्दियों में यह झील जम जाती है, और चारों तरफ बर्फ ही बर्फ नजर आती है। ऐसा कहा जाता है कि मौसम के हिसाब से झील अपना रंग बदल लेती है। छंगू झील पर आने वाले पर्यटकों को गंगटोक से ही परमिट बनवा कर लाना पड़ता है। यह परमिट सिक्किम पर्यटन कार्यालय (Sikkim Tourism Office) से या फिर ट्रेवल एजेंट की सहायता से बना सकते है।

Monday, August 26, 2019

क्या होता है बादल का फटना जिससे पहाड़ों में अकसर तबाही होती है?

मानसून के समय में भारत के पहाड़ी राज्यों में अकसर बादल फटने की घटनाएं सुनने को आती हैं। साल 2013 में आई केदारनाथ त्रासदी के पीछे की मुख्य वजह भी बादल फटना थी जिसमें हजारों लोग मारे गए थे।


भारत में मानसून के दौरान पहाड़ों पर अकसर बादल फटने की खबरें आती हैं। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर से बादल फटने की खबरें आती रहती हैं। बादल फटने की हर घटना अपने साथ तबाही लाती है और अपने निशान छोड़ जाती है। लेकिन बादल फटने से होने वाली इस तबाही को रोका क्यों नहीं जा सकता है? बादल कोई गुब्बारा तो नहीं होता, ऐसे में यह फट कैसे सकता है?


पुराना शब्द है बादल फटना

बादल का "फटना" कोई वैज्ञानिक शब्द नहीं है। बादल फटने की घटना विज्ञान के विकास से पहले भी होती रही है। पहले के जमाने में माना जाता था कि बादल किसी गुब्बारे की तरह होते हैं। इनमें पानी भरा होता है। जहां बारिश होती है, इनमें से धीरे धीरे पानी रिसता है। जब बादल फटता है, तो गुब्बारे की तरह फट जाता है और बहुत सारा पानी एक साथ जमीन पर गिर जाता है। लेकिन विज्ञान के विकसित होने के साथ ही पता चला कि बादल गुब्बारे के जैसे नहीं होते। ये भाप के बने होते हैं। इनमें मौजूद नमी इकट्ठा होकर बूंदों का रूप ले लेती है जो बारिश के रूप में जमीन पर गिरती है। बादलों को लेकर इंसानी धारणा तो बदल गई लेकिन शब्द नहीं बदला और इसे आज भी बादल फटना ही कहा जाता है।

होता क्या है बादल फटना?

बादल फटने का मतलब होता है एक जगह पर बड़ी मात्रा में बारिश एक साथ हो जाना। बादल फटने के साथ तूफान या ओले पड़ना भी सामान्य है। 100 मिलीमीटर प्रति घंटे यानी 4।94 इंच प्रति घंटे की रफ्तार से बारिश पड़े तो उसे बादल फटना कहा जाता है। ऐसी परिस्थिति में बूंदों का आकार भी सामान्य से बड़ा होता है। इसकी वजह होती है ऑरोग्राफिक लिफ्ट। यही वजह है की बादल फटने की घटनाएं अकसर पहाड़ों पर होती हैं। पहाड़ की तलहटी में मौजूद गर्म हवा पहाड़ों से टकराकर ऊपर उठने लगती है। जब यह गर्म हवा ऊपर मौजूद बादलों से टकराती है, बादलों में मौजूद पानी के अणुओं के बीच लगने वाला अंतरआण्विक बल कमजोर हो जाता है। इस वजह से पानी की बूंदें भी हवा के साथ ऊपर उठने लगती हैं। ये बूंदे आपस में मिलकर बड़ी बूंदों में बदल जाती हैं। ये संघनित तो हो जाती हैं लेकिन इलेक्ट्रो बलों के चलते ये बादलों से बाहर नहीं निकल पाती। ज्यादा नमी वाले ऐसे बहुत सारे बादल एक साथ इकट्ठा होते जाते हैं।

जैसे-जैसे ये बूंदे इकट्ठी होती जाती हैं वैसे ही पानी की सघनता बढ़ने लगती है और पानी का वजन बढ़ने लगता है। इस बढ़ते बोझ को बादल सहन नहीं कर पाते हैं और एक साथ सारा पानी बरसा देते हैं। ऐसे बादलों को प्रैग्नेंट क्लाउड यानी गर्भवती बादल कहते हैं। ऐसे बादल अकसर कम ऊंचाई यानी 15 किलोमीटर के आसपास ही होते हैं। बादल फटने का इलाका ज्यादा नहीं होता है। लेकिन एक ही जगह पर इतनी ज्यादा बारिश होने से अव्यवस्था हो जाती है। पहाड़ों से यह पानी तेज बहाव से नीचे आता है। इस पानी के साथ कीचड़ और मलबा भी होता है जो ज्यादा घातक होता है।

ऐसा जरूरी नहीं है कि बादल फटने की घटनाएं सिर्फ पहाड़ों पर ही हों। 2005 में मुंबई में बादल फटने की घटना सामने आई थी। इसकी वजह बादलों के सामने पहाड़ की जगह गर्म हवा का अवरोध होना था। गर्म हवा के अवरोध की वजह से ज्यादा नमी वाले बादल वहां इकट्ठा होते गए और बहुत मात्रा में बारिश एक साथ हो गई। 2013 में हुई केदारनाथ त्रासदी के पीछे भी वजह बादल फटना ही थी।

Wednesday, August 21, 2019

क्या आप जानते हैं, पेड़ों में क्यों लगाया जाता है सफेद रंग?

अक्सर आप पेड़ों पर सफेद रंग की पुताई देखे होंगे। पर क्या आप जानते हैं, पेड़ों पर सफेद रंग क्यों लगाया जाता है। 

अक्सर आप पेड़ों पर सफेद रंग की पुताई देखे होंगे। पर क्या आप जानते हैं, पेड़ों पर सफेद रंग क्यों लगाया जाता है। तो चलिए आपको इस लेख द्वारा बताते हैं। 



पेड़ो पर क्यों की जाती है सफेद रंग की पुताई 


दरअसल, पेड़ों पर रंग करने का मतलब है कि ये पेड़ सरकारी प्रौपर्टी हैं। और वन विभाग इसका देखभाल कर रहा है। इसके साथ ही पेड़ पर सफ़ेद रंग लगाने का ये भी मतलब है कि सरकार के इजाजत के बिना आप पेड़ को नहीं काट सकते। 

पेड़ पर सफेद रंग इसलिए भी लगाया जाता है क्योंकि सफेद रंग अंधेरे में अधिक दिखाई देता है और ऐसे में रात में हादसा होने से बच सकता है। इसके साथ ही पेड़ों पर रंग करने से पेड़ों में दीमक और अन्य जीवजंतु नहीं आते और इस वजह से ही पेड़ लंबे समय तक खड़े रहते हैं।

Monday, August 19, 2019

मैन वर्सेस वाइल्ड: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जंगल में होना इसकी सबसे रोमांचकारी बात नहीं है

अगर बराक ओबामा से तुलना करें तो ‘मैन वर्सेस वाइल्ड’ का नरेंद्र मोदी वाला एपिसोड रोमांच के मामले में ज्यादा नंबर बटोर लेता है। 

अगर मजे-मजे में इस आलेख की शुरूआत करनी हो तो कहा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी दुनिया के ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं, जो हिंदी बोलकर भी बेयर ग्रिल्स जैसे अंग्रेजों को अपनी बात समझा लेते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, ‘मैन वर्सेस वाइल्ड’ के इस स्पेशल एपिसोड में ज्यादातर वक्त हिंदी में बात करते नज़र आते हैं। जब वे ऐसा कर रहे होते हैं, तब शो के एंकर बेयर ग्रिल्स सहमति में सिर हिलाते दिखाई देते हैं लेकिन उनका तरीका जरा बनावटी लगता है। इस पर भी अगर चुटकी लेने की इजाजत मिले तो हम कहना चाहेंगे कि हमारे प्रधानमंत्री इस शो में ग्रिल्स से कहीं बेहतर अभिनय करते नज़र आए हैं। 

‘मैन वर्सेस वाइल्ड’ के इस एपिसोड में नरेंद्र मोदी और बेयर ग्रिल्स के अभिनय करने की बात गंभीरता से भी कही जा सकती है क्योंकि जानने वाले इस बात को जानते हैं कि ग्रिल्स को जरा भी हिंदी नहीं आती है। इसका सीधा मतलब है कि नरेंद्र मोदी को अनजानी रोमांचक यात्रा पर ले जाने का दावा करने वाले इस शो की बातचीत तक स्क्रिप्टेड थी। हालांकि मोदी जैसी हस्तियों के मामले में अक्सर ऐसा होता ही है। लेकिन इस शो में बिलकुल हिंदी न जानने वाले बेयर ग्रिल्स के साथ जिस सहजता से प्रधानमंत्री की बातचीत को दिखाया गया है वह कुछ लोगों को थोड़ा अटपटा लग सकता है। 


इस कार्यक्रम के एक बड़े हिस्से में बड़े इत्मीनान से मोदीजी, ग्रिल्स को बताते हैं कि उनका बचपन बेहद गरीबी में कटा, वे एक समय स्टेशन पर चाय बेचा करते थे और पढ़ाई में बहुत अच्छा न होने के बावजूद एक अनुशासित छात्र थे। इसके अलावा, बचपन में वे मगरमच्छ के बच्चे को घर उठा लाने की घटना भी सुनाते हैं। पर्यावरण संरक्षण के बारे में जागरुकता का संदेश देने के लिए इस कार्यक्रम में शामिल हुए प्रधानमंत्री मोदी, प्रकृति से जुड़े कुछ प्रभावित करने वाले किस्से भी बांटते हैं। मसलन, वे बताते हैं कि उनके पिता बारिश के आने पर चिट्ठी लिखकर लोगों को इसकी खबर दिया करते थे, यह प्रकृति के त्यौहार को मनाने का अनूठा तरीका कहा जा सकता है। साथ ही, वे ओस की बूंदों की वजह से जमी हुई नमक की परत से कपड़े धोने और नहाने की बात भी कहते हैं जो थोड़ी अजीब लगने के चलते आपका ध्यान खींचती है। इसके अलावा, वे कार्यक्रम के दौरान जानवरों से हिंसा ना करने और शाकाहारी होने की जरूरी बात भी कहते नज़र आते हैं। 

इस बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री, बेयर ग्रिल्स के केवल एक ही सवाल का उत्तर नहीं देते हैं। जब ग्रिल्स उनसे पूछते हैं कि रिटायरमेंट के बाद वे खुद को क्या करते हुए देखते हैं, तो मोदी इसका जवाब देने की बजाय उनसे विदा ले लेते हैं। ऐसे में एक अंदेशा होता है कि शायद ग्रिल्स ने यह सवाल स्क्रिप्ट से अलग हटकर पूछ लिया था और नरेंद्र मोदी इसका जवाब कुछ विशेष कारणों से नहीं देना चाहते थे। क्योंकि इसके बाद चलते-चलते सेल्फी लेते हुए ग्रिल्स प्रधानमंत्री से उनके अंडरपैंट्स के सूखे होने के बारे में पूछते हैं तो मोदी बहुत हाजिर जवाबी से कहते हैं कि वे आज के दिन का काम चला लेंगे। 

इस कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब अपने बचपन, हिमालय में गुजारे समय और राजनीति के बारे में बात करते हैं तो ज्यादातर वक्त लगभग वही बातें दोहराते हैं जो वे पहले भी कई बार कह चुके हैं। ‘मैन वर्सेस वाइल्ड’ के बारे में दावा किया जाता है कि यह एक ऐसा कार्यक्रम है जो दुनिया के 180 देशों में प्रसारित होता है। इसका मतलब है कि इसके दर्शकों का एक बड़ा हिस्सा अंग्रेजी बोलने-समझने वाले लोगों का होगा और उसे प्रधानमंत्री के बारे में ये सामान्य बातें भी नहीं मालूम होंगी। लेकिन अगर इन बातों को दोहराने का मकसद, इन्हें ऐसे दर्शकों तक पहुंचाना ही था तो फिर ये हिंदी में क्यों कही गईं? वह भी तब जब प्रधानमंत्री के बारे में यह बात प्रचारित रही है कि वे हिंदी और गुजराती के साथ, अंग्रेजी भी भली तरह से समझते और बोलते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि इंटरनेशनल टेलीविजन पर सीधे अपनी बात पहुंचाने के बजाय पीएम मोदी ने यह काम अनुवादकों के जिम्मे क्यों छोड़ दिया? 

वे ऐसा क्यों करते हैं, इसका अंदाजा आपको थोड़े टेढ़े रास्ते से ‘मैन वर्सेस वाइल्ड’ के इसी एपिसोड से ही मिल जाता है। कार्यक्रम की शुरूआत में बेयर ग्रिल्स प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में बताते हुए कहते हैं कि ‘उन्हें हाल ही में यूएन चैम्पियनशिप ऑफ द अर्थ अवॉर्ड’ से सम्मानित किया गया है।’ यहां पर ध्यान देने वाली बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह अवार्ड अक्टूबर-2018 में दिया गया था और यह कार्यक्रम फरवरी-2019 में शूट किया गया है। फरवरी में तो यह कहा जा सकता था कि अवॉर्ड ‘हाल ही में’ दिया गया है लेकिन अगस्त में इस बारे में जानकारी देते हुए कहा जाएगा कि यह अवॉर्ड ‘बीते साल’ अक्टूबर में दिया गया था। इससे अंदाजा लगता है कि यह कार्यक्रम न सिर्फ फरवरी-2019 में शूट किया था बल्कि इसे उसी समय यानी लोकसभा चुनाव से ठीक पहले प्रसारित किया जाना था। बहुत संभावना है कि शूटिंग वाले दिन ही पुलवामा हमला हो जाने के चलते, किसी विवाद से बचने के लिए इसका प्रसारण कुछ महीनों के लिए टाल दिया गया हो। अब चाहें तो सोच सकते हैं कि शायद इस कार्यक्रम के जरिये प्रधानमंत्री दुनिया भर के लोगों से अप्रत्यक्ष तरीके से और भारतीय जनता से सीधे तरीके से संवाद स्थापित करने की कोशिश कर रहे थे। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पहले अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा भी मैन वर्सेस वाइल्ड में शिरकत कर चुके हैं। अगर उनसे तुलना करें तो नरेंद्र मोदी वाला एपिसोड रोमांच के मामले में ज्यादा नंबर बटोर लेता है। इसमें प्रधानमंत्री चाकू से भाला बनाने और बांस की नाव पर लटकने में ग्रिल्स की मदद करते और उसके जरिए नदी पार करते दिखाई देते हैं। जबकि ओबामा वाले एपिसोड में ऐसा कोई दृश्य नहीं है। बातचीत के दौरान बराक ओबामा जहां बतौर राष्ट्रपति अपने जीवन के बारे में बहुत सहजता से बताते हैं और यह स्वीकार करते हैं कि वे जंगल में बहुत सुरक्षित महसूस नहीं करते हैं, वहीं प्रधानमंत्री मोदी इसमें एक आदर्श निडर पुरुष के रूप में नजर आते हैं। इसके अलावा, अलास्का ग्लेशियर के संरक्षण की बात करने पहुंचे ओबामा कार्यक्रम के दौरान बहुत गंभीरता से इस पर चर्चा करते दिखते हैं, जबकि मोदी काफी हल्के-फुल्के तरीके से और भारतीय संस्कृति के उदाहरण देकर बताते हैं कि प्रकृति का संरक्षण तो हमारी परंपरा का हिस्सा है।