Thursday, October 12, 2017

हैप्पी हार्मोन्स क्या है??

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में कुछ लोग के जीवन में गहरी निराशा छाई हुए है तो कोई हँसना भूल गया है। लेकिन क्या आप जानते है कि हमारे शरीर में कुछ ऐसे हार्मोन्स है जो हमे कुदरती तौर पर खुश रखने का कम करते है। इंसान की 50% खुशियाँ इन्ही जीन्स पर निर्भर होती है।

आइए जानते है हैप्पी हार्मोन्स को...

1) डोपामाइन

यह एक न्यूरोट्रांसमीटर है; जो दिमाग के रिवार्ड सिस्टम को तेज करता है। अगर आपकी वर्कप्लेस पर अच्छा काम करने से तारीफ़ होती है तो आपके शरीर में यह हार्मोन्स बढ़ता है। इससे आप अच्छा महसूस तो करते है, साथ ही साथ आपके व्यवहार में भी सुधार आता है। आप अपने जीवन में आसानी से प्राप्त किया जा सके ऐसा लक्ष्य बनाते है तो भी आपके शरीर में यह हार्मोन्स बढ़ता है। 




दुनियाभर में हुए शोधो के मुताबिक आपको सिर्फ वही संगीत सुनना चाहिए जो आपको शांति और सुकून दे। इससे आपके शरीर में डोपामाइन हार्मोन बढ़ता है जो शरीर में ख़ुशी एवं प्रसन्नता लाता है। क्या आप में मोटिवेशन की कमी है? तो आप रोजाना कुछ देर एकसरसाइज़ करके यह हार्मोन बढ़ा सकते है।

2) ऑक्सीटोसिन

इस हार्मोन को लव हार्मोन भी कहते है। जिस व्यक्ति में ऑक्सीटोसिन की मात्रा ज्यादा होती है उनकी संतुष्टि का स्तर भी ज्यादा होता है। इसलिए आप निःस्वार्थ भाव से लोगों की मदद करे। रोजाना आप कुछ समय मालिश करके इस हार्मोन्स का लेवल मेंटेन कर सकते है।

3) सेरोटोनिन

इस हार्मोन्स से हमारा Mood अच्छा बनता है और तनाव भी कम होता है; जिससे आपका दिन काफी हद तक अच्छा रहता है। अगर आप अपना Mood रोजाना अच्छा रखना चाहते हो तो आप रोज कुछ देर तक सनबर्न करे। साथ ही साथ सूरजमुखी के बीज, केला, टमाटर, शहद और नारियल आदि का सेवन करना चाहिए। नियमित व्यायाम से भी इस हार्मोन्स का स्तर बना रहता है।



4) प्रोजेस्ट्रोन
चैन की नींद के लिए इस हार्मोन्स का होना बेहद जरुरी है। बेवजह तनाव न ले और खानपान में संतुलित आहार ले। इससे आपका यह हार्मोन्स का स्तर संतुलित रखा जा सक्ता है।

5) डोर्फिन्स

डोर्फिन्स को नेचरल पेनकिलर भी कहते है। डोर्फिन्स आपका Motivation बढ़ाने के लिए जिम्मेदार है। यह हार्मोन्स को आप मसालेदार खाना खाकर बढ़ा सकते है पर ध्यान रहे कि ज्यादातर मसालेदार खाना खाने से आपकी सेहत पर भी नुकशान हो सक्ता है। 

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Wednesday, October 11, 2017

क्या चींटियों की भी दुनिया होती है?


क्या चीटियों को भी दुनिया होती है? हा क्यों नहि! चीटियों को भी अपना शहर होता है। वह हमारी तरह छोटी-छोटी बस्तियाँ बनाकर भी रहती है और साथ ही साथ उसका राजा-राणी भी होते है। सिर्फ इतना ही नही, अलग अलग कम करने के लिए सेवक चीटियाँ भी होते है।


आश्चर्य होता है! जब इस चीटीयों की अपनी भी एक सेनाएँ होती है; जो बड़े से बड़े जानवरों का भी मुकाबला कर सकती है। आकार की द्रष्टि से तो वे बहुत ही छोटी होती है; पर बुद्धि की द्रष्टि से तो वह उतनी ही प्रखर होती है। अथक परिश्रम और सामूहिक स्तर पर कार्य करने का इससे बड़ा उदाहरण कही नहीं मिलेगा। 

चीटीं की सबसे बड़ी विशेषता यह है की वह हार तो कभी नहीं मानती। बार बार गिरकर भी चड़ना इनकी प्रवृति है। अनुशासन भी उनका प्रकृति का एक प्रमुख गुण है। दुनिया में अब तक इनकी 2000 से भी अधिक जातियाँ का अध्ययन हो चूका है।

चीटियों की हर जाति की अपनी अपनी सेनाएँ होती है; जो दुसरे पर हमला करती रहती है। मजबूत चीटियाँ कमजोर चीटियों के बिल में अपना कब्जा जमा लेती है और अण्डों पर भी कब्जा जमा लेती है। इस अण्डों के बच्चो से गुलामों का काम लिया जाता है।

एक जाति कि चीटियाँ एक देश के रूप में रहती है; जो उनमें से राजा-राणी और विभिन्न अधिकारी होते है। नौकर चीटियाँ जीवनभर सेवा कार्य करती है और किसान चीटीं का काम दुसरे चीटियों के लिए भोजन प्रबंध करना है।


नर चीटीं और मादा चीटीं आपस में ब्याह भी करती है। चीटियों का अपना महल भी होता है; जो 3 फुट तक ऊँचा होता है। कुछ चीटियों की जाति बड़ी खूंखार भी होती है; जो मध्य अफ्रीका, दक्षिणी अमेरिका व दक्षिण एशिया में से पाई जाती है। यह चीटियाँ लाखो कि संख्या में अपने शिकार की तलाश में निकलती है। जब कोई जानवर इस चीटीं के पंजे में फस जाता है, तब वह उसका सारा मांस खा जाती है।
  

Monday, October 9, 2017

एक समय पर काफी लोकप्रिय थी; पर अब हो गई है 'आउट ऑफ़ डेटेड' टेक्नोलोजी

दिन प्रतिदिन टेक्नोलोजी बहोत ज्यादा ही बदल रही है और नई नई टेक्नोलोजी के कारण आज जिस गेजेट्स का बटोत ज्यादा क्रेज़ होता है वह थोड़े समय के बाद 'आउट ऑफ़ डेट' टेक्नोलोजी बन जाती है। 90 के दशक में लेंडलाइन फोन हर घर की एक शान होती थी; पर मोबाईल के आगमन बाद इसकी आवश्यकता बिलकुल कम हो गई है। ऐसे तो बहोत सारे लोकप्रिय उपकरण है जो आज नामशेष हो गया है।

1) ब्रिक गेम

90 के दशक में यह गैजेट हर बच्चे के हाथ में दिखाई देता था। हालाँकि समार्टफोन में अब रियल फिल हो ऐसी गेम आ जाने के कारण बच्चे सिर्फ स्मार्टफोन पर ही गेम खेलना पसंद करते है। 'वर्च्युअल रियालिटी' के आगमन बाद तो हम भी गेम का एक हिस्सा है ऐसी फिलिंग आती है।

2) वॉकमैन

एक समय था जब अपना मनपसंद गाना सुनने के लिए हमे घर पर बैठना पड़ता था और बड़ी साइज़ के टेपरिकार्डर के अलावा हमारा पास कोई ऑप्शन नहीं था। इसके बाद 'वॉकमैन' का आगमन हुआ; जिसे हम कहाँ भी ले जा सकते थे। कैसेट लगाकर गाने सुनने वाला यह पहला डिवाइस था। अक्सर यह गैजेट जॉगिंग या ट्रैवलिंग करते लोगों के हाथों में दिखाई देता था। पर अब मोबाईल में अनलिमिटेड गाने स्टोर किया जा सक्ता है। परिणाम स्वरूप यह गैजेट पूरी तरह से बहार हो गया।

3) कैमकॉर्डर या हैंडीकैम

कैमकॉर्डर या हैंडीकैम मार्केट में आने के बाद काफी समय तक पॉपुलर गैजेट के रुप में लोगों के बीच रहा। लोग वीडियो रिकॉर्ड करने के लिए इसका यूज करते थे; पर सीडी और डीवीडी के आगमन बाद इसका इस्तेमाल न के बराबर हो गया।


4) फ्लॉपी डिस्क

एक समय पर फ्लॉपी डिस्क की डिमांड काफी ज्यादा थी पर धीरे-धीरे इनकी जगह पेन ड्राइव और हार्ड ड्राइव लेनी लगी। जब इस गैजेट काफी लोकप्रिय था तब लोग इसे काफी संभालकर और सुरक्षित अपने पास रखते थे।

5) ट्रांजिस्टर रेडियो

जब स्मार्टफोन, मोबाइल और टीवी के आने के पूर्वे ट्रांजिस्टर रेडियो लोगों के मनोरंजन का सहारा होता था। इस पर लोग आकाशवाणी के जरिए आने वाले गानों का आनंद लेते थे। पर अब इसकी जगह स्मार्टफोन और आईपैड ने ले ली। इसलिए इस गैजेट का आज कोई नामोनिशान नहीं रहा है।

6) पेजर

जब इस दुनिया में मोबाइल और स्मार्टफोन नहीं आये थे, तब लोग लिखित क्म्यूनिकेशन के लिए पेजर का इस्तेमाल करते थे। इस गैजेट के जरिए टेक्स्ट मैसेज किया जा सकता था। हालांकि पेजर काफी लिमिटेड फीचर के साथ था। इससे सिर्फ 'वन वे कॉन्टेक्ट' ही किया जा सकता था।

7) टेलिक्स

टेलिक्स सिर्फ कोर्पोरेट और गवर्नमेंट ऑफिसेस में दिखाई देते थे। इस टेक्नोलॉजी के जरिए टेलिफोन पर टेकस्ट मैसेज भेजा जा सक्ता था।


8) वीसीआर
पहले लोगों के पास मूवी देखने का एक मात्र जरिया VCR हुआ करता था; पर आज इसकी जगह अब DVD, CD ने ले ली। आज भी लोग सीडी का काफी कम यूज करते हैं क्युकि कम्प्यूटर, लैपटॉप और स्मार्टफोन पर फिल्में देखी जा सकती है।


प्लास्टिक एक भयानक समुद्री प्रदूषण


एलन मैकआर्थर फाउंडेशन की रिपोर्ट मुताबिक प्लास्टिक के निपटारे के लिए तुरंत ही क्रांतिकारी कदम उठाने चाहिए। अगर ऐसा नहीं किया जायेगा तो 35 साल बाद मछलियों से ज्यादा प्लास्टिक होगी। इस रिपोर्ट के मुताबिक समुद्र में हर साल कम से कम 80 करोड़ टन प्लास्टिक जा रहा है, यानि की हर मिनिट करीब एक ट्रक प्लास्टिक।

इस रिपोर्ट के मुताबिक अगर कोई भी कदम नही उठायेंगे तो 2030 तक हर मिनिट दो ट्रक और 2050 तक हर मिनिट चार ट्रक प्लास्टिक समंदर में जायेगी। इसके लिए सबसे ज्यादा परेशानी पैकेजिंग के लिए होने वाली प्लास्टिक है।


कई संस्थाओं के रिसर्च से पता चला है कि प्लास्टिक की बेहतर रिसाइक्लिंग नहीं हो रही है। प्लास्टिक पैकेजिंग का उद्योग करीब 80 से 120 अरब डॉलर है और इस इंडस्ट्रीज का 95 प्रतिशत प्लास्टिक पहली बार में इस्तेमाल होने के बाद फेंका जा रहा है। फ़िलहाल समंदर में करीब 15 करोड़ टन प्लास्टिक है।


अगर यही स्थिति जरी रही तो रिपोर्ट मुताबिक 2025 तक 3 टन मछलियों के बीच 1 टन प्लास्टिक और 2050 तक मछलियों से ज्यादा प्लास्टिक होगी। समुद्र के नमकीन वाले पानी में तैरता प्लास्टिक सूर्य की तेज रोशनी में टूटने लगता है और विघटन के बाद यह सूक्ष्म प्लास्टिक बड़े समुद्री इलाके में फ़ैल जाता है।

वैज्ञानिक इस बात पर चेतावनी भी दे चुके है कि समुद्र में प्लास्टिक विघटन का असर इंसान समेत कई जीवों के आहार चक्र पर पड़ सकती है। 

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Friday, October 6, 2017

हमें बिस्तर पर बैठकर खाना क्यों नहीं खाना चाहिए??

ज कल हमारी संस्कृति बहुत तेजी से बदल रही है। हमारी लाइफस्टाइल की कुछ आदते ऐसी हो रही है जैसे सुबह देर से उठाना और रात को देर से सोना, बिस्तर पर खाना लेना आदि। आपने अक्सर ऐसे ख़राब आदत के लिए बड़े बुजोर्गो ने कभी आपको टोका भी होगा; पर आज के अधिकतर लोग ऐसी बातों को अंधविश्वास मानकर उन पर भरोसा नहि करते। लेकिन इस बात के पीछे भी स्वास्थ्य का कारण जुड़ा हुआ है।


हमारी भारतीय संस्कृति मुताबिक बिस्तर पर खाना-पीना निषेध है और कहा जाता है कि ऐसा करने पर घर में दरिद्रता आती है। पर स्वास्थ्य से यह कारण जुड़ा जाये तो यह है कि जब हमे कोई बीमारी होती है या हम अस्वस्थ होते है तब भी हम बिस्तर पर आराम करते है। साथ ही साथ धुल व् कई तरह की गंदगी रहती है।  
                               

इस कारण बिस्तर पर कई तरह के छोटे छोटे सूक्ष्मजीव रहते है और जब हम बिस्तर पर बैठकर खाना खाते है तो यह सूक्ष्मजीव भोजन के माध्यम से हमारे शरीर में प्रवेश करते है। इस कारण हमे बिस्तर खाना नहि खाना चाहिए और ऐसा करने पर हमे एसिडिटी और पेट की कई बीमारियाँ हो सकती है।

इसके अलावा ऐसा भी कहा गया है की भोजन की थाली हाथ में लेकर खड़े होकर या बैठकर भी नहीं खाना चाहिए क्युकि ऐसा करने पर अपच, कब्ज या गैस जैसी पेट सबंधित समस्या हो सकती है।

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Thursday, October 5, 2017

भारत की सबसे बड़ी लोकप्रिय गायिका



भारत की सबसे बड़ी लोकप्रिय गायिका और आदरणीय गायिका लता मंगेशकर ने 30 से ज्यादा भाषाओं में गीत गाये है; पर उनकी पहचान भारतीय सिनेमा में एक पार्श्वगायक के रूप में रही है। पूरी दुनिया उनके जादुई आवाज़ कि दीवानी रही है।

लता जी का जन्म मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में 28 सितंबर 1929 को मराठा परिवार में सबसे बड़ी बेटी के रूप में पंडित दीनानाथ मंगेशकर के घर हुआ। उनके पिता रंगमंच के कलाकार एवं गायक रहे। 5 साल की उम्र से ही लता जी ने अपने पिता के साथ एक रंगमंच कलाकार के रूप में अभिनय करना शुरू कर दिया था। जब वे 7 साल की थी तब वह महाराष्ट्र आ गई। 


बचपन से ही उनका स्वप्न गायक बनना था। वसंत जोगलेकर द्वारा निर्देशित फिल्म में कीर्ति हसाल के लिए उन्होंने पहली बार गाया। उनके पिता नहीं चाहते थे कि लता जी फिल्मो के लिए गाये। इस कारण उसे फिल्म से निकाल दिया गया; पर उसकी प्रतिभा से वसंत काफी प्रभावित थे। जब वह 13 कि थी तब उनके पिता का निधन हो गया। इस कारण उसे पैसो की बहुत किल्लत झेलनी पड़ी और काफी संघर्ष करना पड़ा था।

लता जी को अभिनय पसंद नहीं था; पर पिता के मृत्यु कि वजह से पैसो के लिए उन्होंने हिंदी और मराठी फिल्मो में काम किया। उन्होंने 1942 में रिलीज हुई पाहिली मंगलागौर नामक पहली फिल्म की। इसके बाद तो उन्होंने कई फिल्म की। 


फिर से वो 1947 में वसंत कि फिल्म में गाना शुरू किया और इसके कारण उनकी काफी चर्चा भी हुए; जिसके बाद उन्हें कई और गाने के मौके भी मिले लेकिन पार्श्वगायिका के रूप में असली पहचान 1949 में फिल्म महल का आयेगा आनेवाले गीत से मिली। इस गीत से उनकी जिंदगी में वह मोड़ आया जिसके बाद वे कभी पीछे मुडकर नहीं देखा।

पिता के मृत्यु कि वजह से सभी भाई-बहन के जिम्मेदारी उन पर आ गई। अपने सब छोटे भाई-बहनों को फिल्म में काम दिलवाया और उनका परिवार भी बसाये; पर स्वयं लता जी अविवाहित रहे। वे भारत रत्न से सम्मानित हो चुके है। साथ ही साथ उन्हें पद्म भूषण, दादा साहेब फाल्के पुरस्कार, पद्म विभूषण के साथ ही साथ कई अन्य पुरस्कार का

Monday, October 2, 2017

आर्य समाज के संस्थापक

आधुनिक भारत के निर्माता व आर्य समाज के स्थापक महर्षि दयानन्द सरस्वती एक महान चिंतक थे, जिसे भारत का स्वराज्य का प्रथम सन्देशवाहक भी कहा गया है। उनका जन्म 12 फ़रवरी 1824 मोरबी के काठियावाड़, गुजरात में हुआ था। पिता करशनजी माता यशोदाबाई एक समृद्ध ब्राहमण परिवार के थे, उनका मूल नाम मूलशंकर था। 

समाज में फ़ैली बुराई को प्रत्यक्ष रूप से देखा था। एक बार शिवरात्रि के दिन जब वह जागरण के लिए मंदिर में रुके तब शिव की मूर्ति पर एक चुहिया शिव की मूर्ति पर चढ़कर वहां चढ़ाया हुआ प्रसाद खाने लगी यह देखकर उनके मन मे तरह तरह के प्रश्न उठे ऐसे में पिता से पूछ बेठे;

पिताजी, “भगवान शिव की मूर्ति पर एक चुहिया चढ़ गयी है। वह उनके प्रसाद को खा रही है, आप तो कहते थे की महादेव चेतन हैं, अगर वे चेतन होते तो उन पर चढ़कर चुहिया उनका प्रसाद कैसे खा सकती थी?” पिताजी नीद में थे वे बोले “बेटा! असली शिव तो कैलाश पर्वत पर रहते हैं, जो सच्ची भावना से उनकी मूर्ति की पूजा करता है, उस पर शिवजी प्रसन्न हो जाते हैं”। पर उनके प्रश्न का समाधान न हुआ, वे मूर्ति पूजा के विरोधी बन गये। बाद में अपनी बहन की मुत्यु के पश्चात् तो वह ओर भी दुखी हो गये तभी से संसार के प्रति विरक्त हो गये ओर सन्यास लेने का निश्चय लिया 21 वर्ष की ऊम में घर त्याग दिया मथुरा में में स्वामी विरजानंद के शिष्य बने।


महर्षि दयानन्द ने मुम्बई में आर्य समाज की स्थापना 1875 की, पुरे देश को प्रभावित कर दिया। आर्यसमाज के नियम और सिद्धांत प्राणिमात्र के कल्याण के अस्पृश्यता, सतीप्रथा, बाल विवाह का द्रढ़ता से विरोध किया था तथा जातिवाद, बाल-ववाह का विरोध करके; नारी शिक्षा, विधवा-ववाह को प्रोत्साहित किया हिन्दू समाज को इस स्थापना से एक नई जागृता मिली और परम्परागत कुरीतियों का नाश हुआ।

स्वामी दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश (हिंदी भाषा में) तथा वेदभाष्यों की रचना की। इन्होंने धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों को पुन: हिंदू बनाने के लिए शुद्धि आंदोलन चलाया। 31 अक्टूबर, 1883 दीपावली के दिन अजमेर, राजस्थान सदा के लिए बद कर दी, पर उनकी शिक्षा, संदेश आज भी चारो ओर गूंजती है।

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विश्वविजेता स्वामी विवेकानंद          परम दानवीर भामाशाह           महात्मा गांधी


 

Sunday, October 1, 2017

विश्व के लिए प्रेरणादायक पुरुष : महात्मा गांधी

भारत के एक ऐसे महान व्यक्ति जो देश में ही नहीं पुरे विश्व के लिए प्रेरणादायक पुरुष है, जिसका नाम है महात्मा गांधी। जब पूरा देश अग्रेजों का गुलाम बन गया तब सत्य, अहिंसा, नैतिकता को लेकर देश को स्वतंत्र किया, गांधीजी स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख राजनैतिक एवं आध्यात्मिक नेता थे, वह राजनीती में सत्ता नहीं पर सेवा प्रदान कि थी। उन्होंने दलितों के उद्धार के लिए जीवन भर सघर्ष किया है। 


2 अक्टूबर 1869 राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का जन्म हुआ था तभी हर साल 2 अक्टूबर को ‘गाँधी जयंती’ मनाई जाती है। उनका विवाह कम आयु में कस्तूरबा के साथ किया गया था। इस दिन पुरे विश्व में ‘अंतराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ मनाया जाता है। वह बिना किसी हिंसा के कही लड़ाई लड़ी है। गांधीजी ने अपने जीवन काल में चंपारण, खेडा सत्याग्रह, असहयोग, हरिजन आन्दोलन, नमक सत्याग्रह, भारत छोड़ो आंदोलन जैसे कही आंदोलन में सक्रीय भाग लिया था।

गांधीजी को दुनिया में आम जनता ‘महात्मा गांधी’ के नाम से जानती है, गांधी को महात्मा की उपाधि सबसे पहले 1915 में राजवैद्य जीवराम कालिदास ने प्रदान की थी रवीन्द्रनाथ टेगौर ने नहीं। उन्हें बापू (गुजराती भाषा में બાપુ बापू यानी पिता) के नाम से भी याद किया जाता है। सुभाष चन्द्र बोस ने 6 जुलाई 1944 को रंगून रेडियो से गांधीजी के नाम जारी प्रसारण में उन्हें राष्ट्रपिता कहकर सम्बोधित करते हुए आज़ाद हिन्द फौज़ के सैनिकों के लिये उनका आशीर्वाद और शुभकामनाएँ माँगीं थीं।


गांधीजी का कहना था की ‘जो आज़ादी के बजाय सुरक्षा चाहते हैं उन्हें जीने का कोई हक नहीं है’। 30 जनवरी,1948, गांधीजी कों नाथूराम गौड़से ने उस समय गोली मारकर हत्या कर दी गई पर उस हत्या में गाधीजी का शरीर नाश हुआ पवित्र आत्मा नहीं। गाँधी जी ने सभी विपरीत परिस्तिथि में अहिंसा और सत्य का पालन किया है। उनका जीवन साबरमती आश्रम में बिलकुल सादगी पूर्वक गुजरा है। 

 लिओ टॉलस्टॉय                                      स्वामी विवेकानन्द                                      विनोबा भावे

Thursday, September 28, 2017

जलियावाला बाग हत्याकांड

सिख धर्म द्वारा प्रस्थापित खालसा पंथ की स्थापना गुरु गोबिंद सिंह ने बैसाखी वाले दिन की थी उसी दिन ही पंजाब के अमृतसर में स्थित जलियावाला बाग में हत्याकांड हुआ था। 13 अप्रैल 1919 के दिन रौलेट एक्ट का विरोध करके एक सभा हुई थी। जहाँ पर जनरल डायर अंग्रेज अफसर ने अकारण सभा पर गोलियां बरसा दीं।


इस हुमले के कारण 1000 अधिक व्यक्ति की मृत्यु हुई और 2000 से अधिक घायल हुआ थे। प्रथम विश्व युद्ध के समय में भारतीय नेताओ और जनता ने ब्रिटिशों का साथ दिया ताकि ब्रिटिश सरकार उनके वर्तन को बदले। लेकिन ब्रिटिश सरकार ने मोंटेगुचेम्सफोर्ड रिफोर्म लागु किया जो भारतीयों की भावना के खिलाफ था। इसके बाद भारतीय जनता ने अंग्रेजों का विरोध करना शुरू किया, इस विरोध को रोकने के लिए, ब्रिटिशरों ने भारत में रौलेट अधिनियम लागू किया।

अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक बैठक हुई थी; पूरे शहर में कर्फ्यू होने के बावजूद सैकड़ों लोग आये थे। उसके बाद ही जनरल डायर अपने सैनिकों के साथ वहां आकर चेतावनी के बिना फायरिंग शुरू कर दीं। बाग़ से निकालने का एकमात्र संकरा रास्ता था, इसलिए लोग जान बचाने के लिए बाग़ में मौजूद कुवे में कूद गए। कुवा भी लाशों से भरा था और हजारों की मृत्यु हो गई।


इस घटना का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर सबसे बड़ा असर पड़ा। यह माना जाता है कि यह घटना भारत में ब्रिटिश शासन के अंत की शुरुआत थी। 1997 में, महारानी एलिजाबेथ ने इस स्मारक पर मृतकों को श्रद्धांजलि अर्पित की। 2013 में, ब्रिटिश प्रधान मंत्री डेविड कैमरन ने भी इस स्मारक पर आये थे। उन्होंने अपनी विजिटर्स बुक में लिखा कि ब्रिटिश इतिहास की यह एक शर्मनाक घटना थी।

अमृतसर में नरसंहार हो ने बाद यह स्थल एक राष्ट्रीय स्थल बन गया; वर्तमान समय में यहाँ एक मीनार बनाई गई है जहाँ शहीदों के नाम अंकित किये गए है। वह कुआँ भी विद्यमान है जिसे शहीदी कुए के नाम से पहचाना जाता है।

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Wednesday, September 27, 2017

देश की नौसेना का विशिष्ट हथियार

पनडुब्बी यानी सबमरीन एक प्रकार का वोटरक्राफ्ट है जो पानी के अंदर रहकर काम करता है। जो मानव निर्मित प्रणाली है। पनडुब्बियों का सर्वाधिक उपयोग सेना में किया जाता था। सबसे पहले पनडुब्बी का प्रयोग प्रथम विश्व युद्ध में हुआ। इसने विश्व का राजनैतिक मानचित्र भी बदलने में अहम् भूमिका प्रदान की है।


विश्व की पहली पनडुब्बी डच वैज्ञानिक द्वारा १६०२ में और पहली सैनिक पनडुब्बी १७७५ में बनाई गई थी। यह पानी के भीतर रहकर भी सैनिक के सभी कार्य कर सकती थी इसीलिए इसे अमेरिकी क्रांति में लाया गया था। समुद्र के पानी में से ऑक्सीजन ग्रहण करने वाली पनडुब्बी का भी निर्माण किया गया।

आधुनिक पनडुब्बियाँ कई सप्ताह या महीनों तक पानी के भीतर रह सकती है। द्वितीय विश्व युद्ध में पनडुब्बियों का उपयोग परिवहन के लिए किया गया था। आजकल इसका प्रयोग पर्यटन के लिये भी किया जाने लगा है। पनडुब्बी के अंदर कृत्रिम रूप से जीवन योग्य सभी व्यवस्था की जाती है। ये किसी भी देश की नौसेना का विशिष्ट हथियार बन गई हैं।


भारतीय नौसेना के पास वर्तमान में १६ डीजल चलित पनडुब्बियाँ है। जो मुख्यरूप से रूस और जर्मनी में बनाई गई है। विश्व में सबसे ज्यादा पनडुब्बी वाला देश अमेरिका है इसके पास ७५ पनडुब्बी है। पनडुब्बियों पर कई लेखकों ने पुस्तकें भी लिखी हैं। पनडुब्बियों की दुनिया को छोटे परदे पर कई धारावाहिको में दिखाया गया है। होलीवुड के कुछ चलचित्रों जैसे आक्टोपस १, आक्टोपस २, द कोर में समुद्री दुनिया के मथकों को दिखाने के लिये भी पनडुब्बियो को दिखाया गया है।

Monday, September 25, 2017

विश्व की पांचवी सबसे बड़ी Pc विक्रेता कंपनी

आसुस टेक कंप्यूटर जिसको आसुस कंपनी के नाम से पहचाना जाता है। वह इसी नाम से विश्वभर में व्यापार करती है। यह हार्डवेयर और इलेक्ट्रोनिक की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी जिसका ताईवान में मुख्य कार्यालय है। इसके प्रमुख उत्पादन डेस्कटॉप कंप्यूटर, लैपटॉप, नोटबुक, मोबाईल फोन आदि है। इस कंपनी का स्लोगन ‘In Search ofIncredible’ है।



यह कंपनी लेनोवो, एचपी, डेल, एसर के विक्रेता के बाद विश्व में पाँचवे स्थान पर स्थित है। आसुस प्रथम ताईवान स्टॉक एक्स्चेंज और द्वितय लंदन स्टॉक एक्सचेंज के साथ सुनिश्चित कंपनी है। यह ताईवान की स्मार्टफोन और लेपटोप बनने वाली कम्पनी है जो जुलाई 2016 में भारत में विश्व का प्रथम लिक्विड-कुलिंग लेपटोप लोंच किया था। जिसका नाम ROG GX700 है जिसकी किमंत 4,12,990 है इसके अलावा ROG Strix GI502 गेमिंग लेपटोप भी लोंच किया था।

लिक्विड कुलिंग टेक्नोलॉजी में कोई तरल प्रदार्थ का प्रयोग नही हुआ पर उसके डिवाइस में गर्मी का पाइप है जो तांबा के तारो से बना  होता है; वह गर्मी कम करने में सहायता करता है। इनके पहले इस तकनिकी का इस्तेमाल लुमिया 950XL और Xperia Z5 का प्रीमियम में उपयोग किया गया है। ROG GX700 विश्व का प्रथम ऐसा लेपटोप है जिसमे तकनिकी का उपयोग होता है।


इस कंपनी ने दावा किया है की 500W गर्मी दूर करता है। ROG GX700 में 6 वे जनरेशन इंटेल ‘Skylake’ core i7-6820HK प्रोसेसर है जो 2.7 GHz की रफ़्तार से काम करता है। जिसमे 16GB DDR4 रैम जो 64GB तक है। Vidia Geforce GTX 980 ये लेपटोप में ग्राफिक्स प्रदान करता है। यह कंपनी मुख्यरूप से ताईवान स्टॉक एक्स्चेंज तथा लंदन स्टॉक एक्स्चेंज में अनुसूची प्रदान करती है।

वर्तमान समय में आसुस का भारत, चीन तथा कही एशियाई देशों में एंड्रॉयड स्मार्टफोन का बड़ा बाजार है जो ZenFon की श्रुंखला के रूप में कार्यरत रहता है।
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कंप्यूटर और इंटरनेट - पूर्ण रूप

कंप्यूटर - प्रश्नोत्तरी

बर्फ पानी में डूबता क्यों नहीं है?



➤  बर्फ का टुकड़ा पानी पर क्यों तैरता है? डूबता क्यों नहीं है?

बर्फ ठोस होते हुए भी वह पानी में में क्यों तैरता है; डूबता क्यों नहीं? वास्तव में कोई भी चीज पानी में तैरती है या डूबती है वह एक सिद्धांत के तहत होता है। बर्फ का टुकड़ा आर्कीमिडिज सिद्धांत के मुताबिक पानी में नहीं डूबता है।

आर्कीमिडिज सिद्धांत के मुताबिक जब कोई भी चीज़ पानी पर तैरती है तो पानी अपने वजन के बराबर वस्तु को हटा देता है। लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा कि बर्फ का टुकड़ा पानी से हल्का होता है। दुसरे शब्दों में कहा जाये तो पानी जमने के बाद बर्फ बन जाता है; जो ज्यादा जगह रोकता है। जिस कारण बर्फ का घनत्व पानी के घनत्व से कम हो जाता है। और यही कारण बर्फ पानी पर तैरता है।


➤  सुखा बर्फ क्या है?

आमतौर पर जब बर्फ की बात आती है तब हमारे मन में सिर्फ दो प्रकार के बर्फ का ही ख्याल आता है। एक जो पानी को जमाकर सिल्लियों के रूप में बाजार में बिकती है वह और दूसरा मौसम में पहाड़ो पर गिरती है वह। पर क्या आप जानते हो के इस दो प्रकार के अलावा तीसरे प्रकार की भी बर्फ होती है? जिसे सुखी बर्फ कहा जाता है। यह बर्फ पानी से नहीं बल्कि कार्बन डाइ ऑक्साइड गैस से बनती है। सुखी बर्फ को सॉलिड कार्बन डाइ ऑक्साइड भी कहा जाता है।

सामान्य रूप से कार्बन डाइ ऑक्साइड गैस अवस्था में रहता है लेकिन जब कार्बन डाइऑक्साइड गैस को सामान्य दबाव कम हो जाता है तब यह बगैस सिकुड़कर ठोस अवस्था में आ जाती है और पानी के बर्फ की तरह जम जाती है। 

यह बर्फ काफी ठंडा होता है और इसका तापमान लगभग 78.5 डिग्री फैरेनहाइट होता है। सुखी बर्फ की विशेषता यह है कि वह पिघलने पर तरल अवस्था में नहीं आता बल्कि सीधे गैस बनकर ही उड़ जाता है। इस बर्फ का काफी बजन होता है। इसके 1000 क्यूबिक इंच के टुकड़े का वजन लगभग 20 k.g. होता है।

इस बर्फ का प्रयोग निम्न तापमान पैदा करने के लिए होता है। मांस, आइस्क्रीम जैसी वस्तुओं को ख़राब होने से बचाने के लिए प्रयोग होता है। कमरों को ठंडा रखने के लिए भी इस बर्फ का प्रयोग होता है।

भेड़ाघाट - धुंआधार जलप्रपात

बर्फ से बनी हुई शिवलिंग!!

 



दुनिया में मसाला उत्पादनमें भारत 70% योगदान !!


मसाले का इस्तेमाल हर कोई गृहिणी करती है, क्या आप जानते है? विश्व में 70% मसाले का उत्पादन भारत कर रहा है। हींग, लाल मिर्च, इलायची, सफेद मिर्च, काली मिर्च, काला जीरा, दालचीनी, लौंग, धनिया, सौंफ, मेथी, गरम मसाला, लहसुन, अदरक, आंवला, लंबी काली मिर्च, राई, सूखे जायफल, खसखस, तिल के बीज, केसर, इमली, पुदीना, हल्दी, सूखे मिर्च, आदि विभिन्न प्रकार के मसाले की खेती व्यापक रूप से भारतके अलग अलग राज्यों में हो रही है। 2010 से भारत विश्व मसाला उत्पादन के क्षेत्र में सबसे आगे है। 

भारतमें सब जगह मसाला का उत्पादन होता है पर सबसे ज्यादा उत्पादन केरल तथा आंध्रप्रदेश में किया जाता है जिसकी मांग यूरोप तक रहती है। केरल को ‘मसाले का बगीचा’ से जाना जाता है; वहा पर मसाला अनुसंधान संस्था भी है। हरियाणा तथा हिमाचल लहसुन और अदरक के उत्पादनमे सबसे अव्वल राज्य है। भारतमें सब प्रकार के मसाला प्राप्त होने के कारण उसे ‘मसाला का घर’ से जाना जाता है। 


मसाला का उत्पादन में भारत विश्व भर में पहचान बनाई है; इसके लाभ से भारतकी गृहिणी के लिए एक रोजगारी की तक पैदा हुई जो मसाला का उत्पादन करके सभी जगह बिकने का कारोबार चला रही है। यह उद्योग भारत का सबसे सफल उद्योग साबित हुआ है क्युकी दुनिया का तमाम प्रकार का मसाला भारतमें मिलाता है जहाँ भारत मसाला अधिक से अधिक निकास करता देश है।

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Thursday, September 21, 2017

प्राकृतिक रबर कैसे तैयार किया जाता है???


कुदरती रबर क्या है?

प्राकृतिक रबर एक आइसोप्रीन का प्रकार है वे भौतिक तथा रासायनिक गुण प्रदर्शित करता है; यह पेड़ या लताओं में से निकले रबरक्षीर से बनता है जो दूध जिसे लेटेक्स कहा जाता है। सबसे अधिक रबर हैविया ब्राजीलिएन्सिस से प्राप्त होता है। यह अमेरिका के अमेजन नदी के जंगलो में उगता है अब भारत के कोचीन, मैसूर शहर में भी इसकी खेती होती है। रबर का वृक्ष पांच साल का होने पर रबर देना शुरू करता है तथा ४० वर्षो तक रबर निकालता है।
रबर बनाने की प्रकिया:
रबर मुख्यत्वे पेड़ो के छेवने, उसके काटने से निकाला जाता है यह पानी से भी हल्का होता है इसमें रेजिन, शर्करा, प्रोटीन, खनिज जैसे प्रदाथ रहेते है। रबर को तिन तरीके से तैयार किया जाता है; पहला रबर का स्कंदन होता है जहा उसे मिट्टी के गड्ढे में गाड़ दिया जाता है। जिसमे पानी मिलाकर रबर गड्ढे रुप में एकत्रित रह जाता है। दूसरा जो पेड़ पर ही उसका स्कंदन किया जाता है जिसमे पानी सुखकर निकल जाता है ओर रबर जमा हो जाता है। तीसरा धुआ से स्कंदन किया जाता है जिसमे काठ के पात्र में रबर रखकर धुए के घर में रख देते है। जिसमे रबर पीला और द्रढ बन जाता है उस पर दूसरा स्तर जमा करके ‘पारा रबर’ प्राप्त किया जाता है।
रबर की विशेषता:
रबर में न रंग होता है न गंध यह पारदर्शक होता है बैक्टीरिया के कारण उसका रंग पिला हो जाता है। इसका वैद्युत गुण उत्तम होता है, तथा वल्कनिकरण और जीर्णन से रबर घट हो जाता है। शुद्ध रबर कठिनता से प्रपात होता है। कच्चे रबर में भौतिक या यांत्रिक बल कम मिलता है। रबर को अधिक उपयोगी बनाने के लिए त्वरक, पूरक, वर्णक, गंधक जैसे तत्वों को मिलाया जाता है।
रबर का उत्पादन तथा उपयोग
रबर का उत्पादन अनिश्चित रहता है मानसून के समय कम रबर प्राप्त होता है। उसका उपयोग जूते, गेंद, गुब्बारे, खिलौनों, ट्यूब, टायर, वोटर प्रूफ कपडे बनाने के लिए किया जाता है। प्राकृतिक रबर और कृत्रीम रबर बहुत ही अलग होता है। रबर का प्रथम उपयोग पेन्सिल के लिखने पर मिटाने के लिए उसका प्रयोग होता था पर आज यह एक व्यवसायिक फसल बन गया है। भारत में रबर व्यापक रूप से पैदा होता है जिससे कही छोटे-छोटे उद्योग रबर की बनी वस्तुए बनाकर रोजगार पैदा करते है।

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मिस्र के पिरामिड 

टाइटैनिक जहाज

 






दुधसागर जलप्रपात



गुमाना किसे पसंद नहीं होता किन्तु बारिश में गुमने की मजा ही कुछ ही ओर होती है। वर्षा ऋतू बहुत हो सुहानी ऋतू है चारों ओर प्रकृति की हरी चादर दिखाई देती है; तब हमें पर्वत, नदियाँ, तालाब आदि जगह गुमने का मन होता है।

हमारे देश में कही एसी जगह है जहां कुदरत ने चारों ओर से सुंदरता बक्षी है एसी जगह कही दुर्लभ ही देखने को मिलती है। मानसून के समय हर जगह हरियाली ही दिखाई देती है; तब प्रकृति से अधिक प्रेम करने वालों के लिए दुधसागर जलप्रपात अमूल्य एवं अद्वितीय भेंट है। वहा उसे जलप्रपात का सुंदर नजारा देखने को मिलता है।

दुधसागर जलप्रपात भारत के गोवा तथा कर्णाटक राज्य के बिच माण्डवी नदी पर स्थित है; जो चारों भागों में बिखरा हुआ है। यह जलप्रपात भारत के सबसे ऊंचाई से बहेने वालों में से एक है। जिसकी ऊंचाई 310 मीटर तथा लम्बाई 30 मीटर जितनी है। 


यहाँ जलप्रपात बहुत ही ऊंचाई से नीचे बहता है तब ऐसा लगता है की पहाड़िया में से दूध निकल रहा है; इसीलिए उसे दुधसागर जलप्रपात कहा गया है। मानसून के समय इसको देखने के लिए यहाँ पर्यटक का मेला लगता है क्युकी यहाँ घने जंगल, ऊँचे शिखर सबका मन मोह लेते है। उस समय दुनिया का सबसे सुंदर, अदभुत द्रश्य देखने मिलाता है। 


यह जलप्रपात सह्याद्रि पर्वत माला में स्थित भगवान महावीर अभ्यारण तथा मोलेम राष्ट्रीय उद्यान के बिच संरक्षक क्षेत्र में है। माण्डवी नदी के कारण ही कर्णाटक तथा गोवा की सरहदे अलग होती है। यह गोवा के रमणीय बिच से एकदम दूर अंतराल पहाड़िया विस्तार में स्थित है। यह दुनिया के विशिष्ट जलप्रपात के लिस्ट में सामिल है।

गोवा के इस नयनरम्य जलप्रपात पर कही फिल्मों की शूटिग भी हुई है जैसे चेन्नई एक्सप्रेस।

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Wednesday, September 20, 2017

भेड़ाघाट - धुंआधार जलप्रपात

मध्य प्रदेश का जबलपुर जो नर्मदा नदी के तट पर स्थित एक महत्वपूर्ण शहर है। यह पर्यटन स्थलों में महत्वपूर्ण माना जाता है। जबलपुर जिले में स्थित भेड़ाघाट में संगेमरमर की पहाड़ियों है। इस वजह से उसे संगेमरमर का शहर भी कहा जाता है। 
 
 यहा संगेमरमर की चट्टानों में धुआंधार नामक जलप्रपात बड़ा मनमोहक है, जो पर्यटकों को आकर्षित करता है। इस की उत्पति नर्मदा से होती है। इस प्रपात के गिरने की आवाज दूर-दूर तक सुनी जा सकती है। इसमें नन्ही बुँदे बिखरकर धुंए जेसा दृश्य बनाती है। इसलिए इसे ‘धुआंधार प्रपात’ नाम से जाना जाता है। चांदनी रात में यहा नौकायन करना यादगार पल बन जाता है।



नर्मदा नदी के दोनों तटो पर संगेमरमर की सौ फुट ऊँची चट्टानें भेड़ाघाट की खासियत है। यह सुरम्य पर्यटन स्थल को देखने के लिए हर साल कई प्रवासियो आते है। आजादी पूर्व एक विदेशी टूरिस्ट यहाँ का प्राकृतिक सुंदरता का उल्लेख अपनी पुस्तक में किया था। यह स्थान विदेशी को भी लुभाता है भारत का पूरातत्व द्वारा सरक्षित ‘चोसठ जोगनी मंदिर’ यहाँ पर ही स्थित है। इस की कुदरती करामत सिनेमा जगत को भी अपनी ओर खिचती है कही फिल्मो की शूटिग यहाँ पर हुई है। यहाँ प्रमुख रूप से दो चीज सबसे अधिक आकर्षित है; मार्बल रोक्स तथा धुआधार


धुआधार को दूर से देखने पर ये धुआ लगता है पर पास आने पर उससे प्यार हो जाता है इतना सुंदर है। यहाँ पर रोप –वे की सुविधा भी है। यहाँ होटल तथा रिसोर्ट भी स्थित है ताकि पर्यटकों को यहाँ रहने में ओई मुश्केली नहीं होती है। यहाँ पर आरसका नक्षीकाम जेवर, गिफ्ट आर्टिकल आदि विख्यात है।

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Tuesday, September 19, 2017

पवित्र स्थल माता के मढ़



पवित्र स्थल माता के मढ़ गुजरात राज्य के कच्छ जिल्ले में स्थित है। भुज से 90 कि.मी. के अंतर पर माँ आशापुरा का मंदिर स्थित है; जो गुजरात भर में 'माता के मढ़' से प्रसिद्ध है। यह मंदिर चारो और से छोटी छोटी टेकरीओं और पहाड़ो से घिरा हुआ है और यहाँ माँ आशापुरा कि 6 फुट ऊँची और 6 फुट चौड़ी प्रतिमा स्थित है। 

कहाँ जाता है के आज से लगभग डेढ़ हजार वर्ष पूर्वे देवचंद नामक मारवाड़ का कराड वैश्य कच्छ में व्यापर करता था। उस दौरान आज जहाँ माता आशापुरा के मंदिर है वहाँ आश्विन माह में नवरात्री होने के कारण वे माताजी कि स्थापना की और भक्ति-भावपूर्वक माता की आराधना की। इस से माता जी खूश होकर देवचंद को स्वप्न में दर्शन देते हुए कहाँ कि ‘जिस जगह पर तूने मेरी स्थापना की है वहाँ मेरा मंदिर स्थापन करना किन्तु 6 माह तक इस मंदिर का द्वार मत खोलना। इस वणिक ने खूश होकर माताजी ने जो कहाँ वो किया और मंदिर कि देखभाल के लिए गृह त्याग कर के यहाँ आकर बस गया।

5 माह पूर्ण होते ही मंदिर के द्वार के पीछे एक बार वणिक को पायल और गीत का मधुर आवाज़ सुनाई दिया और इस से रहा न गया। इसके कारण वे मंदिर का द्वार खोल दिया और मंदिर के भीतर जाते ही उसको दैवी के भव्य मूर्ति का दर्शन हुआ। किन्तु उसे याद आया कि वे माताजी वचन विरुद्ध द्वार खोल दिया है; जिसके कारण माताजी के अर्ध विकसित मूर्ति का ही निर्माण हुआ है।

अपनी भूल के बदल वे माताजी से माफ़ी मांगी और माताजी भी उसकी भक्ति से प्रसन्न हुए और वरदान मांगने को कहाँ। वरदान में वणिक ने पुत्र रत्न की मांग की किन्तु माताजी ने उसे कहाँ कि तेरी जल्दबाजी के कारण में मेरा चरणों का प्रागटय अर्ध ही रह गया। 

नवरात्रि दौरान माँ आशापुरा के दर्शन के लिए लाखो तीर्थयात्रीयों पैदल दर्शन के लिए जाते है और अपनी अपनी मनोकामना पूर्ण करते है।

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Monday, September 18, 2017

ईश्वर कृत ग्रंथ : वेद


वेद प्राचीन भारत में रचित साहित्य है। जो हिन्दुओं का प्राचीनतम और आधारभूत धर्मग्रन्थ है। भारतीय संस्कृति में वेद को सब शास्त्रों की मूल समझा गया है। वेद मात्र हिन्दू संस्कृति एवम हमारे देश का ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया का सबसे प्राचीन शास्त्र है। ये विश्व के उन प्राचीनतम धार्मिक ग्रंथो में है जिनके मन्त्र आज भी इस्तेमाल किये जाते है। वेदों में जीवन के गूढ़ रहस्य छिपे हुए हैं। वेदशब्द संस्कृत भाषा के 'विद्' धातु से बना है, इस तरह वेद का शाब्दिक अर्थ ज्ञानहोता है।



वेद ज्ञान का भंडार है। विज्ञान, खगोल विज्ञान, जीव, ईश्वर, अनादि निज स्वरूप का ज्ञान वेद में ही उपलब्ध है। केवल धार्मिक रूप से ही नहीं किन्तु ऐतिहासिक रूप से भी वेदों का असाधारण महत्व है। अमेरिका की विख्यात खगोल संस्था ने भी वेदों में शामिल ज्ञान को प्रमाणित माना है। एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है, की वेद सर्वशक्तिमान ईश्वर द्वारा दिए गए ज्ञान का खजाना है।


वेदो को चार भाग में विभजित किया गया है: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद। इसमें सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद को माना जाता है पद्यात्मक रूप से लिखा यह ग्रंथ 1828 सूक्तो में विभाजित है; प्रसिद्ध गायत्री मंत्र भी इसी की देन है। यजुर्वेद में यज्ञ तथा तत्वज्ञान को महत्व दिया गया है; इसमें 40 अध्याय है। सामवेद शास्त्रीय संगीत तथा नृत्य के मूलको बताने वाला प्रथम गायन ग्रंथ है; इसमें 1810 छंद है। अथर्ववेद में दैनिक क्रिया तथा रोजबरोज के जीवन में उपयोगी ज्ञान की सपूर्ण माहिती विद्यमान है। 

यदि इस वैदिक साहित्य का संपूर्ण पालन किया जाए तो मनुष्य के सब दुर्गुणों का नाश होता है और मनुष्य को सुख-शन्ति की परम अनुभूति होती है।
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‘इसरो’ क्या है ?



(इसरो) ‘भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन’ भारत का  राष्ट्रीय अंतरिक्ष संस्थान है। इसकी स्थापना 1939 में की गई और इसका मुख्यालय बेंगलोर स्थित है। इस संस्थान में लगभग सत्रह हजार कर्मचारी एवं वैज्ञानिक कार्यरत है। संस्थान का मुख्य कार्य भारत के लिये अंतरिक्ष संबधी तकनीक उपलब्ध करवाना है। अंतरिक्ष कार्यक्रम के मुख्य उदेश्यों में उपग्रहों, प्रमोचक यानों, परिज्ञापी रोकेटों और भू-प्रणालियों का विकास शामिल है।


'इन्सेट' तथा ‘आईआरएस’ इसरो का प्रमुख कार्यक्रम है। आज भारत न सिर्फ अपने अंतरिक्ष संबधी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम है बल्कि दुनिया के बहुत से देशों को अपनी अंतरिक्ष क्षमता से व्यापारिक और अन्य स्तरों पर सहयोग कर रहा है। इसरो को शांति, निरस्त्रीकरण और विकास के लिए साल 2014 में इंदिरा गांधी पुरस्कार से सन्मानित किया गया। भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम डॉ. विक्रम साराभाई की संकल्पना है, जिन्हें भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक कहा गया है।

भारत सरकार द्वारा 1972 में ‘अंतरिक्ष आयोग’ और ‘अंतरिक्ष विभाग’ जैसी रचना से अंतरिक्ष खोज करने में अधिक गति मिली थी। इसरो को अंतरिक्ष विभाग के नियंत्रण में रखा गया है। भारत अंतरिक्ष कार्य के इतिहास में 70 वा दशक एक प्रयोगात्मक युग था। जिसके बीच ‘आर्यभट्ट’ ‘भास्कर’, रोहिणी’ तथा एप्पल जैसे प्रायोगिक उपग्रह से कार्यक्रम चलाया गया था। इसकी सफलता के बाद 80 वे दशक संचालक युग बन गया तब ‘इन्सैट’ और आईआरएस जैसे उपग्रह की शरुआत हुई थी।


भारत में आज अंतरिक्ष यान एक मजबूत यान बन गया है जिसकी सेवा दुसरे देशों में उपलब्ध कराई जाती है। इसकी प्रमुख विशेषता यह है की वे अन्य देशों, अंतर्राष्ट्रीय संगठनों और विकासशील देशों के साथ सहयोगी रहा है। आर्यभट इसरो का पहला उपग्रह है जिसे 19 अप्रैल 1975 रूस की मदद ले कर तैयार किया गया था।

दुनिया में केवल 6 स्थानिक एजंसियो के पास अंतरिक्ष में उपग्रह छोड़ने की क्षमता है; जिसमे इसरो भी दुनिया की 6 एजंसियो में से एक है। यह हमारे देश के लिए गर्व की बात है।

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