Monday, September 11, 2017

भूदान यज्ञ के प्रणेता : विनोबा भावे


स्वाधीनता प्राप्ति के बाद निर्धन और भूमिहीन को भूमि दिलाने वाले 'भूदान यज्ञ' के प्रणेता विनोबा भावे का जन्म 11 सितंबर 1895 को महाराष्ट्र के कोबाला जिले में हुआ था। उनका मूल नाम विनायक नरहरि था। वे बहुत ही विलक्षण बालक था। वो जो एक बार पढ़ लेता था; वः उसे सदा के लिए कंठस्थ हो जाता था। 

विनोबा पर उनकी माँ और महात्मा गाँधी के शिक्षाओं का बहुत प्रभाव पड़ा। माँ के आग्रह पर उन्होंने 'श्रीमद भगवद्गीता' का मराठी में काव्यानुवाद किया। प्रारंभ से ही उन्हें नौकरी करने की इच्छा नहीं थी; परिणामत काशी जाने से पूर्वे वे सभी शैक्षिक प्रमाणपत्र जला दिये। 

'भारत छोडो आन्दोलन' के प्रारम्भ में ही गांधीजी विनोबा भावे को प्रथम सत्याग्रही के रूप में चुन लिया था। इसके बाद 3 साल तक वे जेल में रहे। स्वातंत्र्य प्राप्ति के बाद विनोबा 1948 में 'सर्वोदय समाज' की स्थापना की और 1951 में 'भूदान यज्ञ' का बीड़ा उठाया। इस यज्ञ के तहत उन्होंने 70 लाख हेक्टर भूमि निर्धनों को बाँटकर उन्हें किसान का दर्जा दिलाया।

जेल यात्रा दौरान विनोबा अनेक भाषाएँ शिखी। उनके जीवन में सादगी और परोपकार की भावना कूट-कूटकर भारी हुई थी। वे अल्पाहारी और 'वसुधैव कुटुम्बकम्' के प्रबल समर्थक थे। संतुलित आहार एवं नियमित दिनचर्या के कारण विनोबा आजीवन सक्रिय रहे। जब उन्हें लगा के उसका शरीर कार्ययोग्य नहीं रहा तब वे 'संथारा व्रत' लेकर अन्नजल और दवा का त्याग किया।

15 नवम्बर 1982 को उनका देहांत हुआ। अपने जीवनकाल दौरान वे 'भारत रत्न' का सम्मान ठुकरा चुके थे। अंत: 1983 में शासन उसे मरणोपरांत 'भारत रत्न' से विभूषित किया।

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