Thursday, September 21, 2017

प्राकृतिक रबर कैसे तैयार किया जाता है???


कुदरती रबर क्या है?

प्राकृतिक रबर एक आइसोप्रीन का प्रकार है वे भौतिक तथा रासायनिक गुण प्रदर्शित करता है; यह पेड़ या लताओं में से निकले रबरक्षीर से बनता है जो दूध जिसे लेटेक्स कहा जाता है। सबसे अधिक रबर हैविया ब्राजीलिएन्सिस से प्राप्त होता है। यह अमेरिका के अमेजन नदी के जंगलो में उगता है अब भारत के कोचीन, मैसूर शहर में भी इसकी खेती होती है। रबर का वृक्ष पांच साल का होने पर रबर देना शुरू करता है तथा ४० वर्षो तक रबर निकालता है।
रबर बनाने की प्रकिया:
रबर मुख्यत्वे पेड़ो के छेवने, उसके काटने से निकाला जाता है यह पानी से भी हल्का होता है इसमें रेजिन, शर्करा, प्रोटीन, खनिज जैसे प्रदाथ रहेते है। रबर को तिन तरीके से तैयार किया जाता है; पहला रबर का स्कंदन होता है जहा उसे मिट्टी के गड्ढे में गाड़ दिया जाता है। जिसमे पानी मिलाकर रबर गड्ढे रुप में एकत्रित रह जाता है। दूसरा जो पेड़ पर ही उसका स्कंदन किया जाता है जिसमे पानी सुखकर निकल जाता है ओर रबर जमा हो जाता है। तीसरा धुआ से स्कंदन किया जाता है जिसमे काठ के पात्र में रबर रखकर धुए के घर में रख देते है। जिसमे रबर पीला और द्रढ बन जाता है उस पर दूसरा स्तर जमा करके ‘पारा रबर’ प्राप्त किया जाता है।
रबर की विशेषता:
रबर में न रंग होता है न गंध यह पारदर्शक होता है बैक्टीरिया के कारण उसका रंग पिला हो जाता है। इसका वैद्युत गुण उत्तम होता है, तथा वल्कनिकरण और जीर्णन से रबर घट हो जाता है। शुद्ध रबर कठिनता से प्रपात होता है। कच्चे रबर में भौतिक या यांत्रिक बल कम मिलता है। रबर को अधिक उपयोगी बनाने के लिए त्वरक, पूरक, वर्णक, गंधक जैसे तत्वों को मिलाया जाता है।
रबर का उत्पादन तथा उपयोग
रबर का उत्पादन अनिश्चित रहता है मानसून के समय कम रबर प्राप्त होता है। उसका उपयोग जूते, गेंद, गुब्बारे, खिलौनों, ट्यूब, टायर, वोटर प्रूफ कपडे बनाने के लिए किया जाता है। प्राकृतिक रबर और कृत्रीम रबर बहुत ही अलग होता है। रबर का प्रथम उपयोग पेन्सिल के लिखने पर मिटाने के लिए उसका प्रयोग होता था पर आज यह एक व्यवसायिक फसल बन गया है। भारत में रबर व्यापक रूप से पैदा होता है जिससे कही छोटे-छोटे उद्योग रबर की बनी वस्तुए बनाकर रोजगार पैदा करते है।

मिस्र के पिरामिड 

टाइटैनिक जहाज

 






दुधसागर जलप्रपात



गुमाना किसे पसंद नहीं होता किन्तु बारिश में गुमने की मजा ही कुछ ही ओर होती है। वर्षा ऋतू बहुत हो सुहानी ऋतू है चारों ओर प्रकृति की हरी चादर दिखाई देती है; तब हमें पर्वत, नदियाँ, तालाब आदि जगह गुमने का मन होता है।

हमारे देश में कही एसी जगह है जहां कुदरत ने चारों ओर से सुंदरता बक्षी है एसी जगह कही दुर्लभ ही देखने को मिलती है। मानसून के समय हर जगह हरियाली ही दिखाई देती है; तब प्रकृति से अधिक प्रेम करने वालों के लिए दुधसागर जलप्रपात अमूल्य एवं अद्वितीय भेंट है। वहा उसे जलप्रपात का सुंदर नजारा देखने को मिलता है।

दुधसागर जलप्रपात भारत के गोवा तथा कर्णाटक राज्य के बिच माण्डवी नदी पर स्थित है; जो चारों भागों में बिखरा हुआ है। यह जलप्रपात भारत के सबसे ऊंचाई से बहेने वालों में से एक है। जिसकी ऊंचाई 310 मीटर तथा लम्बाई 30 मीटर जितनी है। 


यहाँ जलप्रपात बहुत ही ऊंचाई से नीचे बहता है तब ऐसा लगता है की पहाड़िया में से दूध निकल रहा है; इसीलिए उसे दुधसागर जलप्रपात कहा गया है। मानसून के समय इसको देखने के लिए यहाँ पर्यटक का मेला लगता है क्युकी यहाँ घने जंगल, ऊँचे शिखर सबका मन मोह लेते है। उस समय दुनिया का सबसे सुंदर, अदभुत द्रश्य देखने मिलाता है। 


यह जलप्रपात सह्याद्रि पर्वत माला में स्थित भगवान महावीर अभ्यारण तथा मोलेम राष्ट्रीय उद्यान के बिच संरक्षक क्षेत्र में है। माण्डवी नदी के कारण ही कर्णाटक तथा गोवा की सरहदे अलग होती है। यह गोवा के रमणीय बिच से एकदम दूर अंतराल पहाड़िया विस्तार में स्थित है। यह दुनिया के विशिष्ट जलप्रपात के लिस्ट में सामिल है।

गोवा के इस नयनरम्य जलप्रपात पर कही फिल्मों की शूटिग भी हुई है जैसे चेन्नई एक्सप्रेस। 

Wednesday, September 20, 2017

भेड़ाघाट - धुंआधार जलप्रपात

मध्य प्रदेश का जबलपुर जो नर्मदा नदी के तट पर स्थित एक महत्वपूर्ण शहर है। यह पर्यटन स्थलों में महत्वपूर्ण माना जाता है। जबलपुर जिले में स्थित भेड़ाघाट में संगेमरमर की पहाड़ियों है। इस वजह से उसे संगेमरमर का शहर भी कहा जाता है। 
 
 यहा संगेमरमर की चट्टानों में धुआंधार नामक जलप्रपात बड़ा मनमोहक है, जो पर्यटकों को आकर्षित करता है। इस की उत्पति नर्मदा से होती है। इस प्रपात के गिरने की आवाज दूर-दूर तक सुनी जा सकती है। इसमें नन्ही बुँदे बिखरकर धुंए जेसा दृश्य बनाती है। इसलिए इसे ‘धुआंधार प्रपात’ नाम से जाना जाता है। चांदनी रात में यहा नौकायन करना यादगार पल बन जाता है।



नर्मदा नदी के दोनों तटो पर संगेमरमर की सौ फुट ऊँची चट्टानें भेड़ाघाट की खासियत है। यह सुरम्य पर्यटन स्थल को देखने के लिए हर साल कई प्रवासियो आते है। आजादी पूर्व एक विदेशी टूरिस्ट यहाँ का प्राकृतिक सुंदरता का उल्लेख अपनी पुस्तक में किया था। यह स्थान विदेशी को भी लुभाता है भारत का पूरातत्व द्वारा सरक्षित ‘चोसठ जोगनी मंदिर’ यहाँ पर ही स्थित है। इस की कुदरती करामत सिनेमा जगत को भी अपनी ओर खिचती है कही फिल्मो की शूटिग यहाँ पर हुई है। यहाँ प्रमुख रूप से दो चीज सबसे अधिक आकर्षित है; मार्बल रोक्स तथा धुआधार


धुआधार को दूर से देखने पर ये धुआ लगता है पर पास आने पर उससे प्यार हो जाता है इतना सुंदर है। यहाँ पर रोप –वे की सुविधा भी है। यहाँ होटल तथा रिसोर्ट भी स्थित है ताकि पर्यटकों को यहाँ रहने में ओई मुश्केली नहीं होती है। यहाँ पर आरसका नक्षीकाम जेवर, गिफ्ट आर्टिकल आदि विख्यात है।

 


Tuesday, September 19, 2017

पवित्र स्थल माता के मढ़



पवित्र स्थल माता के मढ़ गुजरात राज्य के कच्छ जिल्ले में स्थित है। भुज से 90 कि.मी. के अंतर पर माँ आशापुरा का मंदिर स्थित है; जो गुजरात भर में 'माता के मढ़' से प्रसिद्ध है। यह मंदिर चारो और से छोटी छोटी टेकरीओं और पहाड़ो से घिरा हुआ है और यहाँ माँ आशापुरा कि 6 फुट ऊँची और 6 फुट चौड़ी प्रतिमा स्थित है। 

कहाँ जाता है के आज से लगभग डेढ़ हजार वर्ष पूर्वे देवचंद नामक मारवाड़ का कराड वैश्य कच्छ में व्यापर करता था। उस दौरान आज जहाँ माता आशापुरा के मंदिर है वहाँ आश्विन माह में नवरात्री होने के कारण वे माताजी कि स्थापना की और भक्ति-भावपूर्वक माता की आराधना की। इस से माता जी खूश होकर देवचंद को स्वप्न में दर्शन देते हुए कहाँ कि ‘जिस जगह पर तूने मेरी स्थापना की है वहाँ मेरा मंदिर स्थापन करना किन्तु 6 माह तक इस मंदिर का द्वार मत खोलना। इस वणिक ने खूश होकर माताजी ने जो कहाँ वो किया और मंदिर कि देखभाल के लिए गृह त्याग कर के यहाँ आकर बस गया।

5 माह पूर्ण होते ही मंदिर के द्वार के पीछे एक बार वणिक को पायल और गीत का मधुर आवाज़ सुनाई दिया और इस से रहा न गया। इसके कारण वे मंदिर का द्वार खोल दिया और मंदिर के भीतर जाते ही उसको दैवी के भव्य मूर्ति का दर्शन हुआ। किन्तु उसे याद आया कि वे माताजी वचन विरुद्ध द्वार खोल दिया है; जिसके कारण माताजी के अर्ध विकसित मूर्ति का ही निर्माण हुआ है।

अपनी भूल के बदल वे माताजी से माफ़ी मांगी और माताजी भी उसकी भक्ति से प्रसन्न हुए और वरदान मांगने को कहाँ। वरदान में वणिक ने पुत्र रत्न की मांग की किन्तु माताजी ने उसे कहाँ कि तेरी जल्दबाजी के कारण में मेरा चरणों का प्रागटय अर्ध ही रह गया। 

नवरात्रि दौरान माँ आशापुरा के दर्शन के लिए लाखो तीर्थयात्रीयों पैदल दर्शन के लिए जाते है और अपनी अपनी मनोकामना पूर्ण करते है।

Monday, September 18, 2017

ईश्वर कृत ग्रंथ : वेद


वेद प्राचीन भारत में रचित साहित्य है। जो हिन्दुओं का प्राचीनतम और आधारभूत धर्मग्रन्थ है। भारतीय संस्कृति में वेद को सब शास्त्रों की मूल समझा गया है। वेद मात्र हिन्दू संस्कृति एवम हमारे देश का ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया का सबसे प्राचीन शास्त्र है। ये विश्व के उन प्राचीनतम धार्मिक ग्रंथो में है जिनके मन्त्र आज भी इस्तेमाल किये जाते है। वेदों में जीवन के गूढ़ रहस्य छिपे हुए हैं। वेदशब्द संस्कृत भाषा के 'विद्' धातु से बना है, इस तरह वेद का शाब्दिक अर्थ ज्ञानहोता है।



वेद ज्ञान का भंडार है। विज्ञान, खगोल विज्ञान, जीव, ईश्वर, अनादि निज स्वरूप का ज्ञान वेद में ही उपलब्ध है। केवल धार्मिक रूप से ही नहीं किन्तु ऐतिहासिक रूप से भी वेदों का असाधारण महत्व है। अमेरिका की विख्यात खगोल संस्था ने भी वेदों में शामिल ज्ञान को प्रमाणित माना है। एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है, की वेद सर्वशक्तिमान ईश्वर द्वारा दिए गए ज्ञान का खजाना है।


वेदो को चार भाग में विभजित किया गया है: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद। इसमें सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद को माना जाता है पद्यात्मक रूप से लिखा यह ग्रंथ 1828 सूक्तो में विभाजित है; प्रसिद्ध गायत्री मंत्र भी इसी की देन है। यजुर्वेद में यज्ञ तथा तत्वज्ञान को महत्व दिया गया है; इसमें 40 अध्याय है। सामवेद शास्त्रीय संगीत तथा नृत्य के मूलको बताने वाला प्रथम गायन ग्रंथ है; इसमें 1810 छंद है। अथर्ववेद में दैनिक क्रिया तथा रोजबरोज के जीवन में उपयोगी ज्ञान की सपूर्ण माहिती विद्यमान है। 

यदि इस वैदिक साहित्य का संपूर्ण पालन किया जाए तो मनुष्य के सब दुर्गुणों का नाश होता है और मनुष्य को सुख-शन्ति की परम अनुभूति होती है।














‘इसरो’ क्या है ?



(इसरो) ‘भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन’ भारत का  राष्ट्रीय अंतरिक्ष संस्थान है। इसकी स्थापना 1939 में की गई और इसका मुख्यालय बेंगलोर स्थित है। इस संस्थान में लगभग सत्रह हजार कर्मचारी एवं वैज्ञानिक कार्यरत है। संस्थान का मुख्य कार्य भारत के लिये अंतरिक्ष संबधी तकनीक उपलब्ध करवाना है। अंतरिक्ष कार्यक्रम के मुख्य उदेश्यों में उपग्रहों, प्रमोचक यानों, परिज्ञापी रोकेटों और भू-प्रणालियों का विकास शामिल है।


'इन्सेट' तथा ‘आईआरएस’ इसरो का प्रमुख कार्यक्रम है। आज भारत न सिर्फ अपने अंतरिक्ष संबधी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम है बल्कि दुनिया के बहुत से देशों को अपनी अंतरिक्ष क्षमता से व्यापारिक और अन्य स्तरों पर सहयोग कर रहा है। इसरो को शांति, निरस्त्रीकरण और विकास के लिए साल 2014 में इंदिरा गांधी पुरस्कार से सन्मानित किया गया। भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम डॉ. विक्रम साराभाई की संकल्पना है, जिन्हें भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक कहा गया है।

भारत सरकार द्वारा 1972 में ‘अंतरिक्ष आयोग’ और ‘अंतरिक्ष विभाग’ जैसी रचना से अंतरिक्ष खोज करने में अधिक गति मिली थी। इसरो को अंतरिक्ष विभाग के नियंत्रण में रखा गया है। भारत अंतरिक्ष कार्य के इतिहास में 70 वा दशक एक प्रयोगात्मक युग था। जिसके बीच ‘आर्यभट्ट’ ‘भास्कर’, रोहिणी’ तथा एप्पल जैसे प्रायोगिक उपग्रह से कार्यक्रम चलाया गया था। इसकी सफलता के बाद 80 वे दशक संचालक युग बन गया तब ‘इन्सैट’ और आईआरएस जैसे उपग्रह की शरुआत हुई थी।


भारत में आज अंतरिक्ष यान एक मजबूत यान बन गया है जिसकी सेवा दुसरे देशों में उपलब्ध कराई जाती है। इसकी प्रमुख विशेषता यह है की वे अन्य देशों, अंतर्राष्ट्रीय संगठनों और विकासशील देशों के साथ सहयोगी रहा है। आर्यभट इसरो का पहला उपग्रह है जिसे 19 अप्रैल 1975 रूस की मदद ले कर तैयार किया गया था।

दुनिया में केवल 6 स्थानिक एजंसियो के पास अंतरिक्ष में उपग्रह छोड़ने की क्षमता है; जिसमे इसरो भी दुनिया की 6 एजंसियो में से एक है। यह हमारे देश के लिए गर्व की बात है।




Monday, September 11, 2017

भूदान यज्ञ के प्रणेता : विनोबा भावे


स्वाधीनता प्राप्ति के बाद निर्धन और भूमिहीन को भूमि दिलाने वाले 'भूदान यज्ञ' के प्रणेता विनोबा भावे का जन्म 11 सितंबर 1895 को महाराष्ट्र के कोबाला जिले में हुआ था। उनका मूल नाम विनायक नरहरि था। वे बहुत ही विलक्षण बालक था। वो जो एक बार पढ़ लेता था; वः उसे सदा के लिए कंठस्थ हो जाता था। 

विनोबा पर उनकी माँ और महात्मा गाँधी के शिक्षाओं का बहुत प्रभाव पड़ा। माँ के आग्रह पर उन्होंने 'श्रीमद भगवद्गीता' का मराठी में काव्यानुवाद किया। प्रारंभ से ही उन्हें नौकरी करने की इच्छा नहीं थी; परिणामत काशी जाने से पूर्वे वे सभी शैक्षिक प्रमाणपत्र जला दिये। 

'भारत छोडो आन्दोलन' के प्रारम्भ में ही गांधीजी विनोबा भावे को प्रथम सत्याग्रही के रूप में चुन लिया था। इसके बाद 3 साल तक वे जेल में रहे। स्वातंत्र्य प्राप्ति के बाद विनोबा 1948 में 'सर्वोदय समाज' की स्थापना की और 1951 में 'भूदान यज्ञ' का बीड़ा उठाया। इस यज्ञ के तहत उन्होंने 70 लाख हेक्टर भूमि निर्धनों को बाँटकर उन्हें किसान का दर्जा दिलाया।

जेल यात्रा दौरान विनोबा अनेक भाषाएँ शिखी। उनके जीवन में सादगी और परोपकार की भावना कूट-कूटकर भारी हुई थी। वे अल्पाहारी और 'वसुधैव कुटुम्बकम्' के प्रबल समर्थक थे। संतुलित आहार एवं नियमित दिनचर्या के कारण विनोबा आजीवन सक्रिय रहे। जब उन्हें लगा के उसका शरीर कार्ययोग्य नहीं रहा तब वे 'संथारा व्रत' लेकर अन्नजल और दवा का त्याग किया।

15 नवम्बर 1982 को उनका देहांत हुआ। अपने जीवनकाल दौरान वे 'भारत रत्न' का सम्मान ठुकरा चुके थे। अंत: 1983 में शासन उसे मरणोपरांत 'भारत रत्न' से विभूषित किया।

पूर्व में है, पर नाम पश्चिमी बंगाल क्यों?

नाटक सम्राट - विलियम शेक्सपियर

Thursday, September 7, 2017

सब पढ़े सब बढ़े: विश्व साक्षरता दिवस


"ज्ञान इंसान को जीवन के सभी अंधेरों से बाहर निकाल एक बेहतर और उज्जवल भविष्य की ओर अग्रसर करता है।" - ऋषि गौतम

आज विश्व के सामने कई मुसिबते खडी पड़ी है। इंसान की जरा सी लापरवाही किसी भी समय पर विकराल रूप दे सकती है, पर्यावरण संकट, प्रदुषण, जनसंख्या, बेरोजगारी, बीमारी, पाकृतिक आपदाओ आदि से पूरा विश्व घिरा हुआ है। इन सब मुसीबतों से कोई बचा सकता है तो वह है इंसानों की सुझबूझ और तकनीकी। सुझबूझ और तकनीकी के बिना शिक्षा को प्राप्त करना कितना मुश्किल है वो तो सब जानते है। आज विकास के इस दौर में शिक्षा ही सबसे बड़ी सहयोगी है। 'शिक्षा एक ऐसा धन है जो मनुष्य के साथ हमेशा रहता है, जो न बांट ने से कम होता है और न ही इसे कोई चुरा सकता है।'

इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि जिस देश ने सभ्यता और ज्ञान को अपनाया है उसका विकास अभूतपूर्व गति से हुआ है। शिक्षा के महत्व का वर्णन करना शब्दों में बेहद मुश्किल है और शायद इसीलिए हर साल 8 सितंबर को ‘विश्व साक्षरता दिवस’ मनाया जाता है।

कम साक्षरता होने से किसी भी देश को कितना नुकसान उठान पड़ता है इसका सबूत उनके विकास दर से ही पता चल जाता है। विश्व में साक्षरता को ध्यान में रखते हुए ही 17 नवम्बर 1965 को संयुक्त राष्ट्र के शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन(यूनेस्को) ने ८ सितम्बर को विश्व साक्षरता दिवस (International Literacy Day) घोषित किया। विश्व साक्षरता दिवस को पहेली बार 1966 में मनाया गया। इसका उद्देश्य व्यक्तिगत, सामुदायिक और सामाजिक रूप से साक्षरता के महत्व पर प्रकाश डालना है। यह उत्सव दुनियाभर में मनाया जाता है। सयुक्त राष्ट्र ने वैश्विक समुदाय को साक्षरता के प्रति जागरूक करने के लिए इसकी शरुआत की थी प्रत्येक वर्ष एक नए उद्देश्य के साथ विश्व साक्षरता दिवस मनाया जाता है।



साक्षरता का तात्पर्य सिर्फ़ पढ़ना-लिखना ही नहीं बल्कि यह सम्मान, अधिकार, कर्तव्य और सामाजिक विकास के प्रति जागरूकता लाना है। दुनिया में शिक्षा और ज्ञान बेहतर जीवन जीने के लिए ज़रूरी माध्यम है। साक्षरता गरीबी, भ्रष्टाचार और आतंकवाद से निपटने में सहायक और समर्थ है। आज अनपढ़ता देश की प्रगति में बहुत बड़ी बाधा है।

भारत सरकार द्वारा साक्षरता को बढ़ाने के लिए सर्व शिक्षा अभियान, साक्षर भारत मिशन, मिड डे मील योजना, प्रौढ़ शिक्षा योजना, राजीव गांधी साक्षरता मिशन आदि न जाने कितने अभियान चलाए गए, मगर सफलता आशा के अनुरूप नहीं मिली। इनमें से मिड डे मील ही एक ऐसी योजना है जिसने देश में साक्षरता बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। इसकी शुरूआत तमिलनाडु से हुई वहाँ 1982 में तत्कालीन मुख्यमंत्री एम.जी.रामचंद्रन ने 15 साल से कम उम्र के स्कूली बच्चों को प्रति दिन निःशुल्क भोजन देने की योजना शुरू की थी।

आज विश्व आगे बढ़ता जा रहा है और अगर भारत को भी प्रगति की राह पर कदम मिलाकर चलना है तो साक्षरता दर की वृद्धि करनी ही होगी।

Monday, September 4, 2017

गुरु-शिष्य की परम्परा का आधुनिक रूप: शिक्षक दिवस


                                           गुर बिनु भवनिधि तरइ न कोई।
                                          जों बिरंचि संकर सम होई।।

यह दोहा तुलसीदास रचित है, जिसमे गुरु को विशेष महत्व दिया गया है। गुरु-शिष्य की परम्परा भारत की संस्कृति में प्राचीन काल से चली आ रही है| इसे विशेष सम्मान देने के लिए आधुनिक रूप से 'शिक्षक दिवस' का आयोजन होता है। यह दिन भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्ण के जन्म दिवस के अवसर पर 5 सितम्बर को मनाया जाता है। प्रत्येक मनुष्य के जीवन में गुरु का बहुत महत्व होता है। सर्वपल्ली राधाकृष्णन शिक्षा मे गहरा विश्वास रखते थे तथा अध्ययन में भी उसे बहुत प्रेम था। एक दार्शनिक व् शिक्षक के सभी गुण उसमे विद्यमान थे। इसी लिए पुरे देश में भारत सरकार द्वारा श्रेष्ठ शिक्षको को इस दिन पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है। 



शिक्षक दिवस को पुरे भारत के सभी स्कुल-कॉलेजों में मनाया जाता है। इस दिन हर छात्र अपने गुरु को प्रभावित व् खुश करने के लिए कुछ नये कार्य करते है या उनके लिए गाना गाते है या इस दिन का महत्व समझाते हुए भाषण भी देते है। प्रत्येक गुरु हर शिष्य को सफल होने का रास्ता दिखाता है। तभी तो कई महान व्यक्ति ने गुरु को इश्वर से भी बड़ा माना है। जैसे कबीर दास। इस स्वार्थ भरी दुनिया में माँ के अलावा कोई निस्वार्थ प्रेम करता है तो वह है गुरु, जो निस्वार्थ भाव से अपने शिष्य को आगे बढ़ने का हौसला देता है। प्रत्येक विद्यार्थी समाज का भविष्य है; जिसको सही राह दिखाने में गुरु का ही सहयोग होता है।

स्वामी विवेकानन्द

गुरु-पूर्णिमा


Saturday, September 2, 2017

पीसा की झुकी हुई मीनार

विश्व के इटली देश में स्थित पीसा नगर टस्कनी प्रदेश की राजधानी है जो संगेमरमर की मूर्तियों के निर्माण के लिए बहुत प्रसिद्ध है। यह नगर को महान गणितज्ञ गैलीलियो की जन्मभूमि माना जाता है। इसमें ‘लीनिंग टावर ओफ पीसा’ को वास्तु शिल्प का अदभुत नमूना माना जाता है। पीसा की झुकी हुई मीनार वर्ष 1173 में बननी शरु हुई थी लेकिन इस मीनार को पूरा करने में 200 साल लगे।


अपने निर्माण के बाद से ही मीनार लगातार नीचे की ओर जुकती रही है। और इसी ज़ुकाने की वजह से वह दुनिया भर में भी मशहूर रही है। इस वजह से खतरा बना हुआ था की ये एक दिन गिर जाएगी। जब 20वीं सदी में मीनार का निर्माण चल रहा था तो कामगारों को लगने लगा था की ये एक तरफ जुक रही है। कामगारों ने इसे ठिक करने की कोशिश की लेकिन पूरी तरह तैयार होने के बाद भी मीनार थोडी सी जुकी हुई ही थी।


 


दुनिया भर में हजारों लोग इस मीनार को देखने के लिए पीसा आते हैं। कुछ वर्ष पहले मीनार को गिरने के खतरे की वजह से बंद कर दिया गया था। 11 साल तक बंद रहने के बाद दिसंबर 2001 में इसे फिर खोल दिया गया था। यह केवल ऊँची ही नहीं पर सुंदर भी है; जिसके बहार के भागमे संगेमरमर का प्रयोग हुआ है। बहुत से पर्यटकों इस अदभुत मीनार को देखने आते है। 1987 के दौरान इस मीनार को यूनेस्को विश्व धरोहर में सामिल कर दिया था।