Monday, July 10, 2017

गुरु-पूर्णिमा

                       गुरु गोविन्द दोनों खड़े, काके लागूं पांय
                     बलिहारी गुरु आपनो, गोविन्द दियो मिलाय ।।

हिंदू और बोद्ध धर्ममें मनाने वाला दिवस गुरु-पूर्णिमा पुरे भारत में बहुत ही श्रद्धा-पूर्वक मनाया जाता है। हिन्दू धर्ममें गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊपर है। इस दिन महाभारत के रचयिता ऋषि कृष्ण द्वेपायन वेदव्यासका जन्म हुआ था, इस कारण गुरु-पूर्णिमाका एक नाम ‘व्यास पूर्णिमा’ भी है। व्यासजीको प्रथम गुरुका स्थान मिला है।

गुरु-पूर्णिमा हर साल अषाढ़ मासकी पूर्णिमामें आता है इस दिन गुरुका पूजन किया जाता है। यह दिन वर्षा ऋतू के प्रारम्भमें ही आता है। इस दिनसे साधू-संतो चार मास तक ज्ञानकी गंगा बहाते है; इस अवधि के दौरान न तो ज्यादा गर्मी होती है न अधिक ठंड। इस प्रकार अध्ययन के लिए यह समय उत्कृष्ट माना जाता है। जिस प्रकार सूर्यके ताप से वर्षा से शीतलता और धान पैदा करने की शक्ति मिलती है, इसी तरह गुरु के पावन चरण से सबको ज्ञान, शांति, भक्ति तथा योग शक्ति प्राप्त होती है।

प्राचीन काल में जब शिष्य गुरुके आश्रममें निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करता था तब इस दिन पुरे भाव से गुरुका पूजन यथा शक्ति अनुसार दक्षिणा प्रदान करता था। आज भी गुरुका महत्व कम नही हुआ है। पारंपरिक रूप से शिक्षण देने वाले विद्यालयों में संगीत, कलाके विद्यार्थियों आज भी इस दिन गुरु को विशेष रूप से सम्मानित करते है। मंदिरों में गुरुकी पूजा तथा पवित्र नदी में स्नान किया जाता है।

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