Wednesday, May 22, 2019

गेटवे ऑफ इंडिया

भारत के सबसे लोकप्रिय धरोहरों में से एक गेटवे ऑफ इंडिया वर्ष 1924 में निर्मित हुआ था और ये मुंबई, महाराष्ट्र में स्थित है| ये जगह दुनिया भर से पर्यटकों को बहुत आकर्षित करती है और देश के प्रमुख बंदरगाहों के लिए एक प्रमुख केंद्र के रूप में कार्य करती है| 

इस संरचना के निर्माण में भारत सरकार द्वारा नकद निवेश लगभग 21 लाख की राशि का हुआ था और आज की स्थिति के अनुसार ये जगह कई फोटोग्राफरों, विक्रेताओं और खाद्य विक्रेताओं को व्यवसाय के लिए एक ठेका मिल गयी है| ये जगह हमेशा पर्यटकों और सामान्य भीड़ से भरी होती है| 

गेटवे ऑफ इंडिया की संरचना के निर्माण के पीछे मुख्य उद्देश्य किंग जॉर्ज पंचम और बंबई (अब मुंबई) के क्वीन मैरी की यात्रा को स्वीकार करना था, आज यह भारत के सबसे महत्वपूर्ण स्मारकों में से एक के रूप में बना हुआ है, ये ताकत, शक्ति और शांति का चित्रण है| 


गेटवे ऑफ इंडिया दिसंबर 1911 में किंग जॉर्ज और रानी मैरी की मुंबईकी यात्रा को याद करने के उपलक्ष्य में बनाया गया था| गेटवे ऑफ इंडिया का निर्माण दिल्ली दरबार से पहले हुआ था| हालांकि किंग जॉर्ज और रानी मैरी संरचना का एक मॉडल ही देख पाए| 

क्योंकि इसका निर्माण तब तक शुरू नहीं किया था और इसका निर्माण असल में 1915 में शुरू हुआ| गेटवे ऑफ इंडिया की नींव 31 मार्च, 1911 को बंबई के राज्यपालसर जॉर्ज सिडेनहैम क्लार्क ने रखी थी| जॉर्ज विट्टेट ने 31 मार्च, 1914 को अंतिम डिजाइन पर मंजूरी दी थी| 

गेटवे ऑफ इंडिया पीले बेसाल्ट और कंक्रीट से बनाया गया था| 1915 और 1919 के बीच अपोलो बुंदर पर काम शुरू हुआ जहां पर गेटवे ऑफ इंडिया और नए समुद्री दीवार का निर्माण किया गया| गेटवे ऑफ इंडिया की नींव का काम 1920 में पूरा किया गया था और निर्माण 1924 में समाप्त हो गया था| गेटवे ऑफ इंडिया 4 दिसंबर, 1924 को वायसराय द्वारा खोला गया| 

गेटवे ऑफ इंडिया साल 1920 में भारत सरकार द्वारा बनाया गया था| गेटवे ऑफ इंडिया की इमारत का नक्शा एक प्रवेश द्वार यानी आगंतुकों के लिए समुद्री मार्ग से भारत आने के लिए एक प्रवेश द्वार था| गेटवे ऑफ इंडिया की नींव 31 मार्च 1911 को रखी गई थी| 

आश्चर्यजनक तथ्य यह है नींव के तीन साल बाद भारत सरकार ने गेटवे ऑफ इंडिया के डिजाइन को मंजूरी दी है| डिजाइन साल 1914 में जॉर्ज विट्टेट द्वारा दिया गया था| 

निर्माण की लागत राशि 21 लाख रुपये की थी जिसको भारत सरकार द्वारा दिया गया था| पीला बेसाल्ट और प्रबलित कंक्रीट सामग्री गेटवे के निर्माण में इस्तेमाल किये गए थे| केंद्रीय गुंबद का व्यास 15 मीटर है और यह जमीन के ऊपर 26 मीटर की ऊंचाई तक है| 

4 दिसंबर 1924 कोवायसराय, पढ़ना के अर्ल द्वारा उद्घाटन किया गया था| गेटवे के चार बुर्ज है और इसको जटिल जाली के साथ बनाया गया था| छत्रपति शिवाजी और स्वामी विवेकानंद की प्रतिमाए गेटवे पर बाद में स्थापित की गयी थी|

Monday, May 20, 2019

शून्य की खोज भारत में कब और कैसे हुई?

शून्य, कुछ भी नहीं या कुछ नहीं होने की अवधारणा का प्रतीक है| आजकल शून्य का प्रयोग एक सांख्यिकीय प्रतीक और एक अवधारणा दोनों के रूप में जटिल समीकरणों को सुलझाने में तथा गणना करने में किया जाता है| इसके साथ ही शून्य कंप्यूटर का मूल आधार भी है| यह आलेख भारत में शून्य के आविष्कार से संबंधित है अर्थात इस आलेख में इस बात का उल्लेख किया गया है कि भारत में शून्य का अविष्कार कैसे और कब हुआ था| 


यह कहना गलत नहीं होगा कि गणित में शून्य की अवधारणा का आविष्कार क्रांतिकारी था| शून्य कुछ भी नहीं या कुछ नहीं होने की अवधारणा का प्रतीक है| यह एक आम व्यक्ति को गणित में सक्षम होने की क्षमता पैदा करता है| इससे पहले, गणितज्ञों को सरल अंकगणितीय गणना करने के लिए संघर्ष करना पड़ता था| आजकल शून्य का प्रयोग एक सांख्यिकीय प्रतीक और एक अवधारणा दोनों के रूप में जटिल समीकरणों को सुलझाने में तथा गणना करने में किया जाता है| इसके साथ ही शून्य कंप्यूटर का मूल आधार भी है| 

भारत में शून्य पूरी तरह से पांचवीं शताब्दी के दौरान विकसित हुआ था| वास्तव में भारतीय उपमहाद्वीप में गणित में शून्य का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है| तीसरी या चौथी शताब्दी की बख्शाली पाण्डुलिपि में पहली बार शून्य दिखाई दिया था| ऐसा कहा जाता है कि 1881 में एक किसान ने पेशावर, जो की अब पाकिस्तान में है, के पास बख्शाली गांव में इस दस्तावेज से जुड़े पाठ को खोद कर निकाला था|
यह काफी जटिल दस्तावेज है क्योंकि यह सिर्फ दस्तावेज़ का एक टुकड़ा नहीं है, बल्कि इसमें बहुत से टुकड़े हैं जो कई शताब्दी पहले लिखे गए थे| रेडियोकार्बन डेटिंग तकनीक की मदद से, जोकि आयु निर्धारित करने के लिए कार्बनिक पदार्थों में कार्बन आइसोटोप की सामग्री को मापने की एक विधि है, से यह पता चलता है कि बख्शाली पांडुलिपि में कई ग्रंथ हैं| सबसे पुराना हिस्सा 224-383 ईस्वी का है, उससे नया हिस्सा 680-779 ईस्वी का है और सबसे नया हिस्सा 885- 993 ईस्वी का है| इस पांडुलिपि में सनौबर के पेड़ के 70 पत्ते और बिंदु के रूप में सैकड़ों शून्य को दिखाया गया है| 

उस समय ये डॉट्स संख्यात्मक रूप में शून्य नहीं थे, बल्कि 101, 1100 जैसे बड़े संख्याओं के निर्माण के लिए इसे स्थान निर्धारक अंक के रूप में इस्तेमाल किया गया था| पहले इन दस्तावेजों की सहायता से व्यापारियों को गणना करने में मदद मिलती थी| कुछ और प्राचीन संस्कृतियां हैं जोकि शून्य को स्थान निर्धारक अंक के रूप में इस्तेमाल करती थी जैसे कि बेबीलोन के लोग शून्य को दो पत्ते के रूप में इस्तेमाल करते थे, माया संस्कृति के लोगों ने इसे शैल की संख्या के रूप में इस्तेमाल करते थे| इसलिए, हम कह सकते हैं कि प्राचीन सभ्यताओं को “कुछ भी नहीं” की अवधारणा पता थी लेकिन उनके पास इसे दर्शाने के लिए कोई प्रतीक नहीं था| ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के अनुसार, भारत में ग्वालियर में नौवीं शताब्दी के एक मंदिर के शिलालेख में वर्णित शून्य को सबसे पुराने रिकॉर्ड के रूप में माना जाता है| 

शून्य भारत में संख्या पद्धति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है| यहां तक कि पहले गणितीय समीकरणों को कविता के रूप में गाया जाता था| आकाश और अंतरिक्ष जैसे शब्द “कुछ भी नहीं” अर्थात शून्य का प्रतिनिधित्व करते हैं| एक भारतीय विद्वान पिंगला ने द्विआधारी संख्या का इस्तेमाल किया और वह पहले थे जिन्होंने जीरो के लिए संस्कृत शब्द 'शून्य' का इस्तेमाल किया था| 

628 ईस्वी में ब्रह्मगुप्त नामक विद्वान और गणितज्ञ ने पहली बार शून्य और उसके सिद्धांतों को परिभाषित किया और इसके लिए एक प्रतीक विकसित किया जो कि संख्याओं के नीचे दिए गए एक डॉट के रूप में था| उन्होंने गणितीय संक्रियाओं अर्थात जोड़ और घटाव के लिए शून्य के प्रयोग से संबंधित नियम भी लिखे हैं| इसके बाद महान गणितज्ञ और खगोलविद आर्यभट्ट ने दशमलव प्रणाली में शून्य का इस्तेमाल किया था|

Thursday, May 16, 2019

थ्री-डी टेलीविज़न

आप अब तक केवल 3-डी फिल्मों और वीडियो गेम्स के बारे में ही सुना होगा लेकिन शायद आप नहीं जानते कि अब टीवी मोबाइल फोन और अखबार भी 3-डी आने लगे हैं जो विज्ञान की दुनिया में सचमुच एक करिश्मा है। 

पहले बात करते हैं 3-डी फिल्मों की। आमतौर पर फिल्में द्विआयामी या टू डाइमेंशनल होती है जिसमें चित्रों की केवल लंबाई और चौड़ाई ही दिखती है जबकि त्रिआयामी यानी 3-डी फिल्मों की लंबाई चौड़ाई के अलावा दृश्यों की गहराई भी दिखाई देती है। क्या आप जानते हैं कि विश्व की सबसे पहली 3-डी फिल्म कौन सी थी? अंग्रेजी भाषा में बनी इस फिल्म का नाम 'बी' वाना डेविल' था जो कि सन् 1952 में बनी थी। शुरूआती दौर में ये फिल्में दो कैमरों के प्रयोग से बनाई जाती थीं और इन्हें देखने के लिए एक विशेष प्रकार के चश्मे को लगाना पड़ता था। 


आजकल 3-डी फिल्मों की तकनीक में थोड़ा बदलाव आ गया है। अब ऐसी फिल्मों के निर्माण के लिए ऐनाग्लिफिक 3-डी तथा पोलेराइज्ड 3-डी नामक दो प्रणालियों का इस्तेमाल होता है। ऐग्नाग्लिफिक 3-डी प्रणाली के द्वारा केवल ब्लेक एंड व्हाइट फिल्में ही बनाई जा सकती हैं। इसमें दो प्रोजेक्टरों का इस्तेमाल होता है, एक पर लाल तथा दूसरे पर नीला फिल्टर लगा होता है। जब फिल्म देखना होता है तो बायी आंख पर लाल तथा दायी आंख पर नीले फिल्टर वाला चश्मा लगाना पड़ता है जिससे आंखों द्वारा देखे गए लाल और नीले प्रतिबिंब हमारे मस्तिष्क में श्याम और श्वेत त्रिआयामी प्रतिबिंब बनाते हैं। जबकि दूसरी प्रणाली पोलेराइज्ड 3-डी में प्रोजेक्टर तथा दर्शक द्वारा ध्रुवित यानी पोलेराइज्ड फिल्डर प्रयोग किए जाते हैं। जब प्रकाश फिल्टर से गुजरता है तो ध्रुवण के फलस्वरूप दो प्रतिबिंब अलग अलग हो जाते हैं। इन फिल्मों का रंग धूसर होता है। इसके माध्यम से सभी रंगों का त्रिआयामी फिल्में बनाई जाती हैं। हां, इस फिल्मों को दिखाने के लिए एल्यूमिनाइज्ड सिल्वर स्क्रीन नामक एक विशेष परदे का इस्तेमाल करना होता है। फिलहाल सिनेमाघरों तक सीमित थ्री-डी तकनीक टेलीविजन में नजर आएगी। 

सोनी पैनासॉनिक मित्सुबिशी जैसी नामी कंपनियों ने थ्री-डी टीवी बाजार में उतारने की तैयारी कर ली है। इन कंपनियों का दावा है कि मौजूदा हाई डेफिनिशन प्लाज्मा तकनीक से लैस टेलीविजन के 3-डी स्वरूप में सामने आने से टीवी क्रांति में नए युग की शुरूआत होगी। इसका लुत्फ उठाने के लिए आपको पुराना सेट हटाना पड़ेगा। इसके साथ सेट टॉप बॉक्स और थ्री-डी चश्मे की भी जरूरत पड़ेगी। इसमें दिखाने वाले कार्यक्रम कैमरे में एक साथ दो लैसों के जरिए शूट किए जाएंगे। इससे बाई और दाई आंख में अलग-अलग तस्वीरें नजर आएंगी। हमारा दिमाग दोनों तस्वीरों को जोड़कर त्रिविमीय तस्वीरें तैयार करेगा। 

दक्षिण कोरिया की कंपनी एलजी ने दुनिया का पहला 3-डी एलईडी टीवी बाजार में पेश किया है। एलएक्स 9500 नाम के इस 55 इंच के टीवी में 480 हट्र्ज का टू मोशन प्रोसेसर, वायरलेस एवी लिंक और एचडीएमआई 1.4 सपोर्ट भी है। अगर इसमें वीडियो कैमरा लगाया जाए तो इसमें वीडियो कॉन्फ्रेसिंग भी की जा सकती है। यह डीआईवी एक्स एमपी 3 एमपीओ और जेपीईजी फाइलों को सपोर्ट करता है। इसमें क्लियर वाइस टेक्नोलॉजी वाले वूफर्स लगे हैं। बेल्जियम में फ्रेंच भाषा में छपने वाले एक अखबार ने योरोप का पहला 3-डी त्रिआयामी अंक प्रकाशित कर प्रिंट मीडिया में एक क्रांतिकारी कदम बढ़ाया है। 

अखबार ला डार्नियर (डीएच) ने अपने इस विशेषांक के सभी फोटो और विज्ञान को 3-डी प्रारूप में प्रकाशित किया है। अखबार के इस विशेषांक को मोटे कागज से बने हुए चश्मे की मदद से देखा जा सकता है। ला डार्नियर के संपादक कहना है कि इस 3-डी अंक की लागत को देखते हुए इस तरह के और अंक छापे जाने की कोई योजना नहीं है। फ्रांस के विश्लेषकों ने अखबार के इस साहसिक कदम को सलाम किया है, लेकिन कहा है कि यह अभी यह पूरी तरह दोष रहित होने से काफी दूर है। सभी प्रतियों के साथ एक 3-डी चश्मा भी बांटा गया। बिना चश्मे के सभी विज्ञापन धुंधले दिख रहे थे। एक दिन पहले इसकी सूचना भी दी गई थी। 

चीन के ग्वांगजू इंस्टीटयूट ऑफ साइंस एंड टेक्नालॉजी के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा 3-डी ई-बुक तैयार किया है, जिसमें कहानी के कथानकों को आप जीवंत रूप में देख सकते हैं। इसके लिए आपको खासतौर पर बने कम्प्यूटर स्क्रीन वाले चश्मे पहनने पडेंगे। इससे न सिर्फ किताब का कंटेंट थ्री-डी यानी त्रिविमीय रूप में दिखेगा, बल्कि उसमें शामिल चित्र और कथानक भी बिल्कुल जीवंत स्वरूप में नजर आएंगे। ग्वांगजू इंस्टीटयूट के वैज्ञानिकों ने फिलहाल इस तकनीक के जरिए स्थानीय कथानकों के आधार पर दो ई-बुक्स बनाई है। इन किताबों में दहाड़ने वाले ड्रेगन, उड़ने वाले पात्र से नदी पहाड़ आदि शामिल है। वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्होंने पृथ्वी का अब तक का सबसे सूक्ष्म त्रिआयामी 3-डी मानचित्र तैयार किया है। यह मानचित्र इतना सूक्ष्म है कि नमक के एक दाने के आकार में ऐसे 1000 मानचित्र समा सकते हैं। 

कम्प्यूटर की दिग्गज कम्पनी आईवीएम के एक दल ने अनोखी तकनीक की मदद से यह मानचित्र तैयार किया है, जो पेंसिल की नोंक से एक लाख गुना छोटा है और इसका आकार 15 नैनोमीटर जितना है इसके बनाने में जहां कम जटिलताओं का सामना करना पड़ा है, वहीं इसकी लागत भी काफी कम आई है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस नई तकनीक के ईजाद होने से इलेक्ट्रानिक भविष्य की चिप तकनीक, औषधि विज्ञान, जीवन विज्ञान और ऑप्टो इलेक्ट्रानिक्स जैसे क्षेत्रों में नैनो उत्पाद के विकास को लेकर नया द्वार खुलेगा। इस 3-डी नक्शे का आकार 2211 माइक्रोमीटर हैं जिसे पॉलिमर पर लिखा गया है। नमक के एक दाने में ऐसे 1000 नक्शे समा सकते हैं।

ग्रीनहाउस प्रभाव क्या है?


ग्रीनहाउस प्रभाव एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी ग्रह या उपग्रह के वातावरण में उपस्तिथि कुछ गैसें वातावरण के तापमान को अपेक्षाकृत अधिक बनाने में सहयता करतीं हैं| इन ग्रीनहाउस गैसों में कार्बन डाई आक्साइड, जल-वाष्प, मिथेन आदि गैस शामिल हैं| यदि ग्रीनहाउस प्रभाव नहीं होता तो शायद ही धरती पर जीवन होता|  अगर ग्रीनहाउस प्रभाव नहीं होता तो पृथ्वी का औसत तापमान -18° सेल्सियस होता न कि वर्तमान 15° सेल्सियस होता| धरती के वातावरण के तापमान को प्रभावित करने वाले बहुत से कारक हैं जिसमें से ग्रीनहाउस प्रभाव एक कारक है|

Wednesday, May 15, 2019

केन्द्रीय गृह मंत्रालय लिया ने भारतीय मूल के लोगों की “ब्लैक लिस्ट” को समाप्त करने का फैसला

केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने हाल ही में भारतीय मूल के लोगों के लिए “ब्लैक लिस्ट” को समाप्त करने का निर्णय लिया है। यह सूची भारतीय मिशन (विभिन्न देशों में मौजूद भारतीय दूतावास) के पास होती है। 


इस सूची में उन भारतीय मूल के लोगों के नाम शामिल होता हैं जो भारत में उत्पीड़न किये जाने का हवाला दे कर दूसरे देश में शरण मांगते हैं। इस प्रकार की शरण मांगने वाले भारतीय मूल के लोगों में सिख समुदाय के लोगों की अधिकता हैं।

इस सूची में शामिल लोगों को भारतीय मिशन (भारतीय दूतावास) द्वारा वीज़ा नहीं दिया जाता है। 

भारतीय मूल के वे लोग (तथा उनके परिवार के सदस्य) जिन्होंने किसी दूसरे देश में शरण ली है और उनका नाम “ब्लैक लिस्ट” में नहीं है, उन्हें निवास के देश के नागरिक की तरह ही भारत का वीज़ा मिलेगा। यदि उनका पिछले दो वर्षों का वीज़ा सामान्य है तो वे ओवरसीज सिटीजनशिप ऑफ़ इंडिया (OCI) कार्ड प्राप्त कर सकते हैं।
ओवरसीज सिटीजनशिप ऑफ़ इंडिया (OCI) कार्ड एक प्रवासी स्टेटस है, इससे भारतीय मूल के विदेशी नागरिक भारत में अनिश्चित काल तक रह सकता है तथा यहाँ पर कार्य कर सकता है।

Monday, April 8, 2019

अमेरिका के 16 वें राष्ट्रपति : अब्राहम लिंकन

अब्राहम लिंकन अमेरिका के 16 वें राष्ट्रपति थे। उन्होंने ही अमेरिका में दास प्रथा (गुलामी प्रथा) का अंत किया था। उनका जन्म एक गरीब अश्वेत परिवार में 14 अप्रैल 1865 को हुआ था। उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका में गृह युद्ध के दौरान देश का नेतृत्व किया। 

उन्होंने दास प्रथा का अंत किया, सरकार और अर्थव्यवस्था को मजबूत किया। वो सदैव सत्य और अच्छाई का पक्ष लेते थे। उन्होंने वकील के पेशे में हमेशा न्याय का साथ दिया। अन्याय का पक्ष उन्होंने कभी नही लिया। उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गयी। 



अब्राहम लिंकन का जन्म 12 फरवरी 1809 को होड्जेविल्ले, केंटकी में हुआ था। वो एक गरीब परिवार में जन्मे थे। उनकी पढ़ाई घर पर ही हुई थी। अब्राहम लिंकन इलिनॉय में वकालत करने लगे। 

उनके पिता का नाम थॉमस और उनकी माता का नाम नैंसी हैंक्स लिंकन था। अब्राहम लिंकन के पिता को पैसों के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता था। जब अब्राहम 9 साल के थे तब उनकी मां का देहांत हो गया था। 

लिंकन की मां के गुजरने के बाद उनके पिता ने फिर से विवाह कर लिया। सौतेली मां ने लिंकन को अपने बेटे की तरह प्यार दिया और उनका मार्गदर्शन किया। बचपन से ही अब्राहम को पढ़ने लिखने का बहुत शौक था। 

उनको किताबें पढ़ना बहुत प्रिय था। किताबों के लिए वह मीलों दूर तक पैदल ही चले जाते थे। “द लाइफ ऑफ जॉर्ज वाशिंगटन” उनकी प्रिय पुस्तक थी। 21 वर्ष का हो जाने के बाद अब्राहम ने बहुत तरह के काम किए। 

उन्होंने दुकानदार, पोस्ट मास्टर, सर्वेक्षक जैसी बहुत सी नौकरियां की। जीविका के लिए वह कुल्हाड़ी से लकड़ी काटने का काम करने लगे। उन्होंने सुअर काटने से लेकर लकड़हारे तक का काम किया, और खेतों में मजदूरी भी की। 

1843 में अब्राहम लिंकन ने मैरी टॉड नामक लड़की से विवाह कर लिया। सभी लोग मेरी टॉड को एक महत्वकांक्षी नकचढ़ी घमंडी लड़की समझते थे। मैरी के बारे में यह बात बहुत प्रसिद्ध थी कि वह हमेशा कहती थी कि वह उस पुरुष से विवाह करेगी जो अमेरिका का राष्ट्रपति बनेगा। 

इस बात के लिए सभी लोग उसका बहुत मजाक उड़ाते थे। लिंकन की पत्नी ने 4 बच्चों को जन्म दिया पर उनमें से सिर्फ एक रॉबर्ट टॉड ही जीवित बचा। सब लोग ऐसी बातें करते हैं कि लिंकन की पत्नी उनसे बात-बात पर झगड़ा करती थी और उनको बिल्कुल भी सम्मान नहीं देती थी 

राष्ट्रपति बनने से पहले अब्राहम लिंकन ने 20 सालों तक वकालत की, पर इस दौरान उन्होंने सदैव सत्य और न्याय का ही साथ दिया। उन्होंने महात्मा गांधी की तरह कभी भी झूठे मुकदमे नहीं लिए। सदा सत्य और न्याय से जुड़े मुकदमे ही लिए। 

अब्राहम लिंकन ने वकालत से कभी बहुत ज्यादा पैसा नहीं कमाया क्योंकि वह गरीब व्यक्तियों से बहुत कम पैसा लेते थे। बहुत से मुकदमों का निपटारा वह न्यायालय से बाहर ही कर देते थे जिसमें उनको ना के बराबर फीस मिलती थी। 

वो अपने मुवक्किलों को कोर्ट के बाहर ही सुलह करने की सलाह देते थे जिससे समय और धन की बर्बादी ना हो। एक बार उनके एक मुवक्किल ने उनको $25 फीस दी, पर लिंकन ने सिर्फ $15 लिए और $10 वापस कर दिए। 

लिंकन ने कहा कि उनकी फीस सिर्फ $15 ही बनती है। उनकी ईमानदारी और सच्चाई की बहुत ही कहानियां है। लिंकन ने कभी भी झूठे मुकदमों को नहीं लड़ा। हमेशा सच का साथ दिया। वह कभी भी धन के लोभी नहीं रहे। 

यही वजह थी कि वह वकालत के समय बहुत कम पैसा ही कमा पाते थे। वह किसी भी धर्म का पक्ष नहीं लेते थे। वह कहते थे कि जब मैं अच्छा काम करता हूं तो अच्छा अनुभव करता हूं और जब बुरा काम करता हूं तो बुरा अनुभव करता हूं। यही मेरा धर्म है। 

अब्राहम लिंकन न्यू रिपब्लिकन पार्टी के सदस्य थे। रिपब्लिकन पार्टी दास प्रथा को खत्म करना चाहती थी। उनका विचार था कि मनुष्य को दास बनाकर खरीदना बेचना या रखना अमानवीय कार्य है। दास प्रथा को लेकर पूरा अमेरिका देश बंटा हुआ था। 

आधे लोग चाहते थे कि दास प्रथा खत्म हो जाए जबकि आधे लोग चाहते थे कि यह जारी रहे। दक्षिण अमेरिका के गोरे निवासी चाहते थे कि गुलाम (अश्वेत) उनके खेतों में मजदूरों की तरह काम करें। गोरे अश्वेत नागरिकों को अपना गुलाम बनाना चाहते थे। 1860 में अब्राहम लिंकन को अमेरिका के 16 राष्ट्रपति के रूप में चुना गया। 

15 अप्रैल 1865 में अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डीसी में एक सिनेमाघर में अब्राहम लिंकन की गोली मारकर हत्या कर दी गई। जाने माने अभिनेता जॉन वाइक्स बूथ ने उनकी हत्या की जब वो “ऑवर अमेरिकन कजिन” नाटक देख रहे थे। 

दिलचस्प बात यह थी कि लिंकन को जिस वक्त गोली मारी गई थी उस वक्त उनके निजी सुरक्षागार्ड जॉन पार्कर उनके साथ मौजूद नहीं थे। लिंकन को गोली मारने वाले जॉन वाइक्स बूथ को 10 दिन बाद वर्जीनिया के एक फार्म से पकड़ा गया, जहां अमेरिकी सैनिकों ने उन्हें एक मुठभेड़ में मार गिराया। 

लिंकन की तस्वीर अमेरिका के नोटों पर होती है। $5 के नोट पर अब्राहम लिंकन की तस्वीर होती है। इसके अलावा अमरीकी सेंट / पैनी पर भी अब्राहम लिंकन की तस्वीर होती है। उनके सम्मान में अनेक डाक टिकट भी जारी किए गए हैं। डाक टिकट में वह सदैव दाढ़ी में दिखते हैं। लिंकन की सबसे प्रसिद्ध मूर्ति माउंट रशमोर में बनी है। 

जिसे लिंकन मेमोरियल के नाम से जाना जाता है। वाशिंगटन डीसी में पीटरसन हाउस में भी उनकी बड़ी सी प्रतिमा बनी है। स्प्रिंगफील्ड इलिनॉय में अब्राहम लिंकन लाइब्रेरी और संग्रहालय बना हुआ है। लिंकन के घर के पास ही उनकी कब्र बनाई गई है।

Friday, April 5, 2019

दुनिया का पहला 5G मोबाइल नेटवर्क

इंटरनेट की दुनिया की एक नई तकनीक 5G लाॅन्च होने के लिए तैयार है। 2G , 3G, 4G नेटवर्क के बाद अब दक्षिण कोरिया पांच अप्रैल को पूरे देशभर में 5जी नेटवर्क की सुविधा लाॅन्च करेगा। इसके बाद द.कोरिया 5जी नेटवर्क वाला पहला देश बनेगा। 5जी नेटवर्क आने के बाद वायरलेस इंटरनेट की रफ्तार 4जी नेटवर्क की तुलना में 20 गुना तक बढ़ जाएगी। 


अगले साल तक भारत में भी होगी शुरू 

5 जी के लिए इस साल जुलाई या अगस्त में स्पेक्ट्रम की निलामी होनी की उम्मीद है। स्पेक्ट्रम खरीदने के बाद कंपनियां इन्फ्रास्टक्चर तैयार करेंगी फिर सर्विसेस शुरू होंगी। माना जा रहा है भारत में 5जी सेवा अगले साल ही शुरू होगी। 



इतनी होगी स्पीड 

4G नेटवर्क की अधिकतम स्पीड अब तक 45 मेगाबाइट प्रति सेकेंड रिकाॅर्ड की गई है। 5G में यह स्पीड 1 गीगाबाइट प्रति सेकेंड पहुंच जाएगी। यानी ढ़ाई घंटे की एक हाई क्वालिटी फिल्म को एक सेकेंड में डाउनलोड किया जा सकता है। माना जा रहा है कि 5G नेटवर्क आने के बाद टोस्टर से टेलीफोन और इलेक्ट्रिक कार से पावर ग्रिड तक तकनीक में बदलाव देखने को मिलेंगे। 


5G नेटवर्क के बारे में जानिए ये बातें 

  1. 5G यूजर्स को 4G नेटवर्क से 20 गुना ज्यादा स्पीड मिलेगी। इस स्पीड का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं एक पूरी एचडी फिल्म सिर्फ 1 सेकंड में डाउनलोड की जा सकेगी। 
  2. 5G यूजर्स को भीड़ में भी अपने मोबाइल प्रोवाइडर से कनेक्ट होने में 3G और 4G नेटवर्क्स के मुकाबले कोई दिक्कत नहीं होगी। 
  3. एक पॉइंट से दूसरे पॉइंट तक डेटा का एक पैकेट पहुंचने में जितना समय लगता है उसे लेटेंसी कहते हैं। 5G के केस में, लेटेंसी रेट 1 मिलिसेकंड होगा जबकि 4G नेटवर्क में यह रेट 10 मिलिसेकंड होता है। 
  4. 5G नेटवर्क के अडवांस्ड ऐप्लीकेशन के रूप में आप स्व:चलित गाड़ियों को सकेंगे। ये गाड़ियां 5G नेटवर्क के जरिए नियंत्रित की जा सकेंगी।

Thursday, April 4, 2019

इंग्ल‍िश होगी शानदार अगर याद कर लेंगे ये 10 शब्द खास

जानिए अंग्रेजी के ऐसे 10 शब्दों के बारे में जिसका इस्तेमाल ज्यादातर लोग नहीं करते हैं| लेकिन अच्छी अंग्रेजी सीखने के लिए इनको याद करना जरूरी है :

इंग्लिश शब्दों के हिसाब से काफी धनी भाषा है| इससे हम लोगों को भी खूब फायदा लेने की जरूरत है| यहां कई ऐसे शब्द हैं जो उपयोग के हिसाब से कॉमन नहीं होते हैं और आप उनके बारे में कम ही जानते हैं| जानिए ऐसे ही शब्दों के बारे में...

  1. Overmorrow: अंग्रेजी में कल के बाद वाले दिन को बताने के लिए ज्यादातर लोग The Day After Tommorow का प्रयोग करते हैं| इतने लंबे वाक्य से बचने के लिए आप Overmorrow शब्द का इस्तेमाल कर सकते हैं|
  2. Tittle: i और j के ऊपर वाले डॉट को क्या कहते हैं| जरा दिमाग पर जोर दीजिए और बताइए| अगर आपको पता चल गया हो तो अच्छी बात है| जिन लोगों को अभी भी पता नहीं चल पाया है तो बता दें कि इसे Tittle कहते हैं|
  3. Glabella: इस शब्द का इस्तेमाल आप दोनों भौहों के बीच की जगह को बताने के लिए कर सकते हैं|
  4. Obelus: ÷ इसे क्या कहते हैं? आप सिंपल सा जवाब देंगे कि यह Division का चिन्ह है| हां, यह Division का ही चिन्ह है| और इसे Obelus कहा जाता है|
  5. Vagitus: जब कोई नवजात शिशु रोता है तो उसके रोने को Cry बोलने से ज्यादा बेहतर है कि आप Vagitus बोलें|
  6. Barm: बीयर के झाग को Barm कहते हैं|
  7. Purlice: तर्जनी उंगली और अंगूठे के बीच की खाली जगह को Purlicue कहते हैं|
  8. Snellen Chart: जब आप अपने आंखों की जांच करवाने के लिए अस्पताल जाते हैं तो वहां आपको एक चार्ट पढ़ने के लिए दिया जाता है, जिस पर Alphabet लिखे रहते हैं| इस चार्ट को Snellen Chart कहते हैं|
  9. Aphthongs: Knee, Island, half इन शब्दों को बोलते समय आप पहले शब्द में K, दूसरे शब्द में S और तीसरे शब्द में L को साइलेंट रखकर बोलते हैं| इन साइलेंट अक्षरों को ही Aphthongs कहा जाता है|
  10. Rasceta: आपकी कलाई पर बनने वाली लकीरों को Rasceta कहा जाता है|

Tuesday, April 2, 2019

चाइनामैन बॉलिंग क्या है?

क्रिकेट में चाइनामैन बॉलिंग शब्द काफी प्रचलित और जब से टीम इंडिया में चाइनामैन गेंदबाज कुलदीप यादव टीम इंडिया में आये है तब से ही ये शब्द भारतीय प्रशंसको के लिए पहेली सा बना हुआ है| आज ऐसे बहुत से क्रिकेट प्रशंसक है जिनको चाइनामैन के पीछे की कहानी नहीं पता है| अगर आपको भी नहीं पता है तो आज हम आपको बताएँगे कि चाइनामैन बॉलिंग शब्द कहा से आया है और चाइनामैन गेंदबाजी क्या होती है| 


साल 1933 में वेस्टइंडीज और इंग्लैंड के बीच मेनचेस्टर में टेस्ट मैच खेला जा रहा था वेस्टइंडीज में एक चीनी मूल के गेंदबाज एलिस अचोंग शामिल थे| जो उस समय बेहतरीन गेंदबाजी करते थे| इस टेस्ट मैच में जब इंग्लैंड के बल्लेबाज वाल्टर रॉबिन्स बेटिंग कर रहे थे तब गेंदबाज एलिस अचोंग ने ऐसी बॉल डाली जो ऑफ स्टंप के बाहर से टर्न होकर स्टंप पर जा लगी थी| 

वाल्टर रॉबिन्स इस गेंद को बिलकुल नहीं समझ पाए थे| रॉबिन्स ने आश्चर्यजनक गेंद करने के बाद पवेलियन लौटते समय अंपायर से कहा, ‘चाइनामैन ने शानदार गेंदबाजी की|’ यही से चाइनामैन बॉलिंग शब्द लोकप्रिय हो गया और फिर आगे चलकर इन्हें चाइनामैन कहा जाने लगा| 

इस गेंदबाजी में लेफ्ट आर्म गेंदबाज अपनी अँगुलियों से नहीं बल्कि अपनी कलाइयों से गेंद को स्पिन कराता है और इस गेंदबाजी को ही चाइनामैन गेंदबाजी कहा जाता है| टीम इंडिया कुलदीप यादव एकलौते खिलाड़ी है जो चाइनामैन बॉलिंग करते है| वैसे आपको बता दे दुनिया में बहुत से गेंदबाज है जो चाइनामैन गेंदबाज शब्द से प्रसिद्ध हुए है| जिनमें वेस्टइंडीज के एलिस अचोंग और गैरी सोबर्स, इंग्लैंड के जॉनी वार्ड्ले और ऑस्ट्रेलिया के ब्रैड हॉग का नाम शामिल है| 

Monday, April 1, 2019

आप Allo में अपनी Google Assistant से क्या पूछ सकते हैं


आप अपनी Google Assistant से जानकारी मांग सकते हैं, कामों में मदद ले सकते हैं या कॉल करने जैसे आदेश दे सकते हैं. आप कुछ विचार पाने के लिए अपनी Google Assistant से ''तुम क्या कर सकती हो? यह भी पूछ सकते हैं.
आप अपनी Google Assistant से क्या करने के लिए कह सकते हैं, उसके उदाहरण यहां दिए गए हैं:

आसपास क्या है

  • मौसम: आज मौसम कैसा है? इस सप्ताहांत में मौसम कैसा रहेगा?
  • भोजन: आस-पास कौन से रेस्तरां हैं? मेरी आज रात पिज़्ज़ा खाने की इच्छा है.
  • व्यवसाय और स्थानीय क्षेत्र: सबसे नज़दीकी गैस स्टेशन कहां है? दवा की कौन सी दुकान खुली है?
  • रास्ते: हवाई अड्डे तक जाने में कितना समय लगेगा? घर पहुंचने में कितना समय लगेगा?

व्यक्तिगत और मज़ा

  • अपनी जानकारी के साथ मनमुताबिक बनाएं: अपनी Google Assistant से पूछें, ''मेरा नाम क्या है?''या अपनी Google Assistant को खुद के बारे में बताएं, जैसे ''मैं जेनी हूं. मैं शाकाहारी हूं. मेरा पसंदीदा रंग नीला है.'' या आप अपनी Google Assistant को अपनी प्राथमिकताएं बता सकते हैं, जैसे हमेशा फ़ारेनहाइट का इस्तेमाल करें. (आप अपनी Google Assistant को जानकारी भूलने के लिए कह सकते हैं और वह उसे भूल जाएगी.)
  • कॉल करें: मां को कॉल करें. जॉन को कॉल करें.
  • गेम खेलें: ट्रिविया खेलें. इमोजी गेम खेलें.

कार्य

  • कैलेंडर और रिमाइंडर: मंगलवार को दोपहर 3 बजे सुनील के साथ मीटिंग शेड्यूल करें. मुझे कल के लिए मेरा शेड्यूल दिखाएं.
  • घड़ी: सुबह 6 बजे का अलार्म सेट करें. 30 सेकंड का टाइमर सेट करें.
  • फ़ोटो: मेरी समुद्र तट की फ़ोटो दिखाएं. मुझे कुत्ते के बच्चों की तस्वीरें दिखाएं.
  • अनुवाद (100 से अधिक भाषाओं के बारे में पूछें): ''आप कैसे हैं?'' को जर्मन में क्या कहते हैं. अरबी में ''सुप्रभात'' को क्या कहते हैं?

जानकारी मांगें

  • मनोरंजन: मुझे नई पिक्सर फ़िल्म का ट्रेलर दिखाएं. मेरे लिए गाना चलाएं.
  • समाचार: मुझे ताज़ा समाचार दिखाएं. मुझे हर दिन सुबह 10 बजे समाचार भेजें.
  • तथ्य: आकाशगंगा में कितने ग्रह हैं? माउंट एवरेस्ट कितना ऊंचा है?

Sunday, March 31, 2019

भारत का राजचिन्ह

भारत का राजचिन्ह, भारतीय पहचान और विरासत का मूलभूत हिस्‍सा हैं। विश्‍व भर में बसे विविध पृष्‍ठभूमियों के भारतीय इन राष्‍ट्रीय प्रतीकों पर गर्व करते हैं क्‍योंकि वे प्रत्‍येक भारतीय के हृदय में गौरव और देश भक्ति की भावना का संचार करते हैं। 

अशोक चिह्न भारत का राजकीय प्रतीक है। इसको सारनाथ में मिली अशोक लाट से लिया गया है। मूल रूप इसमें चार शेर हैं जो चारों दिशाओं की ओर मुंह किए खड़े हैं। इसके नीचे एक गोल आधार है जिस पर एक हाथी के एक दौड़ता घोड़ा, एक सांड़ और एक सिंह बने हैं। ये गोलाकार आधार खिले हुए उल्टे लटके कमल के रूप में है। हर पशु के बीच में एक धर्म चक्र बना हुआ है। 


राष्‍ट्र के प्रतीक में जिसे 26 जनवरी 1950 में भारत सरकार द्वारा अपनाया गया था केवल तीन सिंह दिखाई देते हैं और चौथा छिपा हुआ है, दिखाई नहीं देता है। चक्र केंद्र में दिखाई देता है, सांड दाहिनी ओर और घोड़ा बायीं ओर और अन्‍य चक्र की बाहरी रेखा बिल्‍कुल दाहिने और बाई छोर पर। घंटी के आकार का कमल छोड़ दिया जाता है। 

प्रतीक के नीचे सत्यमेव जयते देवनागरी लिपि में अंकित है। शब्‍द सत्‍यमेव जयते शब्द मुंडकोपनिषद से लिए गए हैं, जिसका अर्थ है केवल सच्‍चाई की विजय होती है। वास्तविक सारनाथ राज चिन्ह में चार एशियाई शेरों के पीछे पीछे खड़े हुए हैं,जो शक्ति, साहस, आत्मविश्वास और गौरव का प्रतीक है। नीचे एक घोड़ा और एक बैल है, और इसके केंद्र में एक सुंदर पहिया (धर्म चक्र) है। एक हाथी (पूरब के), एक बैल (पश्चिम), घोड़े (दक्षिण), और शेर (उत्तर की) है जो बीच में पहियों से अलग होते हैं। पूरे फूल में एक कमल पर, जीवन के स्फटिक और रचनात्मक प्रेरणा का उदाहरण देते हुए। बलुआ पत्थर के एक ही खंड से खुदी हुई, पॉलिश पूंजी को कानून के पहिये (धर्म चक्र) द्वारा ताज पहनाया गया है।

1 9 50 में माधव साहनी द्वारा अपनाया गया प्रतीक में, केवल तीन शेर दृश्यमान हैं, चौथा दृश्य से छिपा हुआ है। दायीं तरफ बैल और बाईं ओर घूमने वाला घोड़ा है, और चरम दाएं और बायीं ओर धर्म चक्र की रूपरेखा है। प्रतीक का एक अभिन्न अंग बनाने से देवनागरी लिपि में अभिलेख के नीचे लिखा गया आदर्श वाक्य है: सत्यमेव जयते यह मुंडका उपनिषद से एक उद्धरण है, पवित्र हिंदू वेदों का समापन भाग का श्लोक है।

Saturday, March 30, 2019

FSSAI क्या है?

हम सभी कुछ न कुछ बाज़ार से खाने की चीजे खरीदते रहते है| आप शायद एसी चीजों पर FSSAI लिखा हुआ देखा होगा; पर क्या आपको यह सवाल उठता है कि FSSAI क्या है? 

अगर आपके दिमाग में ऐसा सवाल नहीं भी उठा तो भी आपको FSSAI के बारे में जरूर जानना चाहिए क्युकी यह कोई साधारण चीज नहीं है और कई बार इसे जुड़े हुए सवाल कई सारे पेपर्स में भी आते है। अब जब खाने-पीने की चीजों में इसका आइकॉन आता है तो अब आप यह तो समझ ही गए होंगे की यह Foods अर्थात खाध्य सामग्री से जुड़ा हुआ है।


FSSAI का लक्ष्य ग्राहकों को जहरीले तथा खतरनाक खाद्य पदार्थों से बचाना होता है। खाद्य पदार्थों के विनिर्माण से लेकर उनकी पैकेजिंग तक के लिए FSSAI ने मानक निर्धारित किया है। जिससे की ग्राहकों को वह खाद्य पदार्थ उपलब्ध हो सके जिससे की उन्हें नुकसान ना हो।

खाद्य पदार्थों की सुरक्षा को लेकर इस एजेंसी की स्थापना की गई। खाद्य सुरक्षा के अधिनियम के तहत खाद्य पदार्थ में मिलावट, तथा उत्पाद के लिए किसी ग्राहक को भ्रम में रखने पर बहुत सख्ती होती है। इसलिए अगर खाद्य से सम्बन्धित आप किसी प्रकार का बिज़नेस करते है तो उसके लिए FSSAI लाइसेंस होना ज़रुरी है।

FSSAI भारत सरकार की एजेंसी है। यह मानव के उपभोग के लिए भोजन का वितरण, उत्पादन, भंडारण, बिक्री को उपलब्ध करवाने का काम करती है। इसका काम यह सुनिश्चित करना भी होता है की नागरिकों को स्वस्थ और सुरक्षित भोजन मिल रहा है या नहीं।

FSSAI सिर्फ देश में ही खाद्य वस्तुओं की देखरेख नहीं करता बल्कि देश से जो वस्तुएँ इम्पोर्ट होती है उनकी भी देख-रेख करता है। FSSAI की स्थापना केंद्र सरकार द्वारा एक्ट 2006 के तहत 2011 में की गई थी। इसका मुख्यालय दिल्ली में स्थित है।

FSSAI खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता, भोजन में प्रयोग किया जान वाला रासायनिक, भोजन का रंग, महक, आकार आदि की जांच करता है। तथा जांच सही होने पर ही उसे विक्रेताओं के माध्यम से बाजार में बेचा जाता है। FSSAI समय-समय पर खुदरा एवं थोक खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता भी जांचता है।

Friday, March 29, 2019

गणित के जादूगर रामानुजन

महज 32 साल की उम्र में दुनिया से विदा हो गए रामानुजन, लेकिन इस कम समय में भी वह गणित में ऐसा अध्याय छोड़ गए, जिसे भुला पाना मुश्किल है। अंकों के मित्र कहे जाने वाले इस जुनूनी गणितज्ञ की क्या है कहानी? 

जुनून जब हद से गुजरता है, तो जन्म होता है रामानुजन जैसी शख्सियत का। स्कूली शिक्षा भी पूरी न कर पाने के बावजूद वे दुनिया के महानतम गणितज्ञों में शामिल हो गए, तो इसकी एक वजह थी गणित के प्रति उनका पैशन। सुपर-30 के संस्थापक और गणितज्ञ आनंद कुमार की मानें, तो रामानुजन ने गणित के ऐसे फार्मूले दिए, जिसे आज गणित के साथ-साथ टेक्नोलॉजी में भी प्रयोग किया जाता है। उनके फार्मूलों को समझना आसान नहीं है। यदि कोई पूरे स्पष्टीकरण के साथ उनके फार्मूलों को समझ ले, तो कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से उसे पीएचडी की उपाधि आसानी से मिल सकती है। 


अंकों से दोस्ती 

22 दिसंबर, 1887 को मद्रास [अब चेन्नई] के छोटे से गांव इरोड में जन्म हुआ था श्रीनिवास रामानुजन का। पिता श्रीनिवास आयंगर कपड़े की फैक्ट्री में क्लर्क थे। आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, लेकिन बच्चे की अच्छी परवरिश के लिए वे सपरिवार कुंभकोणम शहर आ गए। हाईस्कूल तक रामानुजन सभी विषयों में अच्छे थे। पर गणित उनके लिए एक स्पेशल प्रोजेक्ट की तरह था, जो धीरे-धीरे जुनून की शक्ल ले रहा था। सामान्य से दिखने वाले इस स्टूडेंट को दूसरे विषयों की क्लास बोरिंग लगती। वे जीव विज्ञान और सामाजिक विज्ञान की क्लास में भी गणित के सवाल हल करते रहते। 

छिन गई स्कॉलरशिप 

चमकती आंखों वाले छात्र रामानुजन को अटपटे सवाल पूछने की आदत थी। जैसे विश्व का पहला पुरुष कौन था? पृथ्वी और बादलों के बीच की दूरी कितनी होती है? बेसिर-पैर के लगने वाले सवाल पूछने वाले रामानुजन शरारती बिल्कुल भी नहीं थे। वह सबसे अच्छा व्यवहार करते थे, इसलिए स्कूल में काफी लोकप्रिय भी थे। दसवीं तक स्कूल में अच्छा परफॉर्म करने की वजह से उन्हें स्कॉलरशिप तो मिली, लेकिन अगले ही साल उसे वापस ले लिया गया। कारण यह था कि गणित के अलावा वे बाकी सभी विषयों की अनदेखी करने लगे थे। फेल होने के बाद स्कूल की पढ़ाई रुक गई। 

कम नहीं हुआ हौसला 

अब पढ़ाई जारी रखने का एक ही रास्ता था। वे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगे। इससे उन्हें पांच रुपये महीने में मिल जाते थे। पर गणित का जुनून मुश्किलें बढ़ा रहा था। कुछ समय बाद दोबारा बारहवीं कक्षा की प्राइवेट परीक्षा दी, लेकिन वे एक बार फिर फेल हो गए। देश भी गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा था और उनके जीवन में भी निराशा थी। ऐसे में दो चीजें हमेशा रहीं-पहला ईश्वर पर अटूट विश्वास और दूसरा गणित का जुनून। 

नौकरी की जद्दोजहद 

शादी के बाद परिवार का खर्च चलाने के लिए वे नौकरी की तलाश में जुट गए। पर बारहवीं फेल होने की वजह से उन्हें नौकरी नहीं मिली। उनका स्वास्थ्य भी गिरता जा रहा था। बीमार हालात में जब भी किसी से मिलते थे, तो उसे अपना एक रजिस्टर दिखाते। इस रजिस्टर में उनके द्वारा गणित में किए गए सारे कार्य होते थे। किसी के कहने पर रामानुजन श्री वी. रामास्वामी अय्यर से मिले। अय्यर गणित के बहुत बड़े विद्वान थे। यहां पर श्री अय्यर ने रामानुजन की प्रतिभा को पहचाना और उनके लिए 25 रुपये मासिक छात्रवृत्ति का प्रबंध भी कर दिया। मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में भी क्लर्क की नौकरी भी मिल गई। यहां काम का बोझ ज्यादा न होने के कारण उन्हें गणित के लिए भी समय मिल जाता था। 

बोलता था जुनून 

रात भर जागकर वे गणित के नए-नए सूत्र तैयार करते थे। शोधों को स्लेट पर लिखते थे। रात को स्लेट पर चॉक घिसने की आवाज के कारण परिवार के अन्य सदस्यों की नींद चौपट हो जाती, पर आधी रात को सोते से जागकर स्लेट पर गणित के सूत्र लिखने का सिलसिला रुकने के बजाय और तेज होता गया। इसी दौरान वे इंडियन मैथमेटिकल सोसायटी के गणितज्ञों संपर्क में आए और एक गणितज्ञ के रूप में उन्हें पहचान मिलने लगी। 

सौ में से सौ अंक 

ज्यादातर गणितज्ञ उनके सूत्रों से चकित तो थे, लेकिन वे उन्हें समझ नहीं पाते थे। पर तत्कालीन विश्वप्रसिद्ध गणितज्ञ जी. एच. हार्डी ने जैसे ही रामानुजन के कार्य को देखा, वे तुरंत उनकी प्रतिभा पहचान गए। यहां से रामानुजन के जीवन में एक नए युग का सूत्रपात हुआ। हार्डी ने उस समय के विभिन्न प्रतिभाशाली व्यक्तियों को 100 के पैमाने पर आंका था। अधिकांश गणितज्ञों को उन्होने 100 में 35 अंक दिए और कुछ विशिष्ट व्यक्तियों को 60 अंक दिए। लेकिन उन्होंने रामानुजन को 100 में पूरे 100 अंक दिए थे। 

उन्होंने रामानुजन को कैंब्रिज आने के लिए आमंत्रित किया। प्रोफेसर हार्डी के प्रयासों से रामानुजन को कैंब्रिज जाने के लिए आर्थिक सहायता भी मिल गई। अपने एक विशेष शोध के कारण उन्हें कैंब्रिज विश्वविद्यालय द्वारा बी.ए. की उपाधि भी मिली, लेकिन वहां की जलवायु और रहन-सहन में वे ढल नहीं पाए। उनका स्वास्थ्य और खराब हो गया। 

अंतिम सांस तक गणित 

उनकी प्रसिद्घि बढ़ने लगी थी। उन्हें रॉयल सोसायटी का फेलो नामित किया गया। ऐसे समय में जब भारत गुलामी में जी रहा था, तब एक अश्वेत व्यक्ति को रॉयल सोसायटी की सदस्यता मिलना बहुत बड़ी बात थी। और तो और, रॉयल सोसायटी के पूरे इतिहास में इनसे कम आयु का कोई सदस्य आज तक नहीं हुआ है। रॉयल सोसायटी की सदस्यता के बाद वह ट्रिनिटी कॉलेज की फेलोशिप पाने वाले पहले भारतीय भी बने। 

करना बहुत कुछ था, लेकिन स्वास्थ्य ने साथ देने से इनकार कर दिया। डॉक्टरों की सलाह पर भारत लौटे। बीमार हालात में ही उच्चस्तरीय शोध-पत्र लिखा। मौत की घड़ी की टिकटिकी तेज होती गई। और वह घड़ी भी आ गई, जब 26 अप्रैल, 1920 की सुबह हमेशा के लिए सो गए और शामिल हो गए गौस, यूलर, जैकोबी जैसे सर्वकालीन महानतम गणितज्ञों की पंक्ति में। 

महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन की 125वीं जयंती के अवसर पर भारत सरकार द्वारा वर्ष 2012 को राष्ट्रीय गणित वर्ष और हर साल 22 दिसंबर को राष्ट्रीय गणित दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की गई थी।

Wednesday, March 27, 2019

पंचायती राज में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी


पंचायती राज में महिलाओं का दबदबा बढ़ता ही जा रहा है। आज देश में 2.5 लाख पंचायतों में लगभग 32 लाख प्रतिनिधि चुनकर आ रहे हैं। इनमें से 13 से 14 लाख महिलाएं चुन कर आयी हैं। यह आंकड़ा यह बताने के लिए प्रयाप्त है कि किस तरह से महिलाएं राजनीतिक कार्यों में रूचि ले रही हैं। महिलाओं की गांव के कामों में बढ़ती भागीदारी न केवल महिलाओं के खुद के स्वाभिमान के लिए सकारात्मक संकेतक है बल्कि इससे हिन्दुस्तान के गांवों में फैली सामाजिक असमानता भी दूर होगी। खासतौर से लिंग के आधार पर किए जाने वाली गैर-बराबरी अब संभव नहीं रह गयी है। महिलाओं का बढ़ता कद उन्हें घर व बाहर की दुनिया में स्वतंत्र होकर जीने में सहयोग प्रदान कर रहा है। दहेज के नाम पर महिलाओं का हो रहा उत्पीड़न हो अथवा घरेलू हिंसा-इन तमाम सामाजिक कुरीतियों से आज की महिला लड़ने में सशक्त हो चुकी है। 

सन् 1959 में बलवन्त राय मेहता समिति की सिफारिशों के आधार पर त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू की गई। तब भी यह माना गया कि देश का समग्र विकास महिलाओं को अनदेखा करके नहीं किया जा सकता। इसलिए पंचायती राज व्यवस्था को सुदृढ़ करने तथा पंचायतों में महिलाओं की एक तिहाई भागीदारी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से 1992 में 73 वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम पारित किया गया। इस संशोधन अधिनियम के द्वारा ग्रामसभा का गठन होना अनिवार्य हो गया और ग्राम पंचायतों, और सदस्यों की कुल संख्या की कम से कम एक तिहाई संख्या महिलाओं के लिए आरक्षित कर दी गई। वर्तमान में मध्यप्रदेश, बिहार सहित कई राज्यों ने तो महिलाओं का प्रतिनिधित्व 50 फीसदी तक आरक्षित कर दिया है।

Tuesday, March 26, 2019

लेट नाइट शो होस्ट करेंगी भारतीय मूल की लिली सिंह

लिली सिंह आम तौर पर उसका यूट्यूब खाता का उपयोगकर्ता नाम सुपरवुमन से जाना जाता है, भारतीय मूल के कनाडाई यूट्यूब शख़्सियत, प्रेरक वक्ता, अभिनेत्री और गायिका है। उसने अपना यूट्यूब खाता को 2010 में खोला और तब से उसने 30 करोड़ व्यूज़ मिली और उसका खाता पर 30 लाख सबस्क्रिपशन हैं। वह रोज़मर्रा की ज़िन्दगी और उसके माँ-बाप पर चुटकुले बनाने के लिए मशहूर है। 


यूट्यूब स्टार और कॉमेडियन लिली सिंह एनबीएस चैनल में एक लेट नाइट (देर रात) के शो को होस्ट करेंगी। ऐसा करने वाली वह भारतीय मूल की पहली महिला होंगी। 30 साल की लिली का शो अ लिटिल लेट विद लिली सिंह इस साल सितंबर से टेलिकास्ट होगा। यूट्यूब पर भी वे इसी नाम से टॉक शो होस्ट करती हैं। उनके शो में द रॉक के नाम से मशहूर हॉलीवुड स्टार ड्वेन जॉनसन, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की पत्नी मिशेल और प्रियंका चोपड़ा भी हिस्सा ले चुकी हैं। खास बात यह है कि लिली ने 9 साल पहले यह शो शुरू किया था। कुछ साल में ही यूट्यूब पर उनके शो को फॉलो करने वालों की संख्या करोड़ो में हो गई। अभी यूट्यूब चैनल में उनके करीब 1.5 करोड़ फॉलोअर्स हैं। उनका यह शो एनबीसी के लोकप्रिय कारसन डाली के शो की जगह लेगा। 

लिली के माता-पिता भारत के पंजाब से हैं। उनका जन्म कनाडा के ओंटारियो में हुआ। टोरंटो की यॉर्क यूनिवर्सिटी से 2010 में ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद उन्होंने एक्ट्रेस और कॉमेडियन के तौर पर अपना यूट्यूब चैनल शुरू किया। इसमें वे दक्षिण एशिया के बारे में फैली भ्रांतियों को दूर करने के लिए सटायर (व्यंग्य) पेश करती हैं।एक महीने पहले ही ट्वीट में लिली ने दक्षिण एशियाई मूल का होने पर गर्व जताते हुए कहा था- मैं महिला, अश्वेत और बाइसेक्शुअल हूं। 

खास बात यह है कि अमेरिका में अभी चार बड़े मीडिया ग्रुप्स के किसी भी चैनल में महिला शो प्रेजेंटर नहीं हैं। इसी शुक्रवार लोकप्रिय शो द टुनाइट शो विद जिमी फैलन में उन्होंने अपने लेट नाइट शो का ऐलान किया। महिला सशक्तीकरण पर काम करने के लिए संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ ने लिली को गुडविल एम्बेसडर बनाया है। इसके अलावा महिलाओं में नफरत कम करने के लिए उन्होंने गर्ल लव नाम का एक अभियान भी शुरू किया है।

एशिया का सबसे बडा गुलाब के फूलों का बाग : रोज गार्डन चंडीगढ

अक्सर ऊंची-ऊंची इमारतों से घिरे हुए शहरों में रहते हुए इनसान अपनी खूबियों से दूर होता जा रहा है। इनके करीब आने के लिए उसे हरे भरे बाग-बगीचों में वक्त बिताने की जरूरत है। हरी-भरी जगहों पर वक्तव बिताने से इनसान में सकारात्मिकता आती है, साथ ही खुद पर उसका नियंत्रण भी बढ़ता है।

एशिया का सबसे बडा गार्डन भारत के प्रमुख शहर चंडीगढ के सेक्टर 16 में स्थित हैज जिसका नाम है रोज गार्डन चंडीगढ। चंडीगढ शहर में स्थित यह खुबसूरत रोज गार्डन वहा के लोगो के साथ साथ पर्यटको के लिए भी वरदान जैसा है। गार्डनो में घुमना मौज मस्ती या फिर मनोरंजन इसका यही मकसद नही है। बाग बगीचो और गार्डनो में घुमने के बहुत से फायदे होते है।


1967 में बना यह रोज गार्डन लगभग 30 एकड भू भाग में बनाया गया है। इस रोज गार्डन को जाकिर हुसैन रोज गार्डन के नाम से जाना जाता है। इस गार्डन 17000 पोधो से भरा हुआ है; जिसमे 1600 से भी अधिक किस्मो के गुलाब के फूलो की प्रजातियां देखने को मिलती है। इतनी भारी संख्या में गुलाब कि किस्मो के कारण यह गुलाब के फूलो के बगीचो की श्रेणी में एशिया का सबसे बडा रोज गार्डन है।

यहा का सौंदर्य पर्यटको को आश्चर्यचकित कर देता है। फरवरी माह में यहा कई किस्मो के गुलाब के फूल खिले रहते है। इस समय यहा का सौंदर्य पूरे शबाब पर रहता है। उस समय यहा रोज फेस्टीवल भी बडी धूम धाम से मनाया जाता है।

इस दौरान इस गार्डन में पर्यटको के साथ साथ स्थानीय लोगो की भी काफी भीड होती है। यहा हर रोज 5000 के करीब लोग गुलाब के फूलो की सुंदरता को निहारने के लिए आते है। इस दौरान पर्यटक यहा खूब फोटोग्राफी भी करते है।

इस बाग के मध्य में लगभग 70 फुट का एक फव्वारा भी है। जो इस रोज गार्डन की सुंदरता में चार चांद लगा देता है। यह गार्डन अप्रैल से सितंबर के महिनो में सुबह में 5 बजे से शाम 9 बजे तक खुला रहता है। शेष महिनो में यह एक घंटा देरी से खोला जाता है।

Friday, March 15, 2019

दुनिया की एक मात्र तैरती झील : लोकतक झील

लोकतक झील उत्तर-पूर्व भारत की सबसे बड़ी साफ़ पानी की झील है। इसे दुनिया के एकमात्र तैरती हुई झील भी कहा जाता है क्योंकि यहां छोटे-छोटे भूखंड या द्वीप पानी में तैरते हैं। इन द्वीप को फुमदी के नाम से जाना जाता है। ये फुमदी मिट्टी, पेड़-पौधों और जैविक पदार्थों से मिलकर बनते है और धरती की तरह ही कठोर होते हैं। इन्होंने झील के काफी बड़े भाग को कवर किया हुआ है।

फुमदियों से बनी इस झील को देखना अपने आप में एक एक अनोखा अहसास है जो की पुरे विश्व में केवल यहीं अनुभव किया जा सकता है। इतने से भी मन न भरे, तो फुमदी पर ही बने टूरिस्ट कॉटेज में रह भी सकते हैं।

फुमदी का सबसे बड़ा भाग झील के दक्षिण पूर्व भाग में स्थित है, जो 40 स्क्वायर किलोमीटर तक फैला हुआ है। इस सबसे बड़े भाग में दुनिया के सबसे लंबा और एकमात्र तैरता हुआ पार्क भी है; जिसका नाम किबुल लामिआयो नेशनल पार्क है। इस पार्क में दुर्लभ प्रजाति के हिरण भी पाए जाते हैं। इन्हें मणिपुरी भाषा में संगई कहा जाता है।
 

लोकतक झील का मणिपुर के आर्थिक विकास में अहम योगदान है। इस झील के पानी का उपयोग जलविद्युत परियोजनाओं, सिंचाई और पीने के पानी के लिए किया जाता है। इसके अलावा इस झील के आसपास रहने वाले मछुआरों की जीविका भी यही है। स्थानीय भाषा में इन मछुआरों को ''फुमशोंग्स'' कहा जाता है। फुमदी का उपयोग स्थानीय लोग मछली पकड़ने, अपनी झोपड़ी बनाने और अन्य उपयोग के लिए करते हैं। इन मछुआरों की मछली पालन की कला भी अनोखी है। ये गांव वाले मछली पालने के लिए फुमदी का नकली गोल घेरा बनाते हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि करीबन 1 लाख लोगों से ज्यादा इस झील पर आश्रित हैं।

लोकतक झील जैव विविधता से भी परिपूर्ण है। इसमें पानी के पौधों की तकरीबन 233 प्रजातियां, पक्षियों की 100 से अधिक प्रजातियां रहती हैं। इसके अलावा जानवरों के 425 प्रजातियां भी हैं, जिनमें भारतीय पाइथन, सांभर और दुर्लभ सूची में दर्ज भौंकने वाले हिरण भी हैं।

Tuesday, March 12, 2019

WHO की डिप्टी जनरल बनने वाली पहली भारतीय सौम्या स्वामीनाथन

डॉ. सौम्या स्वामीनाथन प्रसिद्ध चिकित्सा शोधकर्ता और स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञ हैं। वो पहली भारतीय हैं जिनको विश्व स्वास्थ्य संगठन के डिप्टी जनरल के तौर पर नियुक्त किया गया है। सौम्या जो एचआईवी और तपेदिक की प्रमुख शोधकर्ता हैं।

वो भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के महानिदेशक के रूप में कार्यरत थीं। सौम्या स्वास्थ्य मंत्रालय में स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग की सचिव भी हैं। उनकी नियुक्ति की घोषणा 3 अक्टूबर को डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेडरोस अदोनोम गिबरेयसस ने की थी। इस नवीनतम नियुक्ति के साथ सौम्या को डब्ल्यूएचओ की दूसरी सबसे बड़ी स्थिति रखने वाला पहला भारतीय बना देता है।

सौम्या, एमएस स्वामीनाथन की बेटी हैं। एमएस स्वामीनाथन को भारत की हरित क्रांति का जनक माना जाता है। सौम्या की मां मीना स्वामीनाथन एक प्रसिद्ध शिक्षाविद हैं। 

डॉ. सौम्या स्वामीनाथन प्रसिद्ध चिकित्सा शोधकर्ता और स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञ हैं। वो पहली भारतीय हैं जिनको विश्व स्वास्थ्य संगठन के डिप्टी जनरल के तौर पर नियुक्त किया गया है। सौम्या जो एचआईवी और तपेदिक की प्रमुख शोधकर्ता हैं। वो भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के महानिदेशक के रूप में कार्यरत थीं। सौम्या स्वास्थ्य मंत्रालय में स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग की सचिव भी हैं। उनकी नियुक्ति की घोषणा 3 अक्टूबर को डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेडरोस अदोनोम गिबरेयसस ने की थी। इस नवीनतम नियुक्ति के साथ सौम्या को डब्ल्यूएचओ की दूसरी सबसे बड़ी स्थिति रखने वाला पहला भारतीय बना देता है।

फर्स्टपोस्ट के अनुसार, डब्ल्यूएचओ ने अपनी घोषणा में कहा, 'सौम्या तपेदिक और एचआईवी पर एक विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त शोधकर्ता हैं। उन्हें क्लीनिकल केयर और शोध में 30 वर्षों का है। वो अपने करियर में प्रभावी कार्यक्रमों में अनुसंधान का अनुवाद करने का काम कर चुकी है।' पुणे में सशस्त्र सेना मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस पूरा करने के बाद, सौम्या ने अपने एमडी को ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज से पूरा किया। पेशे के तौर पर वो एक बाल रोग विशेषज्ञ हैं। उन्होंने 250 से अधिक प्रकाशनों और किताबों के अध्याय प्रकाशित किए हैं।

सौम्या ने डब्लूएचओ विशेष कार्यक्रम में 2009 और 2011 के बीच यूनिसेफ, यूएनडीपी, विश्व बैंक के समन्वयक के रूप में कार्य किया। अब तक उन्हें दवा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए नौ पुरस्कार दिए जा चुके हैं। सौम्या, एमएस स्वामीनाथन की बेटी हैं। एमएस स्वामीनाथन को भारत की हरित क्रांति का जनक माना जाता है। सौम्या की मां मीना स्वामीनाथन एक प्रसिद्ध शिक्षाविद हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अन्य सदस्यों में स्वास्थ्य के पूर्व मंत्री, दुनिया के अग्रणी चिकित्सकों, शोधकर्ताओं और वैज्ञानिक शामिल हैं। लाइवमिंट के मुताबिक, डब्ल्यूएचओ के अन्य सदस्यों की नियुक्ति के बाद डॉ टेडरोस ने कहा, टीम डब्लूएचओ 14 देशों का प्रतिनिधित्व करती है और इसमें 60 प्रतिशत से अधिक महिलाएं हैं। ये हमारी इस गहरी धारणा को दर्शाती है कि हमें दुनिया के लिए अपने मिशन को पूरा करने के लिए शीर्ष प्रतिभा चाहिए होती है। इसमें लिंग समानता और भौगोलिक दृष्टि के विविध दृष्टिकोणों की जरूरत होती है।

सौम्या, घाना से डॉ. अनारफी असमौआ बाह की जगह लेंगी, जिन्होंने अब डब्ल्यूएचओ को डायरेक्टर-जनरल के वरिष्ठ नीति सलाहकार के रूप में ज्वॉइन किया है। उन्होंने संचरितअमेरिका में लाखों की नौकरी छोड़कर चेन्नई में करोड़ों का स्टार्टअप खोलने वाली अश्विनी अशोकन रोग कार्यक्रम के सहायक निदेशक-जनरल और एचआईवी-एड्स, टीबी और मलेरिया कार्यक्रम के रूप में काम किया था।