Monday, October 2, 2017

आर्य समाज के संस्थापक

आधुनिक भारत के निर्माता व आर्य समाज के स्थापक महर्षि दयानन्द सरस्वती एक महान चिंतक थे, जिसे भारत का स्वराज्य का प्रथम सन्देशवाहक भी कहा गया है। उनका जन्म 12 फ़रवरी 1824 मोरबी के काठियावाड़, गुजरात में हुआ था। पिता करशनजी माता यशोदाबाई एक समृद्ध ब्राहमण परिवार के थे, उनका मूल नाम मूलशंकर था। 

समाज में फ़ैली बुराई को प्रत्यक्ष रूप से देखा था। एक बार शिवरात्रि के दिन जब वह जागरण के लिए मंदिर में रुके तब शिव की मूर्ति पर एक चुहिया शिव की मूर्ति पर चढ़कर वहां चढ़ाया हुआ प्रसाद खाने लगी यह देखकर उनके मन मे तरह तरह के प्रश्न उठे ऐसे में पिता से पूछ बेठे;

पिताजी, “भगवान शिव की मूर्ति पर एक चुहिया चढ़ गयी है। वह उनके प्रसाद को खा रही है, आप तो कहते थे की महादेव चेतन हैं, अगर वे चेतन होते तो उन पर चढ़कर चुहिया उनका प्रसाद कैसे खा सकती थी?” पिताजी नीद में थे वे बोले “बेटा! असली शिव तो कैलाश पर्वत पर रहते हैं, जो सच्ची भावना से उनकी मूर्ति की पूजा करता है, उस पर शिवजी प्रसन्न हो जाते हैं”। पर उनके प्रश्न का समाधान न हुआ, वे मूर्ति पूजा के विरोधी बन गये। बाद में अपनी बहन की मुत्यु के पश्चात् तो वह ओर भी दुखी हो गये तभी से संसार के प्रति विरक्त हो गये ओर सन्यास लेने का निश्चय लिया 21 वर्ष की ऊम में घर त्याग दिया मथुरा में में स्वामी विरजानंद के शिष्य बने।


महर्षि दयानन्द ने मुम्बई में आर्य समाज की स्थापना 1875 की, पुरे देश को प्रभावित कर दिया। आर्यसमाज के नियम और सिद्धांत प्राणिमात्र के कल्याण के अस्पृश्यता, सतीप्रथा, बाल विवाह का द्रढ़ता से विरोध किया था तथा जातिवाद, बाल-ववाह का विरोध करके; नारी शिक्षा, विधवा-ववाह को प्रोत्साहित किया हिन्दू समाज को इस स्थापना से एक नई जागृता मिली और परम्परागत कुरीतियों का नाश हुआ।

स्वामी दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश (हिंदी भाषा में) तथा वेदभाष्यों की रचना की। इन्होंने धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों को पुन: हिंदू बनाने के लिए शुद्धि आंदोलन चलाया। 31 अक्टूबर, 1883 दीपावली के दिन अजमेर, राजस्थान सदा के लिए बद कर दी, पर उनकी शिक्षा, संदेश आज भी चारो ओर गूंजती है।

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