Monday, September 4, 2017

गुरु-शिष्य की परम्परा का आधुनिक रूप: शिक्षक दिवस


                                           गुर बिनु भवनिधि तरइ न कोई।
                                          जों बिरंचि संकर सम होई।।

यह दोहा तुलसीदास रचित है, जिसमे गुरु को विशेष महत्व दिया गया है। गुरु-शिष्य की परम्परा भारत की संस्कृति में प्राचीन काल से चली आ रही है| इसे विशेष सम्मान देने के लिए आधुनिक रूप से 'शिक्षक दिवस' का आयोजन होता है। यह दिन भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्ण के जन्म दिवस के अवसर पर 5 सितम्बर को मनाया जाता है। प्रत्येक मनुष्य के जीवन में गुरु का बहुत महत्व होता है। सर्वपल्ली राधाकृष्णन शिक्षा मे गहरा विश्वास रखते थे तथा अध्ययन में भी उसे बहुत प्रेम था। एक दार्शनिक व् शिक्षक के सभी गुण उसमे विद्यमान थे। इसी लिए पुरे देश में भारत सरकार द्वारा श्रेष्ठ शिक्षको को इस दिन पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है। 



शिक्षक दिवस को पुरे भारत के सभी स्कुल-कॉलेजों में मनाया जाता है। इस दिन हर छात्र अपने गुरु को प्रभावित व् खुश करने के लिए कुछ नये कार्य करते है या उनके लिए गाना गाते है या इस दिन का महत्व समझाते हुए भाषण भी देते है। प्रत्येक गुरु हर शिष्य को सफल होने का रास्ता दिखाता है। तभी तो कई महान व्यक्ति ने गुरु को इश्वर से भी बड़ा माना है। जैसे कबीर दास। इस स्वार्थ भरी दुनिया में माँ के अलावा कोई निस्वार्थ प्रेम करता है तो वह है गुरु, जो निस्वार्थ भाव से अपने शिष्य को आगे बढ़ने का हौसला देता है। प्रत्येक विद्यार्थी समाज का भविष्य है; जिसको सही राह दिखाने में गुरु का ही सहयोग होता है।

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