Thursday, July 13, 2017

शुरवीर बाजीप्रभु देशपाण्डे



        छत्रपति शिवाजी द्वारा स्थापित हिन्दू पद-पद्साही की स्थापनामें जिन शूरवीरो नींव के पत्थर की तरह स्वयंको विसर्जित किया, उनमे बाजीप्रभु देशपांडे का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। मराठाके इतिहासमें इसका नाम और स्थान बहुत ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने शिवाजीके साथ रोहिडा किल्ला  मजबूत बनाया इसके बाद सभी सैनिक भी उसे सम्मान देने लगे। मराठा सेना अपनी छापामार पद्धति और घात लगाकर वार करनेमे बेहद ही सफल रहे है। वह भारतके मूल निवासी हिन्दुओ पर किये गये अत्याचारों का भरपूर सामना करके उत्तर दिया है।



     बाजीप्रभु की वीरता, कुशलता देखकर स्वयं शिवाजी भी उसका आदर करके विश्वासके साथ दक्षिण कमानको सौपा, वह आदिलशाही राजाके सेनापति अफजल खां कों शिकस्त करके अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। जब अफजल खां की मृत्यु हुई तब आदिलशाही छावनी को भी बड़े ही कुशलता से विनाश कर दीया। जवालीके मोर्चे और मावला के किलेकी मरम्मतमें बाजीने खूब परिश्रम किया था। उन्होंने शिवाजीका साथ मृत्यु तक नहीं छोड़ा था।

      बाजीप्रभुने कही बार शिवाजीको अंग्रेजो, मुगलोंकी चुगुल से बड़े ही चपलतासे बहार निकला है। जब बहुत सी सेना युद्धमें मारी गई तब भी वह घायल हो कर भी सबको पोत्साहित करता रहा। जब शिवाजी विशालगढ़ पहुचे तब तोप चलाई जिसकी आवाज सुनकर बाजीप्रभु अपना कर्तव्य पूरा करने पर 14 जुलाई 1660को अपनी मृत्यु न्योछावर करके सदा के लिए अमर हो गये।


image credit : Wikipedia
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