Sunday, September 29, 2019

भारत के उपन्यास सम्राट : मुंशी प्रेमचंद

मुंशी प्रेमचंद भारत के उपन्यास सम्राट माने जाते हैं; जिनके युग का विस्तार सन् 1880 से 1936 तक है। यह कालखण्ड भारत के इतिहास में बहुत महत्त्व का है। इस युग में भारत का स्वतंत्रता-संग्राम नई मंज़िलों से गुजरा। प्रेमचंद का वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। वे एक सफल लेखक, देशभक्त नागरिक, कुशल वक्ता, जिम्मेदार संपादक और संवेदनशील रचनाकार थे।

बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में जब हिन्दी में काम करने की तकनीकी सुविधाएं नहीं थीं फिर भी इतना काम करने वाला लेखक उनके सिवा कोई दूसरा नहीं हुआ। प्रेमचंद का जन्म वाराणसी से लगभग चार मील दूर, लमही नाम के गांव में 31 जुलाई, 1880 को हुआ।

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प्रेमचंद का कुल दरिद्र कायस्थों का था। गरीबी से लड़ते हुए प्रेमचंद ने अपनी पढ़ाई मैट्रिक तक पहुंचाई। जीवन के आरंभ में ही इन्हें गांव से दूर वाराणसी पढ़ने के लिए नंगे पांव जाना पड़ता था। इसी बीच में इनके पिता का देहान्त हो गया। प्रेमचंद को पढ़ने का शौक था, आगे चलकर वह वकील बनना चाहते थे, मगर गरीबी ने इन्हें तोड़ दिया। प्रेमचंद ने स्कूल आने-जाने के झंझट से बचने के लिए एक वकील साहब के यहां ट्यूशन ले लिया और उसी के घर में एक कमरा लेकर रहने लगे। इनको ट्यूशन का पांच रुपया मिलता था। पांच रुपए में से तीन रुपए घर वालों को और दो रुपए से प्रेमचंद अपनी जिन्दगी की गाड़ी को आगे बढ़ाते रहे। प्रेमचन्द महीना भर तंगी और अभाव का जीवन बिताते थे। इन्हीं जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों में प्रेमचन्द ने मैट्रिक पास किया। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य, पर्सियन और इतिहास विषयों से स्नातक की उपाधि द्वितीय श्रेणी में प्राप्त की थी।

प्रेमचंद उनका साहित्यिक नाम था और बहुत वर्षों बाद उन्होंने यह नाम अपनाया था। उनका वास्तविक नाम ‘धनपत राय’ था। जब उन्होंने सरकारी सेवा करते हुए कहानी लिखना आरम्भ किया, तब उन्होंने नवाब राय नाम अपनाया। बहुत से मित्र उन्हें जीवन-पर्यन्त नवाब के नाम से ही सम्बोधित करते रहे।

जब सरकार ने उनका पहला कहानी-संग्रह, ‘सोजे वतन’ जब्त किया, तब उन्हें नवाब राय नाम छोड़ना पड़ा। बाद का उनका अधिकतर साहित्य प्रेमचंद के नाम से प्रकाशित हुआ। इसी काल में प्रेमचंद ने कथा-साहित्य बड़े मनोयोग से पढ़ना शुरू किया।

प्रेमचंद की रचना-दृष्टि, विभिन्न साहित्य रूपों में, अभिव्यक्त हुई। वह बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार थे। प्रेमचंद की रचनाओं में तत्कालीन इतिहास बोलता है। उन्होंने अपनी रचनाओं में जन साधारण की भावनाओं, परिस्थितियों और उनकी समस्याओं का मार्मिक चित्रण किया। उनकी कृतियां भारत के सर्वाधिक विशाल और विस्तृत वर्ग की कृतियां हैं। अपनी कहानियों से प्रेमचंद मानव-स्वभाव की आधारभूत महत्ता पर बल देते हैं।

प्रेमचंद की कृतियां भारत के सर्वाधिक विशाल और विस्तृत वर्ग की कृतियां हैं। उन्होंने उपन्यास, कहानी, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय, संस्मरण आदि अनेक विधाओं में साहित्य की सृष्टि की, किन्तु प्रमुख रूप से वह कथाकार हैं। उन्हें अपने जीवन काल में ही उपन्यास सम्राट की पदवी मिल गई थी। उन्होंने कुल 15 उपन्यास, 300 से कुछ अधिक कहानियां, 3 नाटक, 10 अनुवाद, 7 बाल-पुस्तकें तथा हज़ारों पृष्ठों के लेख, सम्पादकीय, भाषण, भूमिका, पत्र आदि की रचना की। जिस युग में प्रेमचंद ने कलम उठाई थी, उस समय उनके पीछे ऐसी कोई ठोस विरासत नहीं थी और न ही विचार और न ही प्रगतिशीलता का कोई मॉडल ही उनके सामने था सिवाय बांग्ला साहित्य के। उस समय बंकिम बाबू थे, शरतचंद्र थे और इसके अलावा टॉलस्टॉय जैसे रुसी साहित्यकार थे। लेकिन होते-होते उन्होंने गोदान जैसे कालजयी उपन्यास की रचना की जो कि एक आधुनिक क्लासिक माना जाता है।

मुंशी प्रेमचंद की स्मृति में भारतीय डाक विभाग की ओर से 31 जुलाई, 1980 को उनकी जन्मशती के अवसर पर 30 पैसे मूल्य का एक डाक टिकट जारी किया।

प्रेमचंद ने अपने जीवन के कई अदभूत कृतियां लिखी हैं। तब से लेकर आज तक हिन्दी साहित्य में ना ही उनके जैसा कोई हुआ है और ना ही कोई और होगा। अपने जीवन के अंतिम दिनों के एक वर्ष को छोड़कर उनका पूरा समय वाराणसी और लखनऊ में गुजरा, जहां उन्होंने अनेक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया और अपना साहित्य-सृजन करते रहे। 8 अक्टूबर, 1936 को जलोदर रोग से उनका देहावसान हुआ।

Friday, September 27, 2019

सूमो पहलवान इतने विशालकाय क्यों होते हैं?


सूमो कुश्ती जापान की सबसे पुरानी युद्ध कलाओं में से एक है। इसकी जड़ें शिंतो धर्म में मिलती हैं। अच्छी फ़सल के लिए देवताओं के आगे सूमो कुश्तियाँ कराई जाती थीं। ये परंपरा कोई डेढ़ हज़ार साल पुरानी है। सूमो कुश्ती शुरु होने से पहले कई अनुष्ठान किए जाते हैं और फिर दोनों पहलवान उस घेरे में प्रवेश करते हैं जिसे दोयो कहा जाता है। सारा खेल प्रतिपक्षी को घेरे के बाहर फेंकने या उसे धराशायी करने का है। और इसमें सत्तर तरह के दांव-पेंच इस्तेमाल किए जाते हैं।

सूमो पहलवानों का वज़न भी बड़ा काम आता है। आमतौर पर पहलवानों का वज़न 250 पाउंड से 500 पाउंड के बीच होता है, क्यों, इसका कारण शायद ये है कि भारी भरकम काया ताक़त की प्रतीक है।

Monday, September 9, 2019

दुनिया का दूसरा सबसे विशाल मकबरा गोल गुम्बद

गोल गुम्बद कर्नाटक राज्य के बीजापुर शहर में स्थित आदिलशाही वंश के सातवें शासक मुहम्मद आदिलशाह का मक़बरा है। यह विश्व का दूसरा सबसे विशाल गुम्बद है। इस विशाल गुम्बद के बनने में बीस वर्ष का समय लगा था। 


इसके फर्श का क्षेत्रफल 18337 वर्गफुट है जो रोम के पेंथियन सेंट पीटर-गिर्जे के गुम्बद से कुछ ही छोटा है। इसकी ऊँचाई फर्श से 175 फुट है और इसकी छत में लगभग 130 फुट वर्ग स्थान घिरा हुआ है। इस गुम्बद का चाप आश्चर्यजनक रीति से विशाल है। दीवारों पर इसके धक्के की शक्ति को कम करने के लिए गुम्बद में भारी निलंबित संरचनाएं बनी हैं, जिससे गुम्बद का भार भीतर की ओर रहे। यह गुम्बद शायद संसार की सबसे बड़ी उपजाप वीथि है। जिसमें सूक्ष्म शब्द भी एक सिरे से दूसरे तक आसानी से सुना जा सकता है। 
  1. यहाँ स्थित उद्यान काफ़ी ख़ूबसूरत है।
  2. इस गुम्बद के ऊपर से बीजापुर शहर का पूरा दृश्य दिखाई पड़ता है।
  3. गोल गुम्बद सेंट पीटर्स के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गुम्बद वाला स्मारक है।

Sunday, September 8, 2019

भारत की कौन सी जगहों पर जाने के लिए "स्पेशल परमिशन" लेनी पड़ती है?

भारत में कुछ जगहें ऐसी है जहां लोगों के जाने पर बैन लगा हुआ है। अगर आप इन जगहों पर जाना चाहते है तो आपको स्पेशल परमिशन लेनी पड़ेगी। स्थानीय लोगों को छोड़करदेश-दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से आए तमाम टूरिस्टों के लिए इनर लाइन परमिट लेना अनिवार्य है। 

दरअसल यह सभी स्थान दूसरे देशों की सीमाओं के नजदीक स्थित हैंऐसे में सुरक्षा कारणों से कारण टूरिस्टों को बगैर परमिशन के एंट्री नहीं मिलती है। तो आइये जानते है उन जगहों के बारे में जहां जाने के लिए आपको इनर लाइन परमिट लेने की जरूरत पड़ेगी।


इनर लाइन परमिट होता है क्या?
दरअसल इनर लाइन परमिट भारत का आधिकारिक यात्रा दस्तावेज है, जो कि देश-विदेशों से आए पर्यटकों को संरक्षित क्षेत्र (Protected area) में जाने के लिए अनुमति देता है। यह परमिट एक निश्चित समय और सीमा के लिए मान्य होता है। वर्तमान में भारत के केवल तीन राज्य मिजोरम, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश के लिए इस परमिट की आवश्यकता पड़ती है। हालांकि, इन राज्यों के अलावा दूसरे देशों के बॉर्डर लाइन पर भी इस परमिट की आवश्यकता होती है

नागालैंड

कोहिमा


कोहिमा नागालैंड राज्य की राजधानी है। पहाड़ की ऊंची चोटी पर बसा सुंदर शहर है, कोहिमा ।इस शहर में अधिकतर नागा जनजाति के लोग रहते हैं। इन आदिवासियों की संस्कृति बहुत रंग-बिरंगी है, जो पर्यटकों को बहुत पसंद आती है। कोहिमा के संरक्षित क्षेत्रों में यात्रा करने के लिए इनर लाइन परमिट की आवश्‍यकता पड़ती है। विदेशी पर्यटकों को कोहिमा के संरक्षित क्षेत्र में प्रवेश करने व भ्रमण करने के लिए जिले के विदेशी पंजीकरण अधिकारी के पास पंजीकृत कराना होता है। पंजीकरण कराने के 24 घंटे के अंदर ही विदेशी पर्यटक आराम से सैर कर सकते हैं।
दीमापुर

दीमापुर नागालैंड का सबसे बड़ा शहर है। यह नागालैंड में यात्रा करने के लिए दिलचस्प जगह है।यह नागालैंड के प्रवेश द्वार भी है। दीमापुरधनसिरी के तट पर स्थित है। अक्सर इसे यूरोपीय विद्वानों द्वारा ईंट सिटी के रूप में वर्णित किया जाता है।
मोकोकचुंग

मोकोचुंग एक लोकप्रिय आकर्षण जिला संग्रहालय है। जो ढाल, तलवारें और परंपरागत गहने जैसे नागा कलाकृतियों को प्रस्तुत करता है। आपको यहाँ से नागा हिल्स का एक शानदार दृश्य भी मिलेगा।यह सच है कि दीमापुर और कोहिमा के बाद नागालैंड में तीसरी सबसे महत्वपूर्ण शहरी केंद्र मोकोचुंग है।

अरुणाचल प्रदेश

ज़ीरो
भारत में अरुणाचल प्रदेश के ज़ीरो वैली को विश्व विरासत स्थल (World Heritage Site) में शुमार किया गया है। इस राज्य में देशी-विदेशी पर्यटकों को देखने के लिए कई शानदार टूरिस्ट स्थान हैं, लेकिन ज़ीरो वैली काफी प्रसिद्ध है। लेकिन यहाँ के लिए आपको इनर लाइन परमिट लेने की आवश्यकता है।

तवांग

तवांग में 400 वर्षीय पुराना मठ है । वह भारत में सबसे बड़े मठों में से एक है । ल्हासा के बाहर सबसे बड़ा मठ है।तवांग के पश्चिम में भूटान की सीमा और उत्तर में तिब्बत जिला है।लगभग 3048 मीटर की ऊंचाई पर स्थित, कई महत्वपूर्ण और सुंदर मठों के लिए जाना जाता है और दलाई लामा के जन्म स्थान के रूप में प्रसिद्ध है।

भालुक्पोंग

अरुणाचल प्रदेश के पश्चिम कामेंग जिले में हिमालय की तलहटी में स्थित एक छोटा सा शहर है, भालुकोंग। यह अपनी प्राकृतिक सुंदरता और शांत माहौल के लिए जाना जाता है, जो हर आगंतुक पर जादू करता है।यह ऐन्गलिंग और राफ्टिंग करने के लिए बहुत अच्छा स्थान है। यह पख्तुई वन्यजीव अभयारण्य के घने जंगल और कामेंग नदी के किनारे पर स्थित है।

मिजोरम

ऐज़ावल
ऐज़ावल भारत के मिजोरम राज्य की राजधानी है। ऐज़ावल में म्यूजियम, हिल स्टेशन, शानदार प्लेसेस हैं, जिसे देखने के लिए दुनियाभर से लोग आते हैं। यह पूर्व और दक्षिण में म्यांमार और पश्चिम में बांग्लादेश के बीच स्थित होने के कारण भारत के पूर्वोत्तर कोने में मिजोरम सामरिक दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण राज्य हैं।
लुंगलेई


लुंगलेई अपनी प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध है। यह एक आदर्श गंतव्य है, उनके लिए जो एक ब्रेक लेना चाहते है और प्रकृति के सरल बनावट का मज़ा लेना चाहते है।यह शहर मिजोरम राज्य के दक्षिणी हिस्से में स्थित है, और इसका नाम पत्थर जैसे वास्तविक पुल के नाम पर रखा गया है। यह शहर ऐज़ावल शहर के करीब होने की वजह से काफी मशहूर है।

मणिपुर

लोकतक लेक


लोकटक झील भारत के मणिपुर राज्य की एक झील है। लोकटक झील अपनी सतह पर तैरते हुए वनस्पति और मिट्टी से बने द्वीपों के लिये प्रसिद्ध है, जिन्हें कुंदीकहा जाता है। लोकटक झील तैरते हुए भूखंड के टुकड़े मिट्टी, पेड़-पौधों और जैविक पदार्थों से मिलकर बनी हुई हैं। मिट्टी से बने भूखंड के छोटे-छोटे टुकड़े, पर्यटकों को अपनी ओर खूब आकर्षित करते है। हालांकि, इस झील को देखने के लिए भी इनर लाइन परमिट लेने की आवश्यकता है।

सिक्किम

छंगू झील


छंगू झील सिक्किम राज्य की सबसे खूबसूरत और प्रसिद्ध झील है। यह झील करीब एक किलोमीटर लम्बी, आधा किलोमीटर चौड़ी और 15 मीटर गहरी है. स्थानीय लोग इसे छंगू लेक (Changu Lake) और सोमगो लेक (Tsomgo Lake) दोनों नाम से पुकारते हैं। समुद्र तल से इसकी ऊँचाई लगभग 3757 मीटर (11271 फीट) है। सर्दियों में यह झील जम जाती है, और चारों तरफ बर्फ ही बर्फ नजर आती है। ऐसा कहा जाता है कि मौसम के हिसाब से झील अपना रंग बदल लेती है। छंगू झील पर आने वाले पर्यटकों को गंगटोक से ही परमिट बनवा कर लाना पड़ता है। यह परमिट सिक्किम पर्यटन कार्यालय (Sikkim Tourism Office) से या फिर ट्रेवल एजेंट की सहायता से बना सकते है।

Monday, August 26, 2019

क्या होता है बादल का फटना जिससे पहाड़ों में अकसर तबाही होती है?

मानसून के समय में भारत के पहाड़ी राज्यों में अकसर बादल फटने की घटनाएं सुनने को आती हैं। साल 2013 में आई केदारनाथ त्रासदी के पीछे की मुख्य वजह भी बादल फटना थी जिसमें हजारों लोग मारे गए थे।


भारत में मानसून के दौरान पहाड़ों पर अकसर बादल फटने की खबरें आती हैं। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर से बादल फटने की खबरें आती रहती हैं। बादल फटने की हर घटना अपने साथ तबाही लाती है और अपने निशान छोड़ जाती है। लेकिन बादल फटने से होने वाली इस तबाही को रोका क्यों नहीं जा सकता है? बादल कोई गुब्बारा तो नहीं होता, ऐसे में यह फट कैसे सकता है?


पुराना शब्द है बादल फटना

बादल का "फटना" कोई वैज्ञानिक शब्द नहीं है। बादल फटने की घटना विज्ञान के विकास से पहले भी होती रही है। पहले के जमाने में माना जाता था कि बादल किसी गुब्बारे की तरह होते हैं। इनमें पानी भरा होता है। जहां बारिश होती है, इनमें से धीरे धीरे पानी रिसता है। जब बादल फटता है, तो गुब्बारे की तरह फट जाता है और बहुत सारा पानी एक साथ जमीन पर गिर जाता है। लेकिन विज्ञान के विकसित होने के साथ ही पता चला कि बादल गुब्बारे के जैसे नहीं होते। ये भाप के बने होते हैं। इनमें मौजूद नमी इकट्ठा होकर बूंदों का रूप ले लेती है जो बारिश के रूप में जमीन पर गिरती है। बादलों को लेकर इंसानी धारणा तो बदल गई लेकिन शब्द नहीं बदला और इसे आज भी बादल फटना ही कहा जाता है।

होता क्या है बादल फटना?

बादल फटने का मतलब होता है एक जगह पर बड़ी मात्रा में बारिश एक साथ हो जाना। बादल फटने के साथ तूफान या ओले पड़ना भी सामान्य है। 100 मिलीमीटर प्रति घंटे यानी 4।94 इंच प्रति घंटे की रफ्तार से बारिश पड़े तो उसे बादल फटना कहा जाता है। ऐसी परिस्थिति में बूंदों का आकार भी सामान्य से बड़ा होता है। इसकी वजह होती है ऑरोग्राफिक लिफ्ट। यही वजह है की बादल फटने की घटनाएं अकसर पहाड़ों पर होती हैं। पहाड़ की तलहटी में मौजूद गर्म हवा पहाड़ों से टकराकर ऊपर उठने लगती है। जब यह गर्म हवा ऊपर मौजूद बादलों से टकराती है, बादलों में मौजूद पानी के अणुओं के बीच लगने वाला अंतरआण्विक बल कमजोर हो जाता है। इस वजह से पानी की बूंदें भी हवा के साथ ऊपर उठने लगती हैं। ये बूंदे आपस में मिलकर बड़ी बूंदों में बदल जाती हैं। ये संघनित तो हो जाती हैं लेकिन इलेक्ट्रो बलों के चलते ये बादलों से बाहर नहीं निकल पाती। ज्यादा नमी वाले ऐसे बहुत सारे बादल एक साथ इकट्ठा होते जाते हैं।

जैसे-जैसे ये बूंदे इकट्ठी होती जाती हैं वैसे ही पानी की सघनता बढ़ने लगती है और पानी का वजन बढ़ने लगता है। इस बढ़ते बोझ को बादल सहन नहीं कर पाते हैं और एक साथ सारा पानी बरसा देते हैं। ऐसे बादलों को प्रैग्नेंट क्लाउड यानी गर्भवती बादल कहते हैं। ऐसे बादल अकसर कम ऊंचाई यानी 15 किलोमीटर के आसपास ही होते हैं। बादल फटने का इलाका ज्यादा नहीं होता है। लेकिन एक ही जगह पर इतनी ज्यादा बारिश होने से अव्यवस्था हो जाती है। पहाड़ों से यह पानी तेज बहाव से नीचे आता है। इस पानी के साथ कीचड़ और मलबा भी होता है जो ज्यादा घातक होता है।

ऐसा जरूरी नहीं है कि बादल फटने की घटनाएं सिर्फ पहाड़ों पर ही हों। 2005 में मुंबई में बादल फटने की घटना सामने आई थी। इसकी वजह बादलों के सामने पहाड़ की जगह गर्म हवा का अवरोध होना था। गर्म हवा के अवरोध की वजह से ज्यादा नमी वाले बादल वहां इकट्ठा होते गए और बहुत मात्रा में बारिश एक साथ हो गई। 2013 में हुई केदारनाथ त्रासदी के पीछे भी वजह बादल फटना ही थी।