Tuesday, July 23, 2019

ऑस्कर पुरस्कार में जो मूर्ति दी जाती है वह किस महापुरुष की होती है?


किसी की नहीं| सन 1927 में ऐकेडमी ऑफ़ मोशन पिक्चर्स आर्ट्स ऐंड साइन्सिस की बैठक में जब ट्रोफ़ी के डिज़ाइन पर चर्चा हुई तो लॉस ऐन्जिलिस के कई कलाकारों से अपने अपने डिज़ाइन सामने रखने को कहा गया| और पसन्द की गई मूर्तिकार जॉर्ज स्टैनली की प्रतिमा| इसमें फ़िल्म की रील पर खड़े एक आदमी को हाथ में एक तलवार पकड़े दिखाया गया है|


1929 से अब तक दो हज़ार से ज़्यादा ऑस्कर ट्रोफ़ियां दी जा चुकी हैं| इनका निर्माण कार्य शिकागो की आर एस ओएन्स ऐंड कम्पनी के सुपुर्द है और उन्हे पचास प्रतिमाएं बनाने में तीन से चार सप्ताह का समय लगता है| शुरु में यह प्रतिमा तांबे की बनती थी क्योंकि विश्व युद्ध के दौरान धातु की कमी थी, लेकिन अब यह सोने का पानी चढ़े ब्रिटैनियम से बनती है| ऑस्कर ट्रोफ़ी तेरह इंच लम्बी होती है और इसका वज़न है आठ पाउन्ड|

Thursday, July 18, 2019

ऐसे कैसे लिखा जाता है इतिहास और यह है इसके अध्यन के स्रोत

हमे बचपन से ही इतिहास पढाया और सुनाया जाता है| ये कहना भी गलत नहीं होगा की यह हम सभी को बोरिंग सब्जेक्ट लगता था क्योकि इतिहास की घटनाओ की तारीखे याद करना बहुत मुश्किल होता है, अगर ध्यान से देखा जाये तो इतिहास एक रोचक सब्जेक्ट भी है| इसके जरिये हम अपने अतीत को समझते है और उससे कई तरह की चीजे सीखते भी है। 

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है की इतिहासकारों को इतने समय पहली घटी घटनाओ का कैसे पता चल जाता है? कैसे आज से 5000 साल पुरानी हड़प्पा सभ्यता के रहन सहन, पहनावे, धार्मिक जीवन, कृषि एवं पशुपालन, उद्योग-धंधे, व्यापार और पतन के बारे में इतिहासकार इतने सटीक दावे करते है? अगर नहीं, तो जानते है यह द्वारा.... 


इतिहास को जानने, समझे और इसका अध्ययन करने के लिए 2 प्रकार के स्त्रोतो का सहारा लिया जाता है – साहित्यिक और पुरातात्विक स्रोत| साहित्यिक स्रोतों से प्राचीन काल के सामाजिक जीवन, धार्मिक जीवन, रहन सेहन, सांस्कृतिक जीवन की जानकारी प्राप्त होती है| 

साहित्यिक स्रोत वह लिखित प्रमाण होते है जिनकी रचना उस काल में होती है जिसका अध्यन किया जा रहा हो| साहित्यिक स्त्रोतो में कई तरह की चीजे शामिल होती है जैसे मौलिक दस्तावेज, राजकीय रिकॉर्ड, पांडुलिपि, कविता, नाटक, संगीत, कला आदि| इतिहासकार इन्ही की मदद से उस काल या समय की जानकारी जुटाते है| उदहारण के तौर पर मोर्यकाल की जानकारी का सबसे अच्छा स्रोत कोटिल्य का अर्थशास्त्र माना जाता है| वही दक्षिण भारत के इतिहास को जानने का सर्वोतम स्रोत संगम साहित्य है| 

इतिहास के अध्यन के लिए पुरातात्विक स्रोतों का भी बहुत महत्व है| इनमे अभिलेख, सिक्के, मुहरों, स्तूपों, चट्टानों, स्मारक और भवनों, मूर्तियों, चित्रकला और अन्य अवशेषों को रखा जाता है| हड़प्पा सभ्यता की जानकरी हमें पुरातात्विक स्रोतों से प्राप्त होती है| मोहें-जो-दड़ो से प्राप्त मुहरो के आधार पर ही इतिहासकारों ने हड़प्पा सभ्यता के धर्मिक जीवन पर प्रकाश डाला| इसी तरह कई तरह के स्मारकों से जहा उस समय की जीवन शैली का ज्ञान होता है वही उनके निर्माता के बारे में भी सूचनाये मिल जाती है|

Saturday, July 13, 2019

कविताओं में एक से नजर आने वाले सागर और समंदर में क्या फर्क होता है?

मशहूर गीतकार आनंद बख्शी के सालों पहले लोकप्रिय हुए एक गीत के बोल हैं, ‘सात समंदर पार से, गुड़ियों के बाजार से… अच्छी सी गुड़िया लाना... पप्पा जल्दी आ जाना’ यहां बख्शी साब ने एक बच्ची की मासूम-सी इच्छा बोलों में पिरोई है और जाहिर है कि एक कवि जब बच्चे की कल्पना में कुछ बोलेगा तो सात समुंदर क्या, उसके पिता को सात आसमान भी पार करा सकता है! 

लेकिन हकीकत समझें तो सात तो बहुत ही बड़ी बात है, एक भी समंदर पार कर पाना किसी के बस की बात नहीं, फिर चाहे आने वाला किसी का भी पप्पा क्यों न हो! 

हां, अगर कोई समुद्र पार करने की बात कहे तो वह जरूर हो सकता है| अब यहां पर अचानक ही एक सवाल जेहन में आ जाता है कि समुद्र (सागर) और समंदर (महासागर) क्या अलग-अलग हैं| 


सागर महासागरों से छोटे होते हैं| समुद्र या सागर असल में महासागर का वह हिस्सा होता है जो आंशिक रूप से जमीन से जुड़ा होता है| कई सागरों को खुद में समाने वाले महासागर, खारे पानी का एक बहुत बड़ा जल क्षेत्र होते हैं| 

वैसे तो धरती पर पांच अलग-अलग महासागर बताए जाते हैं| लेकिन ये सभी आपस में जुड़े हुए हैं और धरती का लगभग तीन चौथाई हिस्सा घेरे हुए हैं| इन्हीं की बदौलत धरती पर अलग-अलग मौसम और जीवन संभव हो पाता है| इस तरह धरती का 71% हिस्सा घेरने वाले इन महासागरों में इस ग्रह पर मौजूद पानी का करीब 97% हिस्सा है| 

सागर और महासागर में एक बड़ा अंतर यह होता है कि महासागर, सागरों से कहीं ज्यादा गहरे होते हैं| सागर के तल की गहराई नापी जा सकती है जबकि महासागर की वास्तविक गहराई नाप पाना बहुत मुश्किल है| 

जहाँ समुद्रो में प्रयोगों के लिए पहुँचा जा सकता है, महासागरो में ऐसे कामो के लिए पहुचना कठिन होता है| महासागर ही ऐसा स्थान होता है जहाँ समुद्र अपने पानी को खाली करते है, जबकि महासागर अपने पानी की निकासी नहीं खोजते| समुद्र जो की भूमि के निकट होते है महासागरो की तुलना में कम गहरे होते है और इस कारण पौधे और जीव जंतुओ के लिए यहाँ फलना फूलना संभव होता है क्योकि ये आमतौर पर रोशनी से प्रकाशित होते है| जबकि महासागर जो की बहुत गहरे होते है यहाँ समुद्री जीवन का बचा रहना मुश्किल होता है क्योकि यहाँ रोशनी नहीं पहुँच पाती और दबाव भी अधिक होता है|

एक बार फिर से आकार पर लौटें तो सबसे बड़े महासागर, प्रशांत महासागर (पैसेफिक ओशन) का विस्तार करीब 6,41, 86,000 वर्ग मील तक फैला हुआ है जबकि सबसे बड़े सागर, भूमध्य सागर (मेडिटरेनियन सी) का क्षेत्रफल लगभग 11, 44,800 वर्ग मील है| आंकड़ों पर ही थोड़ा और गौर करें तो पता चलता है कि दुनिया का सबसे छोटा महासागर, आर्कटिक ओशन (54,27,000 वर्ग मील) भी सबसे बड़े सागर से करीब पांच गुना बड़ा है| लगे हाथ हिंद महासागर की भी बात करते चलें तो इसका विस्तार करीब 2,64,69,900 वर्ग मील तक है| 

अब तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, प्रशांत महासागर का सबसे गहरा क्षेत्र मारिआना ट्रेंच है जिसकी गहराई करीब 36,200 फीट मापी गई है, लेकिन वैज्ञानिक इसे प्रशांत महासागर की अधिकतम गहराई नहीं मानते| वहीं सबसे गहरे समुद्र, कैरेबियन सागर की गहराई करीब 22,788 फीट बताई जाती है| औसतन महासागरों की गहराई करीब 3,953 फीट से 15,215 फीट के बीच होती है|





Tuesday, July 2, 2019

प्रधानमंत्री आवास योजना

प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के तहत कमजोर आय वर्ग (ईडब्ल्यूएस या EWS) और लोअर इनकम ग्रुप (एलआईजी या LIG) को मिलने वाली क्रेडिट लिंक्ड सब्सिडी स्कीम (ब्याज सब्सिडी) का फायदा अगले साल तक उठाया जा सकता है| 

दरअसल सरकार ने PMAY को 31 मार्च 2020 तक बढ़ा दिया है| PMAY के तहत पहला घर बनाने या खरीदने के लिए होम लोन (Home Loan) पर ब्याज सब्सिडी का फायदा उठाया जा सकता है| होम लोन (Home Loan) के ब्याज पर 2.60 लाख रुपये का फायदा कमजोर आय वर्ग के लोग उठा सकते हैं| में खत्म हो रही थी| 


जिन लोगों की आमदनी तीन लाख रुपये सालाना से कम है वे EWS कैटेगरी में आते हैं| छह लाख रुपये सालाना तक कमाने वाले लोग LIG में आते हैं| इन दोनों कैटेगरी में PMAY के तहत छह लाख रुपये तक के लोन पर 6.5 फीसदी तक ब्याज सब्सिडी का फायदा उठाया जा सकता है| 

मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजना सबके लिए घर-2022 के तहत सरकार ने CLSS शुरू की थी| बाद में इसे बढ़ाकर छह लाख से 12 लाख रुपये सालाना और 12 से 18 लाख रुपये सालाना तक की आमदनी वाले लोगों तक भी कर दिया गया था| 

क्रेडिट लिंक्ड सब्सिडी स्कीम (CLSS) में मध्यम आय वर्ग के ऐसे लोगों को जिनकी सालाना आय 6 लाख से 12 लाख रुपए के बीच है, उन्हें 9 लाख रुपये के 20 साल अवधि वाले होम लोन (Home Loan) पर 4 फीसदी की ब्याज सब्सिडी मिलेगी| 

मसलन होम लोन (Home Loan) पर ब्याज की दर 9 फीसदी है तो आपको PMAY के तहत यह 5 फीसदी ही चुकानी होगी| 12 लाख से 18 लाख रुपये की सालाना आय वाले लोगों को 4 फीसदी की ब्याज सब्सिडी मिलेगी| 
बैंक, हाउसिंग फाइनेंस कंपनी, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, स्माल फाइनेंस बैंक और बहुत से संस्थान इस योजना का लाभ ग्राहकों को उपलब्ध करा रहे हैं| नेशनल हाउसिंग बैंक (NHB) और हुडको (HUDCO) भी इस योजना में शामिल हैं|

Saturday, June 29, 2019

पाईथागोरस

य़ोरुप में विद्या के आधुनिकीकरण की नींव पाईथागोरस ने भारतीय गणित को यूनान में प्रसारित कर के डाली थी। पाईथागोरस की जीवनी उस की मृत्यु के लगभग दो शताब्दी पश्चात टुकडों में उजागर हुयी जिस से पता चलता है कि उस का जन्म ईसा से 560 वर्ष पूर्व ऐशिया माईनर के ऐक दूीप सामोस पर हुआ था। संगीत और जिमनास्टिक की प्रारम्भिक शिक्षा के बाद वह मिस्त्र चला गया और बेबीलोन तथा उस के आसपास के क्षेत्रों में कुछ काल तक रहा था। उस क्षेत्र में भारतीय दर्शन ज्ञान, उपनिष्दों, गणित तथा रेखागणित का प्रसार और प्रभाव था सिकन्द्रीया विश्वविद्यालय स्थापित होने से पूर्व ही था। भारतीय संगीत के धरातल पर ही पाईथागोरस ने पाशचात्य संगीत पद्धति की आधार शिला बनाई थी। 


जब पाईथागोरस भारतीय प्रभाव के क्षेत्र में था तब ईरान ने मिस्त्र पर आक्रमण किया। पाईथागोरस को भी बन्दियों के साथ ईरान ले जाया गया । कालान्तर पाईथागोरस ईरान से पंजाब तक भारत में भी गया जहाँ उस ने यूनानी रीति रिवाज और वस्त्र त्याग कर भारत के पहाडी ढंग के टराउजर्स की तरह के परिधान अपना लिये थे। उसी तरह का परिधान पहने महारज कनिष्क को भी ऐक प्रतिमा में दिखाया गया है जो अफगानिस्तान में पाई गई थी। प्रतिमा में सम्राट कनिष्क को डबल ब्रेस्टिड कोट के साथ टराउजर्स पहने दिखाया गया है। यूनान में उस समय तक टराउजर्स नहीं पहनी जाती थीँ। टराउजर्स की ही तरह के पायजामे और सलवारें भारत ईरान घाटी में पहने जाते थे। अतः पाईथागोरस ने भारतीय रेखागणित के साथ साथ भारतीय वेश भूषा भी योरुप में प्रचिल्लत की थी।

Thursday, June 27, 2019

रमणीय स्थल : खजुराहो

खजुराहो भारत के मध्य प्रदेश प्रान्त में स्थित एक प्रमुख शहर है जो अपने प्राचीन एवं मध्यकालीन मंदिरों के लिये विश्वविख्यात है। यह मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित है। खजुराहो को प्राचीन काल में 'खजूरपुरा' और 'खजूर वाहिका' के नाम से भी जाना जाता था। यहां बहुत बड़ी संख्या में प्राचीन हिन्दू और जैन मंदिर हैं। मंदिरों का शहर खजुराहो पूरे विश्व में मुड़े हुए पत्थरों से निर्मित मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। खजुराहो को इसके अलंकृत मंदिरों की वजह से जाना जाता है जो कि देश के सर्वोत्कृष्ठ मध्यकालीन स्मारक हैं। भारत के अलावा दुनिया भर के आगन्तुक और पर्यटक प्रेम के इस अप्रतिम सौंदर्य के प्रतीक को देखने के लिए निरंतर आते रहते है। हिन्दू कला और संस्कृति को शिल्पियों ने इस शहर के पत्थरों पर मध्यकाल में उत्कीर्ण किया था। 

खजुराहो का इतिहास लगभग एक हजार साल पुराना है। यह शहर चन्देल साम्राज्‍य की प्रथम राजधानी था। चन्देल वंश और खजुराहो के संस्थापक चन्द्रवर्मन थे। चन्द्रवर्मन मध्यकाल में बुंदेलखंड में शासन करने वाले गुर्जर राजा थे। वे अपने आप को चन्द्रवंशी मानते थे। चंदेल राजाओं ने दसवीं से बारहवी शताब्दी तक मध्य भारत में शासन किया। खजुराहो के मंदिरों का निर्माण 950 ईसवीं से 1050 ईसवीं के बीच इन्हीं चन्देल राजाओं द्वारा किया गया। मंदिरों के निर्माण के बाद चन्देलो ने अपनी राजधानी महोबा स्थानांतरित कर दी। लेकिन इसके बाद भी खजुराहो का महत्व बना रहा। 


मध्यकाल के दरबारी कवि चंदबरदाई ने पृथ्वीराज रासो के महोबा खंड में चन्देल की उत्पत्ति का वर्णन किया है। उन्होंने लिखा है कि काशी के राजपंडित की पुत्री हेमवती अपूर्व सौंदर्य की स्वामिनी थी। एक दिन वह गर्मियों की रात में कमल-पुष्पों से भरे हुए तालाब में स्नान कर रही थी। उसकी सुंदरता देखकर भगवान चन्द्र उन पर मोहित हो गए। वे मानव रूप धारणकर धरती पर आ गए और हेमवती का हरण कर लिया। दुर्भाग्य से हेमवती विधवा थी। वह एक बच्चे की मां थी। उन्होंने चन्द्रदेव पर अपना जीवन नष्ट करने और चरित्र हनन का आरोप लगाया। 

अपनी गलती के पश्चाताप के लिए चन्द्र देव ने हेमवती को वचन दिया कि वह एक वीर पुत्र की मां बनेगी। चन्द्रदेव ने कहा कि वह अपने पुत्र को खजूरपुरा ले जाए। उन्होंने कहा कि वह एक महान राजा बनेगा। राजा बनने पर वह बाग और झीलों से घिरे हुए अनेक मंदिरों का निर्माण करवाएगा। चन्द्रदेव ने हेमवती से कहा कि राजा बनने पर तुम्हारा पुत्र एक विशाल यज्ञ का आयोजन करगा जिससे तुम्हारे सारे पाप धुल जाएंगे। चन्द्र के निर्देशों का पालन कर हेमवती ने पुत्र को जन्म देने के लिए अपना घर छोड़ दिया और एक छोटे-से गांव में पुत्र को जन्म दिया। 

हेमवती का पुत्र चन्द्रवर्मन अपने पिता के समान तेजस्वी, बहादुर और शक्तिशाली था। सोलह साल की उम्र में वह बिना हथियार के शेर या बाघ को मार सकता था। पुत्र की असाधारण वीरता को देखकर हेमवती ने चन्द्रदेव की आराधना की जिन्होंने चन्द्रवर्मन को पारस पत्थर भेंट किया और उसे खजुराहो का राजा बनाया। पारस पत्थर से लोहे को सोने में बदला जा सकता था। 

चन्द्रवर्मन ने लगातार कई युद्धों में शानदार विजय प्राप्त की। उसने कालिंजर का विशाल किला बनवाया। मां के कहने पर चन्द्रवर्मन ने तालाबों और उद्यानों से आच्छादित खजुराहो में 85 अद्वितीय मंदिरों का निर्माण करवाया और एक यज्ञ का आयोजन किया जिसने हेमवती को पापमुक्त कर दिया। चन्द्रवर्मन और उसके उत्तराधिकारियों ने खजुराहो में अनेक मंदिरों का निर्माण करवाया। 

जब ब्रिटिश इंजीनियर टी एस बर्ट ने खजुराहो के मंदिरों की खोज की है तब से मंदिरों के एक विशाल समूह को 'पश्चिमी समूह' के नाम से जाना जाता है। यह खजुराहो के सबसे आकर्षक स्थानों में से एक है। इस स्थान को युनेस्को ने 1986 में विश्व विरासत की सूची में शामिल भी किया है। 

इस परिसर के विशाल मंदिरों की बहुत ज्यादा सजावट की गई है। यह सजावट यहां के शासकों की संपन्नता और शक्ति को प्रकट करती है। इतिहासकारों का मत है कि इनमें हिन्दू देवकुलों के प्रति भक्ति भाव दर्शाया गया है। देवकुलों के रूप में या तो शिव या विष्णु को दर्शाया गया है। इस परिसर में स्थित लक्ष्मण मंदिर उच्च कोटि का मंदिर है। इसमें भगवान विष्णु को बैकुंठम के समान बैठा हुआ दिखाया गया है। चार फुट ऊंची विष्णु की इस मूर्ति में तीन सिर हैं। ये सिर मनुष्य, सिंह और वराह के रूप में दर्शाए गए हैं। कहा जाता है कि कश्मीर के चम्बा क्षेत्र से इसे मंगवाया गया था। इसके तल के बाएं हिस्से में आमलोगों के प्रतिदिन के जीवन के क्रियाकलापों, कूच करती हुई सेना, घरेलू जीवन तथा नृतकों को दिखाया गया है। 

मंदिर के प्लेटफार्म की चार सहायक वेदियां हैं। 954 ईसवीं में बने इस मंदिर का संबंध तांत्रिक संप्रदाय से है। इसका अग्रभाग दो प्रकार की मूर्तिकलाओं से सजा है जिसके मध्य खंड में मिथुन या आलिंगन करते हुए दंपत्तियों को दर्शाता है। मंदिर के सामने दो लघु वेदियां हैं। एक देवी और दूसरा वराह देव को समर्पित है। विशाल वराह की आकृति पीले पत्थर की चट्टान के एकल खंड में बनी है।

Tuesday, June 25, 2019

हात्मा गांधी की समाधि : राजघाट


स्वतंत्रता दिवस के मौके पर राजघाट पर महात्मा गांधी की समाधि पर श्रद्धांजलि दी जाती है। भारत की आजादी में महात्मा गांधी का बड़ा योगदान था। राजघाट वो जगह है जहां महात्मा गांधी की समाधि बनाई गई है। 2 अक्टूबर को प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक देश के बड़े नेता यहां बापू को श्रद्धांजलि देने आते हैं।
  • महात्मा गांधी की समाधि काले पत्थर से बनाई गई है जिस स्थान पर यह समाधि बनाई है वहीं महात्मा गांधी का अंतिम संस्कार किया गया था। इस समाधि के साथ में ही एक ज्योति हमेशा जलती रहती है।
  • राजघाट दिल्ली में यमुना नदी के किनारे स्थित है यहां दो संग्रहालय है जो आपको पुराने समय में वापस ले जाएंगे अगर आप राजघाट जा रहे हैं तो इन संग्रहालय को भी देखने जरूर जाएं। यह संग्रहालय आपको भारत की आजादी से जुड़े प्रत्येक पहलू से रूबरू कराएंगे।
  • राजघाट एक बडे़ क्षेत्र में फैला है यहां दुनिया की कई बड़ी हस्तियों ने पेड़ लगाए हैं जिसमें क्वीन एलिजाबेथ-2, अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहावर और वियतनाम के बड़े नेता हो-ची-मिन शामिल हैं।
  • राजघाट में महात्मा गांधी की समाधि के अलावा देश के दूसरे बड़े नेताओं की समाधि भी है। राजघाट के उत्तर में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की समाधि शांतिवन स्थित है।
  • भारत के प्रधानमंत्री रजीव गांधी की समाधि भी राजघाट के उत्तर में स्थित है। राजीव गांधी की 1991 में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
  • राजघाट के पास ही के आर नारायण मेमोरियल एकता स्थल, लाल बहादुर शास्त्री का मेमोरियल शक्ति स्थल भी स्थित है।


Saturday, June 22, 2019

रानी की वाव

रानी की वाव भारत के गुजरात राज्य के पाटण में स्थित प्रसिद्ध बावड़ी (सीढ़ीदार कुआँ) है। इस चित्र को जुलाई 2018 में RBI द्वारा रु. 100 के नोट पर चित्रित किया गया है तथा 22 जून 2014 को इसे यूनेस्को के विश्व विरासत स्थल में सम्मिलित किया गया। 

पाटण को पहले 'अन्हिलपुर' के नाम से जाना जाता था, जो गुजरात की पूर्व राजधानी थी। कहते हैं कि रानी की वाव (बावड़ी) वर्ष 1063 में सोलंकी शासन के राजा भीमदेव प्रथम की प्रेमिल स्‍मृति में उनकी पत्नी रानी उदयामति ने बनवाया था। रानी उदयमति जूनागढ़ के चूड़ासमा शासक रा' खेंगार की पुत्री थीं। सोलंकी राजवंश के संस्‍थापक मूलराज थे। सीढ़ी युक्‍त बावड़ी में कभी सरस्वती नदी के जल के कारण गाद भर गया था। यह वाव 64 मीटर लंबा, 20 मीटर चौड़ा तथा 27 मीटर गहरा है। यह भारत में अपनी तरह का अनूठा वाव है। 


वाव के खंभे सोलंकी वंश और उनके वास्तुकला के चमत्कार के समय में ले जाते हैं। वाव की दीवारों और स्तंभों पर अधिकांश नक्काशियां, राम, वामन, महिषासुरमर्दिनी, कल्कि, आदि जैसे अवतारों के विभिन्न रूपों में भगवान विष्णु को समर्पित हैं। 

'रानी की वाव' को विश्व विरासत की नई सूची में शामिल किए जाने का औपचारिक ऐलान कर दिया गया है। 11वीं सदी में निर्मित इस वाव को यूनेस्को की विश्व विरासत समिति ने भारत में स्थित सभी बावड़ी या वाव (स्टेपवेल) की रानी का भी खिताब दिया है। इसे जल प्रबंधन प्रणाली में भूजल संसाधनों के उपयोग की तकनीक का बेहतरीन उदाहरण माना है। 11वीं सदी का भारतीय भूमिगत वास्तु संरचना का अनूठे प्रकार का सबसे विकसित एवं व्यापक उदाहरण है यह, जो भारत में वाव निर्माण के विकास की गाथा दर्शाता है। सात मंजिला यह वाव मारू-गुर्जर शैली का साक्ष्य है। ये करीब सात शताब्दी तक सरस्वती नदी के लापता होने के बाद गाद में दबी हुई थी। इसे भारतीय पुरातत्व सर्वे ने वापस खोजा। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने सायआर्क और स्कॉटिस टेन के सहयोग से वाव के दस्तावेजों का डिजिटलाइजेशन भी कर लिया है। 

20 जुलाई 2018 को RBI द्वारा प्रस्तावित 100 रु. के नए नोट पर इस विरासत को प्रदर्शित किया गया है।

Friday, June 21, 2019

भारत की प्रथम महिला विमान चालक

लाहौर हवाई अड्डा और साल 1936| इक्कीस वर्षीया सरला ठकराल ने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया और जा बैठीं जिप्सी मॉथ नामक दो सीटों वाले विमान में| आँखों पर चश्मा चढ़ाया और ले उड़ीं उसे आकाश में| 


इस तरह वो भारत की पहली महिला विमान चालक बनीं| सरला ठकराल ने 1929 में दिल्ली में खोले गए फ़्लाइंग क्लब में विमान चालन की ट्रेनिंग ली थी और एक हज़ार घंटे का अनुभव बटोरा था| वहीं उनकी भेंट अपने भावी पति से हुई| शादी के बाद उनके पति ने उन्हें व्यावसायिक विमान चालक बनने के लिए प्रोत्साहन दिया| 

सरला ठकराल जोधपुर फ्लाइंग क्लब में ट्रेनिंग लेने लगीं| 1939 में एक विमान दुर्घटना में उनके पति मारे गए| फिर दूसरा विश्व युद्ध छिड़ गया और जोधपुर क्लब बंद हो गया| उसके बाद उन्होंने अपने जीवन की दिशा बदल ली| 

उनके माता-पिता ने उनका दूसरा विवाह किया और वो विभाजन के बाद लाहौर से दिल्ली आ गईं| 

Thursday, June 20, 2019

अरावली

अरावली भारत के पश्चिमी भाग राजस्थान में स्थित एक पर्वतमाला है। भारत की भौगोलिक संरचना में अरावली प्राचीनतम पर्वत है। यह संसार की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला है जो राजस्थान को उत्तर से दक्षिण दो भागों में बांटती है। अरावली का सर्वोच्च पर्वत शिखर सिरोही जिले में गुरुशिखर (1722 /1727 मी.) है, जो माउंट आबू(सिरोही) में है। 


अरावली पर्वत श्रंखला की कुल लम्बाई गुजरात से दिल्ली तक लगभग 800 किलीमीटर है, अरावली पर्वत श्रंखला का लगभग ८० % विस्तार राजस्थान में है, दिल्ली में स्थित राष्ट्रपति भवन रायसीना की पहाड़ी पर बना हुआ है जो अरावली पर्वत श्रंखला का ही भाग है, अरावली की औसत ऊंचाई ९३० मीटर है तथा अरावली के दक्षिण की ऊंचाई व चौड़ाई सर्वाधिक है, अरावली या अर्वली उत्तर भारतीय पर्वतमाला है। राजस्थान राज्य के पूर्वोत्तर क्षेत्र से गुज़रती 550 किलोमीटर लम्बी इस पर्वतमाला की कुछ चट्टानी पहाड़ियाँ दिल्ली के दक्षिण हिस्से तक चली गई हैं। शिखरों एवं कटकों की श्रृखलाएँ, जिनका फैलाव 10 से 100 किलोमीटर है, सामान्यत: 300 से 900 मीटर ऊँची हैं। यह पर्वतमाला, दो भागों में विभाजित है- सांभर-सिरोही पर्वतमाला- जिसमें माउण्ट आबू के गुरु शिखर (अरावली पर्वतमाला का शिखर, ऊँचाई (1,722 मीटर ) में और (5649.606 फ़ीट ) सहित अधिकतर ऊँचे पर्वत हैं। सांभर-खेतरी पर्वतमाला- जिसमें तीन विच्छिन्न कटकीय क्षेत्र आते हैं। अरावली पर्वतमाला प्राकृतिक संसाधनों (एवं खनिज़) से परिपूर्ण है और पश्चिमी मरुस्थल के विस्तार को रोकने का कार्य करती है। अरावली पर्वत का पश्चिमी भाग मारवाड़ एवं पूर्वी भाग मेवाड़ कहलाता है। यहां अनेक प्रमुख नदियों- बनास, लूनी, साखी एवं साबरमती का उदगम स्थल है। इस पर्वतमाला में केवल दक्षिणी क्षेत्र में सघन वन हैं, अन्यथा अधिकांश क्षेत्रों में यह विरल, रेतीली एवं पथरीली (गुलाबी रंग के स्फ़टिक) है। 

अरावली की अन्य उच्च चोटियां:- १ गुरु शिखर - सिरोही (1722 m) २ सेर - सिरोही (1597m) ३ दिलवाडा - सिरोही( इसे हाल ही में जोड़ा गया है, इसी पर्वत पर प्रसिद्ध जैन मंदिर स्थित हैं). (1442m) ४ जरगा - उदयपुर. (1431m) ५ अचलगढ - सिरोही (1380m) 6 रघुनाथगढ(1055 m) - सीकर ७ खो(920) - जयपुर ८ तारागढ - अजमेर (870 m) ९ भेराच - अलवर

Tuesday, June 18, 2019

मशीन लर्निंग क्या है?


मूल रूप से मशीन लर्निंग एक प्रकार का एल्गोरिथम है जो किसी सॉफ्टवेयर को सही रूप से चलाने में मदद करता है। इसके लिए वह यूजर द्वारा देखे गए कुछ परिणामों के आधार पर एक नमूना तैयार करता है और उस नमूने के आधार पर भावी पूछे जाने वाले प्रश्नों के पैटर्न को तैयार कर लेता है।
इस प्रकार कम्प्यूटर मानव मस्तिष्क की भांति सोचने और कार्य करने की क्षमता प्राप्त कर लेते हैं जिसमें समय के साथ निरंतर विकास होता रहता है।
मशीन लर्निंग को आर्टिफ़िशियल इंटेललिजेंस का उपयोग या एप्लिकेशन भी माना जाता है। इसके अंतर्गत एक विचार के माध्यम से आंकड़ों को डिजिटल डिवाइस तक इस प्रकार पहुंचाया जाता है जिससे वो स्वयं ही काम करना सीख लें।
मशीन लर्निंग कैसे करती है काम ?
मशीन लर्निंग के काम करने के तरीके को समझने के लिए इसके प्रकार को समझना बहुत जरूरी है। सामान्य रूप से मशीन लर्निंग एल्गोरिथम सामान्य रूप में दो प्रकार के होते हैं :

निरीक्षित एल्गोरिथम (Supervised Algorithm)
मशीन लर्निंग के इन दोनों प्रकार के एल्गोरिथ्म के लिए अलग-अलग प्रकार के विशेषज्ञ की ज़रूरत होती है। निरीक्षित या सुपरवाइज्ड एल्गोरिथ्म के निर्माण का काम डेटा विशेषज्ञ और विश्लेषक या एनेलिस्ट के द्वारा किया जाता है। इन लोगों को मशीन लर्निंग तकनीक का सम्पूर्ण ज्ञान होता है और मशीन को सही ढंग से काम करने के लिए प्रोग्राम तैयार करता है। डेटा विशेषज्ञ का मुख्य विशेष रूप से देखते हैं कि इस एल्गोरिथ्म के निर्माण के लिए किस वैरिएयब्ल और फीचर का प्रयोग किया जाना चाहिए। इस निर्माण के पूरा होते ही यह एल्गोरिथ्म नए डेटा पर स्वयं ही लागू हो जाती है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि निरीक्षित एल्गोरिथ्म का निर्माण डेटा विशेषज्ञ की देख-रेख या निगरानी में होता है।
अनिरीक्षित एल्गोरिथम (Unsupervised Algorithm)
इस एल्गोरिथ्म के निर्माण के लिए विशेष निरीक्षण या प्रशिक्षण की जरूरत नहीं होती है। इसके निर्माण में जिस तकनीक का प्रयोग किया उसे इंटरेटिव एप्रोच या डीप लर्निंग कहा जाता है। इस एल्गोरिथ्म को नियुरल नेटवर्क्स के नाम से भी जाना जाता है। मुख्य रूप से यह तकनीक जटिल प्रोसेसिंग जैसे इमेज रेकीगनेशन, स्पीच तो टेक्स्ट और नैचुरल लैंगवेज़ जैनरेशन आदि क्षेत्रों में काम आती है। इस प्रकार के नियुरल नेटवर्क्र्स लाखों प्रशिक्षित डेटा को अपने आप जोड़कर वेरिएबल के साथ संबंध बना लेते हैं।
यह डेटा प्रशिक्षित होते ही नया डेटा सरलता से एल्गोरिथ्म का प्रयोग करते हुए काम करता है और नए डेटा को इंटरप्रेट भी सरलता से कर देता है।  इस एल्गोरिथ्म में बिग डेटा का भी इस्तेमाल होता है क्योंकि इसके निर्माण के लिए बड़ी मात्रा में डेटा की आवश्यकता होती है।
मशीन लर्निंग एल्गोरिथ्म कितने प्रकार के होते हैं:
सामान्य रूप से मशीन लर्निंग एल्गोरिथ्म निम्न प्रकार के हो सकते हैं:
डीसीजन ट्री :
एल्गोरिथ्म की इस तकनीक में इसे प्रभावी ढंग से काम करने के लिए एक विशेष प्रकार के वैरिएयबल को ढूंढा जाता है।
के मीन्स क्ल्स्ट्रींग:
इस तकनीक में विशिष्ट प्रकार के डेटा का समूहिकारण करके सम्पूर्ण डेटा को व्यवस्थित कर दिया जाता है।
नियुरल नेटवर्क्स:
इस तकनीक में एल्गोरिथ्म के निर्माण के लिए प्रशिक्षित डेटा का प्रयोग करते हुए उनमें परस्पर संबंध स्थापित किया जाता है। इस प्रकार डेटा इस प्रकार से व्यवस्थित किया जाता है जिससे यह बाद में इनकमिंग डेटा को भी समूहों में विभाजित करके सारे डेटा को अच्छी प्रकार से दिखाता है।
मशीन लर्निंग का उपयोग कहाँ किया जा सकता है:
फेसबुक न्यूज फीड और मोबाइल एप के अतिरिक्त मशीन लर्निंग का उपयोग बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। जैसे ऑनलाइन शॉपिंग करते समय वेबसाइट पर लेंड करते ही जो आप विज्ञापन देखते हैं, वो मशीन लर्निंग तकनीक का ही कमाल है।
इसके अलावा मशीन लर्निंग का उपयोग ऑनलाइन धोखा-धड़ी को पकड़ने, स्पैम फिल्टर करने, थ्रेट पकड़ना और नेटवर्क सिक्यूरिटी के क्षेत्र में भी किया जाता है।
इसी प्रकार सभी ऑनलाइन सेल वाली वेबसाइट में कस्टमर प्रबंधन, व्यावसायिक इंटेलिजेंस के सॉफ्टवेयर में भी मशीन लर्निंग तकनीक का इस्तेमाल होता है। मानव संसाधन एवं प्रबंधन क्षेत्र में भी कर्मचारियों के काम और विशेषज्ञता के आधार पर छंटनी करने के लिए मशीन लर्निंग तकनीक का ही उपयोग किया जाता है।
सेल्फ ड्राईविंग कारों और वर्चुअल असिस्टेंट टेक्नोलोजी में भी मशीन लर्निंग तकनीक का ही उपयोग किया जाता है।
भविष्य में मशीन लर्निंग का उपयोग अधिकतम  चीजों में किए जाने की संभावना है जिसमें आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का रोल बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

Friday, June 14, 2019

आईना महल

भुज में हमीरसार झील के उत्तर पूर्वी कोने में स्थित 'दर्पण के हॉल' आइना महल एक अद्भुत इमारत है। 


18 वीं शताब्दी के दौरान इसे बनाया गया था और आकर्षक रूप से भारत और यूरोपीय शैली का एक मिश्रित रूप है, जिसकी डिजाइन, महल के सबसे खूबसूरत कलाकृति और चित्रों को राम सिंह मलम नामक के एक कलाकार ने बनाया था। 

2001 में आए भूकंप के दौरान महल लगभग पूरा नष्ट हो गया था हालांकि, काफी भाग अभी भी खड़ा है उसी के एक हिस्से को संरक्षित किया गया और एक संग्रहालय में बदल दिया गया है और साल के सभी 365 दिन जनता के लिए खुला रहता है।

Thursday, June 13, 2019

भारतीय तिरंगा किसने बनाया?

यह जानने लिए थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा| फ़्रांसीसी क्रांति और उसके नारे स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का भारतीय राष्ट्रवाद पर गहरा असर पडा| 

सन् 1831 में जब राजा राम मोहन राय इंग्लैंड जा रहे थे तो उन्हें एक फ्रांसीसी जहाज़ पर फ़्रांस का झंडा लहराता दिखाई दिया| उसमें भी तीन रंग थे| 1857 की क्रांति ने भारतवासियों के दिल में आज़ादी के बीज बो दिए| 


बीसवीं शताब्दी में जब स्वदेशी आंदोलन ने ज़ोर पकड़ा तो एक राष्ट्रीय ध्वज की ज़रूरत महसूस हुई| स्वामी विवेकानंद की शिष्या सिस्टर निवेदिता ने सबसे पहले इसकी परिकल्पना की| 

फिर 7 अगस्त 1906 को कोलकाता में बंगाल के विभाजन के विरोध में एक रैली हुई जिसमें पहली बार तिरंगा झंडा फहराया गया| समय के साथ इसमें परिवर्तन होते रहे लेकिन जब अंग्रेज़ों ने भारत छोड़ने का फ़ैसला किया तो देश के नेताओं को राष्ट्रीय ध्वज की चिंता हुई| 

डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में एक ध्वज समिति का गठन किया गया और उसमें यह फ़ैसला किया गया कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के झंडे को कुछ परिवर्तनों के साथ राष्ट्र ध्वज के रूप में स्वीकार कर लिया जाए, ये तिरंगा हो और इसके बीच में अशोक चक्र हो|

Wednesday, June 12, 2019

जानिए महान ज्योतिषाचार्य वराहमिहिर के बारे में

वराहमिहिर ही पहले आचार्य हैं जिन्होंने ज्योतिष शास्त्र को सि‍द्धांत, संहिता तथा होरा के रूप में स्पष्ट रूप से व्याख्यायित किया। इन्होंने तीनों स्कंधों के निरूपण के लिए तीनों स्कंधों से संबद्ध अलग-अलग ग्रंथों की रचना की। सिद्धांत (‍गणित)- स्कंध में उनकी प्रसिद्ध रचना है- पंचसिद्धांतिका, संहितास्कंध में बृहत्संहिता तथा होरास्कंध में बृहज्जातक मुख्य रूप से परिगणित हैं। 

इन्हें शकाब्द 427 में विद्यमान बताया जाता है। ये उज्जैन के रहने वाले थे इसीलिए ये अवन्तिकाचार्य भी कहलाते हैं। इनके पिता आदित्यदास थे, उनसे इन्होंने संपूर्ण ज्योतिर्ज्ञान प्राप्त किया। जैसे ग्रहों में सूर्य की स्थिति है, वैसे ही दैवज्ञों में वराहमिहिर का स्थान है। वे सूर्यस्वरूप हैं उनकी रचना-शैली संक्षिप्तता, सरलता, स्पष्टता, गूढ़ार्थवक्तृता और पांडित्य आदि गुणों से परिपूर्ण है इन्होंने 13 ग्रंथों की रचनाएं की हैं। 


इनका बृहज्जातक ग्रंथ फलित शास्त्र का सर्वाधिक प्रौढ़ तथा प्रामाणिक ग्रंथ है। इस पर भट्टोत्पली आदि अनेक महत्वपूर्ण टीकाएं हैं। आचार्य वराहमिहिर ने इस विज्ञान को अपनी प्रतिभा द्वारा बहुत विलक्षणता प्रदान की। ये भारतीय ज्योतिष शास्त्र के मार्तण्ड कहे जाते हैं। यद्यपि आचार्य के समय तक (नारद संहिता आदि में) ज्योतिष शास्त्र संहिता, होरा तथा सिद्धांत- इन तीन भागों में विभक्त हो चुका था तथापि आचार्य ने उन्हें और भी व्यवस्थित कर उसे वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान किया। 

ज्योतिष के सिद्धांत स्कंध से संबद्ध इनके पंचसिद्धांतिका नामक ग्रंथ की यह विशेषता है कि इसमें इन्होंने अपना कोई सिद्धांत न देकर अपने समय तक के पूर्ववर्ती पांच आचार्यों (पितामह, वशिष्ठ, रोमश, पौलिश तथा सूर्य)- के सिद्धांतों (अभिमतों)- का संकलन कर महत्वपूर्ण कार्य किया है। इनकी बृहत्संहिता-स्कंध का सबसे प्रौढ़ तथा मान्य ग्रंथ है। इसमें 106 अध्याय हैं। इस पर भट्टोत्पल की टीका बड़ी प्रसिद्ध है। 

फलित ज्योतिष का बृहज्जातक को दैवज्ञों का कंठहार ही है। इसमें 28 अध्याय हैं। इसमें स्वल्प में ही फलित ज्योतिष के सभी पक्षों का प्रामाणिक वर्णन है। इसमें पूर्व प्रचलित पाराशरीय विंशोतरी दशा को न मानकर नवीन दशा-निरूपण दिया हुआ है। इस ग्रंथ का नष्टजातकाध्याय बड़े ही महत्व का है।

Tuesday, June 11, 2019

ग्रेटा थनबर्ग: पर्यावरण संरक्षण की कमान बच्चों के हाथ

पृथ्वी को जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव से बचाने के लिये दुनियाभर में कई तरह के प्रयास लगातार चलते रहे हैं। इसी कड़ी में नया नाम जुड़ा है School Strike for Climate अभियान का। दिलचस्प बात यह है कि इस अभियान की शुरुआत करने वाली एक लड़की है, जो केवल 16 साल की है। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के लिये आवाज़ उठाने वाली इस लड़की का नाम है ग्रेटा थनबर्ग। इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह कि इस स्वीडिश पर्यावरण कार्यकर्त्ता को हाल ही में 2019 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिये नामित किया गया है। 

क्यों और कैसे चर्चा में आई ग्रेटा? 

यह सभी जानते हैं कि पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन की वज़ह से गंभीर संकट का सामना कर रही है। पर्यावरणविदों का मानना है कि यदि समय रहते कार्बन उत्सर्जन को कम करने के प्रयास नहीं किये गए तो जीव-जगत का अस्तित्व खतरे में आ जाएगा। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए ग्रेटा ने अगस्त 2018 में स्वीडिश संसद के बाहर पर्यावरण को बचाने के लिये स्कूल स्ट्राइक यानी हड़ताल की थी। स्कूल की यह हड़ताल इतनी चर्चा में रही कि धीरे-धीरे इसमें लगभग पूरी दुनिया के स्कूली बच्चे शामिल हो गए। आज इस आंदोलन में लगभग एक लाख स्कूली बच्चे शामिल हो चुके हैं। 

कम उम्र के बड़े इरादों का नाम है ग्रेटा 

आपको बता दें कि केवल नौ साल की आयु में ग्रेटा ने क्लाइमेट एक्टिविज़्म में हिस्सा लेना शुरू किया था, तब वह तीसरी कक्षा में पढ़ रही थीं। अपने देश में ग्रेटा बिजली का बल्ब बंद करने से लेकर पानी की बर्बादी रोकने और खाने को न फेंकने जैसी बातें सुनती आई थीं। वज़ह पूछने पर उन्हें बताया गया कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये ऐसा किया जा रहा है। ग्रेटा का कहना है कि यह जानकर उन्हें बहुत हैरानी हुई कि लोग इसके बारे में कम ही बात करते हैं। यदि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को मनुष्य अपने प्रयासों से कम कर सकता है तो हमें इसके बारे में बात करनी चाहिये। 


पिछले साल दिसंबर में पोलैंड के काटोविस में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सम्मलेन (CoP24) में ग्रेटा ने भी हिस्सा लिया था और इसे संबोधित किया था। इस बड़े और अंतर्राष्ट्रीय मंच से ग्रेटा ने अपने संबोधन में कहा, 'हम दुनिया के नेताओं से भीख मांगने नहीं आए हैं। आपने हमें पहले भी नज़रअंदाज़ किया है और आगे भी करेंगे। अब हमारे पास वक्त नहीं है। हम यहाँ आपको यह बताने आए हैं कि पर्यावरण खतरे में है।
  • इसके अलावा, दावोस में विश्व आर्थिक मंच (WEF) के एक सत्र को ग्रेटा ने संबोधित किया था।
  • इतना ही नहीं स्वीडन की इस स्कूल छात्रा ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी एक वीडियो के ज़रिये संदेश भेजा था, जिसमें जलवायु परिवर्तन को लेकर प्रभावी कदम उठाने की अपील की गई थी।
  • आज ग्रेटा की मुहिम से प्रभावित होकर लगभग 2000 स्थानों पर पर्यावरण को बचाने के लिये आंदोलन-प्रदर्शन हो रहे हैं।
  • ग्रेटा ने अपनी बात लोगों तक पहुँचाने के लिये ट्विटर का भी सहारा लिया है।
  • इसमें कोई दो राय नहीं कि जलवायु परिवर्तन के वैश्विक प्रभावों की वज़ह से वर्तमान में जिस प्रकार की पर्यावरणीय एवं सामाजिक परिस्थितियाँ बन गई हैं, उसकी शायद ही किसी ने कल्पना की होगी। यदि अगले एक दशक में इसकी रोकथाम नहीं की गई तो इसके भयावह परिणाम सामने आ सकते हैं।
  • यही कारण था कि ग्रेटा थनबर्ग ने स्टॉकहोम, हेलसिंकी, ब्रसेल्स और लंदन सहित कई शहरों में अलग-अलग मंचों पर जाकर जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये आवाज़ उठाई।
पहले-पहल तो ग्रेटा पर किसी का ध्यान नहीं गया और उनका साथ देने कोई नहीं आया। इसके बावजूद उन्होंने अपने अभिभावकों को यकीन दिलाया कि वह सही राह पर है। उनकी माँ ने, जो एक जानी-मानी ऑपेरा गायिका हैं, ग्रेटा के अभियान से प्रेरित होकर विमान यात्रा करना छोड़ दिया ताकि वायु प्रदूषण में कमी लाने में आंशिक सहयोग कर सकें। इससे उनके अपने और पति के काम पर असर भी पड़ा। ग्रेटा के पिता एक अभिनेता और लेखक हैं। इन तीनों ने माँसाहार भी छोड़ दिया। धीरे-धीरे ग्रेटा के धरने में उनकी कक्षा के विद्यार्थी जुड़ने लगे। 

फ्राइडेज़ फॉर फ्यूचर 
इसी वर्ष 15 मार्च को विश्व के कई शहरों में स्कूली विद्यार्थियों ने पर्यावरण संबंधी प्रदर्शनों में भाग लिया और भविष्य में भी प्रत्येक शुक्रवार को ऐसा करने का फैसला लिया है, जिसे उन्होंने ‘फ्राइडेज़ फॉर फ्यूचर’ (अपने भविष्य के लिये शुक्रवार) का नाम दिया है। अब हर शुक्रवार के दिन बच्चे स्कूल जाने की बजाय सड़कों पर उतरकर अपना विरोध दर्ज करवाएंगे ताकि विश्व के नेताओं का ध्यान पर्यावरणीय संकट की ओर दिलवाया जाए।
15 मार्च को दुनियाभर के कई शहरों में लाखों की संख्या में विद्यार्थी स्कूल न जाकर सड़कों पर उतरे थे और रैलियाँ आयोजित करते हुए पर्यावरण में आ रहे बदलावों को लेकर विरोध प्रदर्शन किये गए थे। भारत की राजधानी दिल्ली समेत 125 से ज्यादा देशों में में रैलियां हुई थीं और इसको इतिहास में पर्यावरण के मुद्दे पर बच्चों और किशोरों की ओर से किये सबसे बड़े प्रयास के तौर पर दर्ज किया गया। केवल UK में ही 100 से अधिक शहरों और कस्बों में इस किस्म के प्रदर्शन किये गए। ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में हुई रैली में 30 हज़ार से ज़्यादा बच्चे ‘पर्यावरण यात्रा’ में शामिल हुए थे।
भारत में पर्यावरण सुरक्षा में बच्चों का योगदान 

इससे यह तो स्पष्ट है कि पर्यावरण सुरक्षा की मुहिम में बच्चे, विशेषकर किशोर महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। लेकिन पर्यावरण की सुरक्षा के लिये बच्चों से अग्रणी भूमिका निभाने की अपील करते समय हमें यह ध्यान में रखना होगा कि पर्यावरण के साथ हमारा संबंध सहयोग पर आधारित होना चाहिये। बच्चों की दृढ़ता का उपयोग वन्यजीव संरक्षण लक्ष्य की प्राप्ति में भी किया जा सकता है। इसी के मद्देनज़र भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRI), देहरादून ने नवोदय विद्यालय समिति और केंद्रीय विद्यालय संगठन के साथ एक समझौता किया है। 10 वर्ष के लिये किये गए इस समझौते के तहत इन संस्थानों के विद्यार्थियों के बीच जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य के साथ प्रकृति कार्यक्रम की शुरुआत भी की गई है ताकि पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने और कौशल हासिल करने के प्रति छात्रों की दिलचस्पी बढ़ाई जा सके। इसका एक अन्य उद्देश्य स्कूली बच्चों को व्यावहारिक कौशल सीखने के लिये एक मंच प्रदान करना है ताकि वे अपने संसाधनों का न्यायसंगत इस्तेमाल कर सकें तथा वन और पर्यावरण के संरक्षण को जन आंदोलन बनाने के लिये युवाओं का एक कैडर तैयार कर सकें। इस समझौते से पर्यावरण के राष्ट्रीय और वैश्विक मुद्दों के बारे में देश के युवाओं को संवेदनशील बनाया जा सकेगा और वे अधिक ज़िम्मेदार नागरिक बन सकेंगे। गौरतलब है कि ICFRI पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत एक स्वायत्तशासी परिषद है। 

पाठ्यक्रम में ज़रूरी है पर्यावरण 
पर्यावरण शिक्षा में विद्यार्थियों को बताया जाता है कि प्राकृतिक और प्रदूषण मुक्त पर्यावरण को बनाए रखने के लिये पारिस्थितिकी तंत्र को कैसे व्यवस्थित रखा जाता है। इस शिक्षा का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण संबंधित चुनौतियों का सामना करने के लिये पर्यावरण शिक्षा के साथ आवश्यक कौशल और विशेष ज्ञान प्रदान करना है। 1972 में UNESCO द्वारा आयोजित मानव पर्यावरण पर स्टॉकहोम सम्मेलन के बाद पर्यावरण शिक्षा को वैश्विक स्तर पर मान्यता मिलनी शुरू हुई थी। इस सम्मेलन के बाद UNESCO ने अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण शिक्षा कार्यक्रम की भी शुरुआत की थी। बच्चों को देश का भविष्य मानते हुए भारत में भी उनको पर्यावरण चुनौतियों से निपटने के लिये तैयार किये जाने की ज़रूरत के मद्देनज़र देशभर में पर्यावरण को पाठ्यक्रम में अनिवार्य विषय के रूप में शामिल किया गया है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी पर्यावरण को लेकर कई पाठ्यक्रम चलाए जा रहे हैं।

ग्लोबल वार्मिग का खतरा सभी के लिये बड़ी चुनौती है और बच्चों, किशोरों तथा युवाओं को इससे बचने और इसके दुष्प्रभावों को कम करने के लिये प्रदूषण, अनुपयोगी पदार्थ प्रबंधन, जैव विविधता, जलवायु परिर्वतन के प्रति संवेदनशील व जागरूक बनाना आवश्यक है। हमें यह हरगिज़ नहीं भूलना चाहिये कि सतत् पर्यावरण संतुलन का मूल भाव पीढ़ी-दर-पीढ़ी सबको एक समान प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल करने का अवसर देने पर टिका है। अर्थात् भावी पीढ़ियों को भी प्राकृतिक स्रोत की मात्रा और शुद्धता उतनी ही प्राप्त हो सके, जितनी वर्तमान पीढ़ी और हमारे पूर्वजों को मिल रही थी। अगर मौजूदा पीढ़ी प्राकृतिक संसाधनों का उपभोग अपनी ज़रूरतों से कहीं अधिक करेगी, विशेषकर उनका जिनका पुनर्चक्रण नहीं किया जा सकता, तो आने वाली पीढ़ी के हिस्से में न केवल न्यूनतम स्रोत आएंगे बल्कि ऐसी ज़मीन, जंगल, पानी और हवा की विरासत हाथ लगेगी जो प्रदूषण से विषैली होगी। 

यह एक कटु सत्य है कि पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर फैसले लेने या नीतियाँ बनाने की प्रक्रिया में बच्चों की आवाज़की कभी कोई गुंजाइश नहीं रही, लेकिन यह भी सच है कि जलवायु परिवर्तन के संभावित दुष्परिणामों के सबसे बड़े भुक्तभोगी आज के बच्चे ही होंगे।

Sunday, June 9, 2019

अंबेडकर के वो काम, जिन्हें हमेशा याद रखेगा हिंदुस्तान

भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपने जीवन के 65 सालों में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षणिक, धार्मिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, औद्योगिक, संवैधानिक आदि क्षेत्रों में अनगिनत कार्य करके राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया| उन्होंने कई ऐसे काम किए, जिन्हें आज भी हिंदुस्तान याद रखता है| अंबेडकर जयंती के अवसर पर जानते हैं कि उन्होंने राष्ट्र निर्माण में क्या क्या कार्य किए... 


सामाजिक एवं धार्मिक योगदान

  • मानवाधिकार जैसे दलितों एवं दलित आदिवासियों के मंदिर प्रवेश, पानी पीने, छुआछूत, जातिपाति, ऊंच-नीच जैसी सामाजिक कुरीतियों को मिटाने के लिए कार्य किए|
  • उन्होंने मनुस्मृति दहन (1927), महाड सत्याग्रह (1928), नाशिक सत्याग्रह (1930), येवला की गर्जना (1935) जैसे आंदोलन चलाएं|
  • बेजुबान, शोषित और अशिक्षित लोगों को जागरुक करने के लिए साल 1927 से 1956 के दौरान मूक नायक, बहिष्कृत भारत, समता, जनता और प्रबुद्ध भारत नामक पांच साप्ताहिक और पाक्षिक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया|
  • उन्होंने छात्रावास, नाइट स्कूल, ग्रंथालयों और शैक्षणिक गतिविधियों के माध्यम से कमजोर वर्गों के छात्रों को अध्ययन करने और साथ ही आय अर्जित करने के लिए उनको सक्षम बनाया| सन् 1945 में उन्होंने अपनी पीपुल्स एजुकेशन सोसायटी के जरिए मुम्बई में सिद्वार्थ महाविद्यालय तथा औरंगाबाद में मिलिन्द महाविद्यालय की स्थापना की|
  • हिन्दू विधेयक संहिता के जरिए महिलाओं को तलाक, संपत्ति में उत्तराधिकार आदि का प्रावधान कर उसके कार्यान्वयन के लिए संघर्ष किया|

आर्थिक, वित्तीय और प्रशासनिक योगदान

  • भारत में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की स्थापना डॉ| अम्बेडकर की रचना 'रुपये की समस्या-उसका उद्भव और प्रभाव' और 'भारतीय चलन व बैकिंग का इतिहास' और 'हिल्टन यंग कमीशन के समक्ष उनकी साक्ष्य' के आधार पर 1935 में हुई|
  • उनके दूसरे शोध 'ब्रिटिश भारत में प्रांतीय वित्त का विकास' के आधार पर देश में वित्त आयोग की स्थापना हुई|
  • साल 1945 में उन्होंने देश के लिए जलनीति और औद्योगिकरण की आर्थिक नीतियां जैसे नदी-नालों को जोडना, हीराकुंड बांध, दामोदर घाटी बांध, सोन नदी घाटी परियोजना, राष्ट्रीय जलमार्ग, केंद्रीय जल और विद्युत प्राधिकरण बनाने के मार्ग प्रशस्त किए|
  • साल 1944 में प्रस्तावित केंद्रीय जल मार्ग और सिंचाई आयोग के प्रस्ताव को 4 अप्रैल 1945 को वाइसराय की ओर से अनुमोदित किया गया और बड़े बांधों वाली तकनीकों को भारत में लागू करने हेतु प्रस्तावित किया|

संविधान निर्माण

  • उन्होंने समता, समानता, बन्धुता एवं मानवता आधारित भारतीय संविधान को 02 साल 11 महीने और 17 दिन में तैयार करने का अहम कार्य किया|
  • साल 1951 में महिला सशक्तिकरण का हिन्दू संहिता विधेयक पारित करवाने में प्रयास किया और पारित न होने पर स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दिया|
  • निर्वाचन आयोग, योजना आयोग, वित्त आयोग, महिला पुरुष के लिये समान नागरिक हिन्दू संहिता, राज्य पुनर्गठन, राज्य के नीति निर्देशक तत्व, मौलिक अधिकार, मानवाधिकार, निर्वाचन आयुक्त और सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक एवं विदेश नीति बनाई|
  • उन्होंने विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में एसी-एसटी के लोगों की सहभागिता सुनिश्चित की|

Friday, June 7, 2019

IRDA क्या है और वे क्या करते हैं?

बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीए) भारत सरकार द्वारा संचालित एक सर्वोच्च राष्ट्रीय एजेंसी है । यह पॉलिसीधारकों के हितों की सुरक्षा करता है,जो भारत में बीमा व्यवसाय को नियंत्रित और विकसित करता है। आईआरडीए हैदराबाद में स्थित है और भारतीय संसद के एक अधिनियम द्वारा 1999 में आईआरडीए अधिनियम के रूप  में भारत सरकार द्वारा गठित किया था। भारतीय बीमा उद्योग की कुछ आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए, आईआरडीए 2002 में संशोधन किया गया था। जैसा कि

  • पॉलिसीधारकों के हितों की रक्षा, विनियमित करने,
  • पॉलिसीधारकों के आर्थिक और वित्तीय सुधारों बढ़ावा देने,
  • बीमा उद्योग की सुधारात्मक वृद्धि सुनिश्चित करने,, , 
  • पॉलिसीधारकों के वास्तविक दावों के शीघ्र निपटान सुनिश्चित करना और दावों के निपटान की प्रक्रिया में गलत व्यवहार रोकना।
  • भारतीय बीमा उद्योग को आईआरडीए के नियम और शर्तों के द्वारा चलाया जाता है। भारतीय उद्योग में बीमा कंपनियों की गुणवत्ता योग्यता और निष्पक्ष व्यवहार की निगरानी और कार्यान्वयन पर आईआरडीए द्वारा ध्यान रखा जाता है।
  • आईआरडीएआई के कर्तव्यों, शक्तियों और कार्यों को शामिल किया गया है, ये निम्नानुसार हैं:

1 आईआरडीए द्वारा बीमा कारोबार और पुन: बीमा व्यवसाय की नियमित वृद्धि को बढ़ावा और सुनिश्चित करना।
2 बीमा एजेंटों के लिए अपेक्षित योग्यता, आचार संहिता और व्यावहारिक प्रशिक्षण निर्दिष्ट करना।
3 बीमा कंपनियों और बीमा मध्यस्थों के बीच विवादों का निर्णय, और टैरिफ सलाहकार समिति के कामकाज की निगरानी करना।
4 आईआरडीएआई जीवन बीमा कंपनी को पंजीकरण का प्रमाण पत्र प्रदान।
5 आईआरडीएआई  बीमा एजेंटों को पंजीकरण का प्रमाण पत्र प्रदान, पंजीकरण के इस प्रमाण पत्र के नवीकरण, पुन: नवीकरण संशोधन, निकासी, निलंबन या रद्द करने का एक प्रमाण पत्र प्रदान करने के लिए जिम्मेदार है।
6 आईआरडीएआई अधिनियम के प्रयोजनों को पूरा करने के लिए बीमा कंपनियों और बीमा एजेंटों से फीस और अन्य शुल्क लेता है।
7  आईआरडीएआई बीमा कंपनियों द्वारा धन के निवेश को विनियमित करता और धन क्षमता के मार्जिन के रखरखाव को नियंत्रित करता है।
8 आईआरडीएआई बीमा कंपनियों और बीमा मध्यस्थों के बीच विवादों का निपटान करता है।
9 आईआरडीएआई बीमा कंपनियों, बीमा एजेंटों, बीमा मध्यस्थों और जीवन बीमा के व्यवसाय से जुड़े अन्य संगठनों के ऑडिटिंग सहित, जांच, आचरण की जांच कर सकता है।
10 आईआरडीएआई बीमा योजनाओं को वित्त करने के लिए बीमाकर्ता की प्रीमियम आय का प्रतिशत निर्दिष्ट करता है।
11 यह पॉलिसीधारकों को बीमा कंपनियों के खिलाफ उनकी शिकायत सुनने का अधिकार प्रदान करता है।
12 आईआरडीएआई बीमा मध्यस्थों के लिए लाइसेंस और स्थापित मानदंड और ग्राहकों को सही वित्तीय समाधान प्रदान करने में सक्षम हैं।
13 आईआरडीएआई द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों और समाज के कमजोर वर्गों में बीमा कवरेज सुनिश्चित करना|

Thursday, June 6, 2019

काँच या शीशा कैसे बनता है?

काँच बनता है रेत से| रेत और कुछ अन्य सामग्री को एक भट्टी में 1500 डिग्री सैल्सियस पर पिघलाया जाता है और फिर इस पिघले काँच को उन खाँचों में बूंद-बूंद करके उंडेला जाता है जिससे मनचाही चीज़ बनाई जा सके| मान लीजिए, बोतल बनाई जा रही है तो खाँचे में पिघला काँच डालने के बाद बोतल की सतह पर और काम किया जाता है और उसे फिर एक भट्टी से गुज़ारा जाता है| 


काँच का आविष्कार मिस्र या मैसोपोटामिया में लगभग ढाई हज़ार साल ईसा पूर्व हुआ था| शुरु में इसका इस्तेमाल साज-सज्जा के लिए किया गया| फिर ईसा से लगभग डेढ़ हज़ार साल पहले काँच के बरतन बनने लगे| पहली शताब्दी आते-आते फ़लस्तीन और सीरिया में, एक खोखली छड़ में फूंक मारकर पिघले काँच को मनचाहे रूप में ढालने की कला विकसित हुई और ग्यारहवीं शताब्दी में वैनिस शहर काँच की चीज़ें बनाने का केन्द्र बन गया| अब तो सारा काम मशीनों से होता है|

Wednesday, June 5, 2019

अंतरराष्ट्रीय डेटलाइन

अंतरराष्ट्रीय तिथि रेखा एक काल्पनिक रेखा है जो कैलैंडर के दो क्रमिक दिनों को अलग करती है| यह रेखा प्रशान्त महासागर के बीचों-बीच 180 डिग्री याम्योत्तर पर उत्तर से दक्षिण की ओर खींची गई एक काल्पनिक रेखा है। इस रेखा पर तिथि का परिवर्तन होता है। इस रेखा का निर्धारण 1884 में वाशिंगटन में संपन्न एक सम्मेलन में किया गया। 


ये रेखा महज़ सुविधा के लिये बनाई गई है| जब कोई जलयान पश्चिम दिशा में यात्रा करता है, तो उसकी तिथि में एक दिन जोड़ दिया जाता हैं और यदि वह पूर्व की ओर यात्रा करता हैं तो एक दिन घटा दिया जाता हैं। 

एक देश के विभिन्न भागों या द्वीपों का समय एक समान रखने के लिए इस रेखा को आर्कटिक महासागर में 75 डिग्री उत्तरी अक्षांश पर महाद्वीप से बचने के लिए पूर्व की ओर मोड़ बेरिंग जल सन्धि से निकाली गई। बेरिंग सागर में यह पाश्चिम की ओर मोड़ी गई हैं। फिजी द्वीप समूह तथा न्यूजीलैण्ड को दूर रखनें के लिए यह दक्षिण प्रशान्त महासागर में यह पूर्व की ओर मुड़ती है। 

जब यात्री पश्चिम दिशा का तरफ़ सफ़र करते थे तो घर लौटकर पाते थे कि एक दिन और बीत गया है| पहली बार दुनिया का चक्कर लगाने वाले मैगलैन के सह नाविकों ने यही पाया कि एक अतिरिक्त दिन बीत गया है, जबकि उन्होंने दिनों का बराबर हिसाब रखा था| उसी तरह अगर पूर्व दिशा की ओर से सफ़र करें तो एक दिन घट जाता था| इसलिए दुनिया को उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक बांटने वाली एक रेखा की कल्पना की गई जिसके बाईं तरफ़ एक दिन आगे रहता है|

Tuesday, June 4, 2019

बरम्यूडा ट्राऐंगिल

यह अटलांटिक महासागर का एक काल्पनिक क्षेत्र है; जहां बहुत से जहाज़, नौकाएं और विमान रहस्यमय परिस्थितियों में ग़ायब होते रहे हैं|

अगर आप विश्व का मानचित्र देखें और बरम्यूडा द्वीप, पोर्तो रिको और अमरीका के फ़्लोरिडा राज्य के दक्षिणी कोने को सीधी रेखाओं से जोड़ें तो कोई चालीस लाख किलोमीटर का एक त्रिकोणीय क्षेत्र बनता है| इसी को बरम्यूडा त्रिकोण कहते हैं|


ऐसे दावे किए गए हैं कि यह ख़तरनाक क्षेत्र है लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यहां हुई दुर्घटनाओँ की संख्या किसी अन्य क्षेत्र से अधिक नहीं है और इन्हें बढ़ा चढ़ाकर बताया गया है| जहां तक रहस्यम परिस्थितियों का सवाल है तो उसकी भी व्याख्या की गई है| अमरीका के भूविज्ञान सर्वेक्षण का कहना है कि यहां मीथेन हाइड्रेट्स के क्षेत्र हैं जिनसे जब-तब मीथेन गैस के विशाल बुलबुले निकलते हैं| इनका परिणाम यह होता है कि पानी झागदार हो जाता है जो जहाज़ों को तैरने देने योग्य नहीं रहता और जहाज़ बड़ी तेज़ी से डूब सकता है| मीथेन गैस से विमान दुर्घटनाएं भी हो सकती हैं क्योंकि मीथेन का घनत्व हवा जितना नहीं होता और विमान टिका नहीं रह पाता| इसके अलावा समुद्र में कभी कभी सौ फ़िट ऊंची लहरें भी उठ सकती हैं जो किसी भी जहाज़ को डुबा सकती हैं|

Monday, June 3, 2019

घड़ी का आविष्कार

घड़ी एक ऐसा यंत्र है जो हमे सही वर्तमान समय बताती है। आज के समय में घड़ी ना सिर्फ समय बताने वाला यंत्र बल्कि एक फैशन बन गया है। आज भले ही समय देखने के कई विकल्प मौजूद हैं लेकिन जब सबसे पहले घड़ी का आविष्कार हुआ था तो ये आविष्कार किसी चमत्कार से कम नहीं था क्योंकि पहले के समय लोग सूर्य के मुताबिक ही समय का अनुमान लगाते थे। घड़ी के आविष्कार के बाद समय का सही पता लगाना बेहद आसान हो गया।

दरअसल पहले के समय में सूर्य के मुताबिक समय का अनुमान लगाया जाता था लेकिन आसमान में बादल होने की स्थिति में समय का अनुमान नहीं लग पाता था इसके बाद जल घड़ी का आविष्कार हुआ जिसका श्रेय चीन को जाता है। 


इसके बाद इंग्लैंड के एलफ़्रेड महान ने मोमबत्ती की सहायता से समय का अनुमान लगाने की विधि बनाई जिसमे उन्होने एक मोमबत्ती पर समान दूरियो पर चिन्ह अंकित किये और मोमबत्ती के पिघलने से समय का अनुमान लगाया।

लेकिन घड़ी के आविष्कार का श्रेय जाता है पोप सिलवेस्टर द्वितीय को जिन्होंने सन् 996 में घड़ी का आविष्कार किया। यूरोप में घड़ियों का प्रयोग 13वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में होने लगा था। इसके अलावा सन 1288 मे इंग्लैंड के वेस्टमिस्टर के घंटाघर मे और अलबान्स मे सन 1326 मे घड़ियाँ लगाई गई।

हालाँकि सबसे पहली आधुनिक घड़ी सन 996 मे बन गई थी लेकिन इसमें थोड़ा संदेह भी है क्योंकि इतिहासकारों के मुताबिक सन 1577 में घड़ी की मिनट वाली सुई का आविष्कार स्विट्ज़रलैंड के जॉस बर्गी द्वारा उनके एक खगोलशास्त्री मित्र के लिए किया गया था।

इनसे भी पहले जर्मनी के न्यूरमबर्ग शहर मे पीटर हेनलेन ने ऐसी घड़ी का आविष्कार कर दिया था जो काफी छोटी थी और इसे आसानी से अपने साथ एक जगह से दूसरे जगह ले जाया जा सकता था जैसी की हमारी आज की हाथ में पहनने वाली घड़ी है।

सबसे पहली हाथ घड़ी पहनने वाले व्यक्ति थे फ़्राँसीसी गणितज्ञ और दार्शनिक ब्लेज़ पास्कल जो घड़ी को रस्सी के जरिये अपने हाथ पर बाँध लिया करते थे ताकि काम करते करते भी वो आसानी से समय देख सकें।

इसके बाद समय के साथ साथ घड़ी में कई बदलाव आये और आज हमें बाजार में स्मार्टवॉच भी देखने को मिलने लगी है।

Saturday, June 1, 2019

CID और CBI में क्या अंतर होता है?

CID और CBI सामान्य तौर पर दो अलग अलग जांच एजेंसियां हैं और इनके जाँच का क्षेत्र भी अलग-अलग होता है| CID जहाँ एक प्रदेश के अन्दर घटित होने वाली घटनाओं की जाँच करती है और यह राज्य सरकार के आदेश पर काम करती है वहीँ CBI पूरे देश में होने वाली विभिन्न घटनाओं की जाँच का काम संभालती है और इसको आदेश देने का अधिकार केंद्र सरकार, उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट के पास होता है| 

CID और CBI सामान्य तौर पर दो अलग-अलग जांच एजेंसियां हैं और इनके जाँच का क्षेत्र भी अलग-अलग होता है| CID जहाँ एक प्रदेश के अन्दर घटित होने वाली घटनाओं की जाँच करती है और यह राज्य सरकार के आदेश पर काम करती है जबकि CBI पूरे देश में होने वाली विभिन्न घटनाओं की जाँच का काम संभालती है और इसको आदेश देने का अधिकार केंद्र सरकार, उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट के पास होता है| इतना जानने के बाद अब यह जानना जरूरी हो जाता है कि आखिर CID और CBI में क्या अंतर होता है| 



CID का फुल फॉर्म Crime Investigation Department है जो कि एक प्रदेश में अपराध जांच विभाग के रूप में जानी जाती है| CID एक प्रदेश में पुलिस का जांच और खुफिया विभाग होता है| इस विभाग को हत्या, दंगा, अपहरण, चोरी इत्यादि की जाँच के काम सौंपे जाते हैं| CID की स्थापना, पुलिस आयोग की सिफारिश पर ब्रिटिश सरकार ने 1902 में की थी| पुलिस कर्मचारियों को इसमें शामिल करने से पहले विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है| इस संस्था को जाँच का जिम्मा सम्बंधित राज्य सरकार और कभी कभी उस राज्य के उच्च न्यायलय द्वारा सौंपा जाता है| 

केंद्रीय जांच ब्यूरो या CBI, भारत में केंद्र सरकार की एक एजेंसी है, जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर होने वाले अपराधों जैसे हत्या, घोटालों और भ्रष्टाचार के मामलों और राष्ट्रीय हितों से संबंधित अपराधों की भारत सरकार की तरफ से जाँच करती है| CBI एजेंसी की स्थापना की सिफारिस भ्रष्टाचार की रोकथाम के लिए गठित “संथानम समिति” की सिफारिस के आधार पर 1963 में गृह मंत्रालय के अंतर्गत की गयी थी लेकिन बाद में इसे कार्मिक मंत्रलाय के अंतर्गत स्थानांतरित कर दिया गया था| इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है| 

दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान अधिनियम, 1946 ने CBI को जांच की शक्तियां दी हैं| भारत सरकार राज्य सरकार की सहमति से राज्य में मामलों की जांच करने का आदेश CBI को देती है| हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय राज्य सरकार की सहमति के बिना देश के किसी भी राज्य में अपराधिक मामले की जांच के लिए CBI को आदेश दे सकते हैं|

Friday, May 31, 2019

देश की पहली महिला 'वित्तमंत्री' बनीं निर्मला सीतारमण

निर्मला सीतारमण को पिछली सरकार में रक्षा मंत्री और उससे पहले कॉरपोरेट कार्य का मंत्री बनाया गया था| वह साल 2008 में भाजपा का हिस्सा बनीं और तभी से पार्टी से जुड़ी हुई हैं|

निर्मला सीतारमण देश की पहली महिला रक्षा मंत्री बन गई हैं| निर्मला सीतारमण उन महिला नेताओं में से एक हैं जो बेहद कम समय में राजनीति के शिखर तक पहुंची हैं| देश की पहली रक्षा मंत्री रहीं निर्मला सीतारमण ने एक बार फिर इतिहास रच दिया है|

हालांकि उनसे पहले तात्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पीएम पद के साथ-साथ वित्त मंत्री का कार्यभार 16 जुलाई 1969 से 27 जून 1970 तक संभाला था, लेकिन अभी तक किसी भी महिला को वित्तमंत्री के रूप में स्वंत्रत रूप से पद नहीं मिला था| इस कारण से निर्मला सीतारमण पहली महिला वित्तमंत्री बनी गई हैं|

निर्मला सीतारमण: पिछली सरकार में

निर्मला सीतारमण को पिछली सरकार में रक्षा मंत्री और उससे पहले कॉरपोरेट कार्य का मंत्री बनाया गया था| वह साल 2008 में भाजपा का हिस्सा बनीं और तभी से पार्टी से जुड़ी हुई हैं|

सुखोई में उड़ान भरने वाली पहली महिला रक्षा मंत्री बनी थी

निर्मला सीतारमण ने 17 जनवरी 2018 को सुखोई-30 लड़ाकू विमान में उड़ान भरी थी| निर्मला सीतारमण पहली महिला रक्षा मंत्री रहीं, जिन्होंने लड़ाकू विमान में उड़ान भरी थी|

निर्मला सीतारमण के सामने बड़ी चुनौतियां:

निर्मला सीतारमण के सामने बड़ी चुनौतियों में भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था को मजबूती देना उनका सबसे महत्‍वपूर्ण काम होगा| निर्मला सीतारमण को अगले महीने बजट पेश करना है| उन्‍हें इससे पहले बढ़ती महंगाई, बढ़ती तेल की कीमतें, रुपये की कमजोरी जैसे मुद्दों का भी सामना करना है|

Thursday, May 30, 2019

भूदान यज्ञ के प्रणेता : भूदान आंदोलन


विनोबा भावे का 'भूदान आंदोलन' का विचार 1951 में जन्मा। जब वह आन्ध्र प्रदेश के गाँवों में भ्रमण कर रहे थे, भूमिहीन अस्पृश्य लोगों या हरिजनों के एक समूह के लिए ज़मीन मुहैया कराने की अपील के जवाब में एक ज़मींदार ने उन्हें एक एकड़ ज़मीन देने का प्रस्ताव किया। इसके बाद वह गाँव-गाँव घूमकर भूमिहीन लोगों के लिए भूमि का दान करने की अपील करने लगे और उन्होंने इस दान को गांधीजी के अहिंसा के सिद्धान्त से संबंधित कार्य बताया।


भावे के अनुसार, यह भूमि सुधार कार्यक्रम हृदय परिवर्तन के तहत होना चाहिए न कि इस ज़मीन के बँटवारे से बड़े स्तर पर होने वाली कृषि के तार्किक कार्यक्रमों में अवरोध आएगा, लेकिन भावे ने घोषणा की कि वह हृदय के बँटवारे की तुलना में ज़मीन के बँटवारे को ज़्यादा पसंद करते हैं। हालांकि बाद में उन्होंने लोगों को 'ग्रामदान' के लिए प्रोत्साहित किया, जिसमें ग्रामीण लोग अपनी भूमि को एक साथ मिलाने के बाद उसे सहकारी प्रणाली के अंतर्गत पुनर्गठित करते। आपके भूदान आन्दोलन से प्रेरित होकर हरदोई जनपद के सर्वोदय आश्रम टडियांवा द्वारा उत्तर प्रदेश के 25 जनपदों में श्री रमेश भाई के नेतृत्व में उसर भूमि सुधार कार्यक्रम सफलता पूर्वक चलाया गया।

Wednesday, May 29, 2019

सचिनदेव बर्मन : ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना

सचिनदेव बर्मन का जन्म वर्ष 1 अक्टूबर, 1906 में त्रिपुरा हुआ। उनके पिता जाने-माने सितारवादक और ध्रुपद गायक थे। बचपन के दिनों से ही सचिनदेव बर्मन का रुझान संगीत की ओर था और वे अपने पिता से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लिया करते थे। इसके साथ ही उन्होंने उस्ताद बादल खान और भीष्मदेव चट्टोपाध्याय से भी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली। 

अपने जीवन के शुरुआती दौर में सचिनदेव बर्मन ने रेडियो से प्रसारित पूर्वोतर लोक-संगीत के कार्यक्रमों में काम किया। वर्ष 1930 तक वे लोकगायक के रूप में अपनी पहचान बना चुके थे। 

वर्ष 1944 में संगीतकार बनने का सपना लिए सचिनदेव बर्मन मुंबई आ गए, जहां सबसे पहले उन्हें 1946 में फिल्मिस्तान की फिल्म ‘एट डेज’ में बतौर संगीतकार काम करने का मौका मिला, लेकिन इस फिल्म के जरिए वे कुछ खास पहचान नहीं बना पाए। 


इसके बाद 1947 में उनके संगीत से सजी फिल्म ‘दो भाई’ के पार्श्वगायिका गीता दत्त के गाए गीत ‘मेरा सुंदर सपना बीत गया…’ की कामयाबी के बाद वे कुछ हद तक संगीतकार अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए। 

सचिनदेव बर्मन ने करीब 3 दशक के सिने करियर में लगभग 90 फिल्मों के लिए संगीत दिया। उनके फिल्मी सफर पर नजर डालने पर पता लगता है कि उन्होंने सबसे ज्यादा फिल्में गीतकार साहिर लुधियानवी के साथ ही की हैं। 

1951 में फिल्म नौजवान के गीत ‘ठंडी हवाएं, लहरा के आए…’ के जरिए लोगों का मन मोहा। वर्ष 1951 में ही गुरुदत्त की पहली निर्देशित फिल्म ‘बाजी’ के गीत ‘तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना दे…’ में एस.डी. बर्मन और साहिर की जोड़ी ने संगीत प्रेमियों का दिल जीत लिया। 

एस.डी. बर्मन और साहिर लुधियानवी की सुपरहिट जोड़ी फिल्म ‘प्यासा’ के बाद अलग हो गई। एसडी बर्मन की जोड़ी गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी के साथ भी बहुत जमी। देवानंद की फिल्मों के लिए एसडी बर्मन ने सदाबहार संगीत दिया और उनकी फिल्मों को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बर्मन दा के पसंदीदा निर्माता-निर्देशकों में देवानंद के अलावा विमल राय, गुरुदत्त, ऋषिकेश मुखर्जी आदि प्रमुख रहे हैं। 

बर्मन दा की फिल्म जगत के किसी कलाकार या गायक के साथ शायद ही अनबन हुई हो, लेकिन 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘पेइंग गेस्ट’ के गाने ‘चांद फिर निकला…’ के बाद लता मंगेशकर और उन्होंने एकसाथ काम करना बंद कर दिया। दोनों ने लगभग 5 वर्ष तक एक-दूसरे के साथ काम नहीं किया। बाद में बर्मन दा के पुत्र आर.डी. बर्मन के कहने पर लता मंगेशकर ने बर्मन दा के संगीत निर्देशन में फिल्म ‘बंदिनी’ के लिए ‘मेरा गोरा अंग लई ले…’ गाना गाया। 

संगीत निर्देशन के अलावा बर्मन दा ने कई फिल्मों के लिए गाने भी गाए। इन फिल्मों में ‘सुन मेरे बंधु रे, सुन मेरे मितवा…’, ‘मेरे साजन है उस पार…’ और ‘अल्लाह मेघ दे छाया दे…’ जैसे गीत आज भी श्रोताओं को भाव-विभोर करते हैं। 

एस.डी. बर्मन को 2 बार फिल्म फेयर के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार से नवाजा गया है। एसडी बर्मन को सबसे पहले 1954 में प्रदर्शित फिल्म ‘टैक्सी ड्राइवर’ के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फिल्म फेयर पुरस्कार दिया गया। इसके बाद वर्ष 1973 में प्रदर्शित फिल्म ‘अभिमान’ के लिए भी वे सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के फिल्म फेयर पुरस्कार से नवाजे गए। 

फिल्म ‘मिली’ के संगीत ‘बड़ी सूनी-सूनी है…’ की रिकॉर्डिंग के दौरान एस.डी. बर्मन अचेतन अवस्था में चले गए। हिन्दी सिने जगत को अपने बेमिसाल संगीत से सराबोर करने वाले सचिन दा 31 अक्टूबर 1975 को इस दुनिया को अलविदा कह गए।