Monday, September 9, 2019

दुनिया का दूसरा सबसे विशाल मकबरा गोल गुम्बद

गोल गुम्बद कर्नाटक राज्य के बीजापुर शहर में स्थित आदिलशाही वंश के सातवें शासक मुहम्मद आदिलशाह का मक़बरा है। यह विश्व का दूसरा सबसे विशाल गुम्बद है। इस विशाल गुम्बद के बनने में बीस वर्ष का समय लगा था। 


इसके फर्श का क्षेत्रफल 18337 वर्गफुट है जो रोम के पेंथियन सेंट पीटर-गिर्जे के गुम्बद से कुछ ही छोटा है। इसकी ऊँचाई फर्श से 175 फुट है और इसकी छत में लगभग 130 फुट वर्ग स्थान घिरा हुआ है। इस गुम्बद का चाप आश्चर्यजनक रीति से विशाल है। दीवारों पर इसके धक्के की शक्ति को कम करने के लिए गुम्बद में भारी निलंबित संरचनाएं बनी हैं, जिससे गुम्बद का भार भीतर की ओर रहे। यह गुम्बद शायद संसार की सबसे बड़ी उपजाप वीथि है। जिसमें सूक्ष्म शब्द भी एक सिरे से दूसरे तक आसानी से सुना जा सकता है। 
  1. यहाँ स्थित उद्यान काफ़ी ख़ूबसूरत है।
  2. इस गुम्बद के ऊपर से बीजापुर शहर का पूरा दृश्य दिखाई पड़ता है।
  3. गोल गुम्बद सेंट पीटर्स के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गुम्बद वाला स्मारक है।

Sunday, September 8, 2019

भारत की कौन सी जगहों पर जाने के लिए "स्पेशल परमिशन" लेनी पड़ती है?

भारत में कुछ जगहें ऐसी है जहां लोगों के जाने पर बैन लगा हुआ है। अगर आप इन जगहों पर जाना चाहते है तो आपको स्पेशल परमिशन लेनी पड़ेगी। स्थानीय लोगों को छोड़करदेश-दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से आए तमाम टूरिस्टों के लिए इनर लाइन परमिट लेना अनिवार्य है। 

दरअसल यह सभी स्थान दूसरे देशों की सीमाओं के नजदीक स्थित हैंऐसे में सुरक्षा कारणों से कारण टूरिस्टों को बगैर परमिशन के एंट्री नहीं मिलती है। तो आइये जानते है उन जगहों के बारे में जहां जाने के लिए आपको इनर लाइन परमिट लेने की जरूरत पड़ेगी।


इनर लाइन परमिट होता है क्या?
दरअसल इनर लाइन परमिट भारत का आधिकारिक यात्रा दस्तावेज है, जो कि देश-विदेशों से आए पर्यटकों को संरक्षित क्षेत्र (Protected area) में जाने के लिए अनुमति देता है। यह परमिट एक निश्चित समय और सीमा के लिए मान्य होता है। वर्तमान में भारत के केवल तीन राज्य मिजोरम, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश के लिए इस परमिट की आवश्यकता पड़ती है। हालांकि, इन राज्यों के अलावा दूसरे देशों के बॉर्डर लाइन पर भी इस परमिट की आवश्यकता होती है

नागालैंड

कोहिमा


कोहिमा नागालैंड राज्य की राजधानी है। पहाड़ की ऊंची चोटी पर बसा सुंदर शहर है, कोहिमा ।इस शहर में अधिकतर नागा जनजाति के लोग रहते हैं। इन आदिवासियों की संस्कृति बहुत रंग-बिरंगी है, जो पर्यटकों को बहुत पसंद आती है। कोहिमा के संरक्षित क्षेत्रों में यात्रा करने के लिए इनर लाइन परमिट की आवश्‍यकता पड़ती है। विदेशी पर्यटकों को कोहिमा के संरक्षित क्षेत्र में प्रवेश करने व भ्रमण करने के लिए जिले के विदेशी पंजीकरण अधिकारी के पास पंजीकृत कराना होता है। पंजीकरण कराने के 24 घंटे के अंदर ही विदेशी पर्यटक आराम से सैर कर सकते हैं।
दीमापुर

दीमापुर नागालैंड का सबसे बड़ा शहर है। यह नागालैंड में यात्रा करने के लिए दिलचस्प जगह है।यह नागालैंड के प्रवेश द्वार भी है। दीमापुरधनसिरी के तट पर स्थित है। अक्सर इसे यूरोपीय विद्वानों द्वारा ईंट सिटी के रूप में वर्णित किया जाता है।
मोकोकचुंग

मोकोचुंग एक लोकप्रिय आकर्षण जिला संग्रहालय है। जो ढाल, तलवारें और परंपरागत गहने जैसे नागा कलाकृतियों को प्रस्तुत करता है। आपको यहाँ से नागा हिल्स का एक शानदार दृश्य भी मिलेगा।यह सच है कि दीमापुर और कोहिमा के बाद नागालैंड में तीसरी सबसे महत्वपूर्ण शहरी केंद्र मोकोचुंग है।

अरुणाचल प्रदेश

ज़ीरो
भारत में अरुणाचल प्रदेश के ज़ीरो वैली को विश्व विरासत स्थल (World Heritage Site) में शुमार किया गया है। इस राज्य में देशी-विदेशी पर्यटकों को देखने के लिए कई शानदार टूरिस्ट स्थान हैं, लेकिन ज़ीरो वैली काफी प्रसिद्ध है। लेकिन यहाँ के लिए आपको इनर लाइन परमिट लेने की आवश्यकता है।

तवांग

तवांग में 400 वर्षीय पुराना मठ है । वह भारत में सबसे बड़े मठों में से एक है । ल्हासा के बाहर सबसे बड़ा मठ है।तवांग के पश्चिम में भूटान की सीमा और उत्तर में तिब्बत जिला है।लगभग 3048 मीटर की ऊंचाई पर स्थित, कई महत्वपूर्ण और सुंदर मठों के लिए जाना जाता है और दलाई लामा के जन्म स्थान के रूप में प्रसिद्ध है।

भालुक्पोंग

अरुणाचल प्रदेश के पश्चिम कामेंग जिले में हिमालय की तलहटी में स्थित एक छोटा सा शहर है, भालुकोंग। यह अपनी प्राकृतिक सुंदरता और शांत माहौल के लिए जाना जाता है, जो हर आगंतुक पर जादू करता है।यह ऐन्गलिंग और राफ्टिंग करने के लिए बहुत अच्छा स्थान है। यह पख्तुई वन्यजीव अभयारण्य के घने जंगल और कामेंग नदी के किनारे पर स्थित है।

मिजोरम

ऐज़ावल
ऐज़ावल भारत के मिजोरम राज्य की राजधानी है। ऐज़ावल में म्यूजियम, हिल स्टेशन, शानदार प्लेसेस हैं, जिसे देखने के लिए दुनियाभर से लोग आते हैं। यह पूर्व और दक्षिण में म्यांमार और पश्चिम में बांग्लादेश के बीच स्थित होने के कारण भारत के पूर्वोत्तर कोने में मिजोरम सामरिक दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण राज्य हैं।
लुंगलेई


लुंगलेई अपनी प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध है। यह एक आदर्श गंतव्य है, उनके लिए जो एक ब्रेक लेना चाहते है और प्रकृति के सरल बनावट का मज़ा लेना चाहते है।यह शहर मिजोरम राज्य के दक्षिणी हिस्से में स्थित है, और इसका नाम पत्थर जैसे वास्तविक पुल के नाम पर रखा गया है। यह शहर ऐज़ावल शहर के करीब होने की वजह से काफी मशहूर है।

मणिपुर

लोकतक लेक


लोकटक झील भारत के मणिपुर राज्य की एक झील है। लोकटक झील अपनी सतह पर तैरते हुए वनस्पति और मिट्टी से बने द्वीपों के लिये प्रसिद्ध है, जिन्हें कुंदीकहा जाता है। लोकटक झील तैरते हुए भूखंड के टुकड़े मिट्टी, पेड़-पौधों और जैविक पदार्थों से मिलकर बनी हुई हैं। मिट्टी से बने भूखंड के छोटे-छोटे टुकड़े, पर्यटकों को अपनी ओर खूब आकर्षित करते है। हालांकि, इस झील को देखने के लिए भी इनर लाइन परमिट लेने की आवश्यकता है।

सिक्किम

छंगू झील


छंगू झील सिक्किम राज्य की सबसे खूबसूरत और प्रसिद्ध झील है। यह झील करीब एक किलोमीटर लम्बी, आधा किलोमीटर चौड़ी और 15 मीटर गहरी है. स्थानीय लोग इसे छंगू लेक (Changu Lake) और सोमगो लेक (Tsomgo Lake) दोनों नाम से पुकारते हैं। समुद्र तल से इसकी ऊँचाई लगभग 3757 मीटर (11271 फीट) है। सर्दियों में यह झील जम जाती है, और चारों तरफ बर्फ ही बर्फ नजर आती है। ऐसा कहा जाता है कि मौसम के हिसाब से झील अपना रंग बदल लेती है। छंगू झील पर आने वाले पर्यटकों को गंगटोक से ही परमिट बनवा कर लाना पड़ता है। यह परमिट सिक्किम पर्यटन कार्यालय (Sikkim Tourism Office) से या फिर ट्रेवल एजेंट की सहायता से बना सकते है।

Monday, August 26, 2019

क्या होता है बादल का फटना जिससे पहाड़ों में अकसर तबाही होती है?

मानसून के समय में भारत के पहाड़ी राज्यों में अकसर बादल फटने की घटनाएं सुनने को आती हैं। साल 2013 में आई केदारनाथ त्रासदी के पीछे की मुख्य वजह भी बादल फटना थी जिसमें हजारों लोग मारे गए थे।


भारत में मानसून के दौरान पहाड़ों पर अकसर बादल फटने की खबरें आती हैं। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर से बादल फटने की खबरें आती रहती हैं। बादल फटने की हर घटना अपने साथ तबाही लाती है और अपने निशान छोड़ जाती है। लेकिन बादल फटने से होने वाली इस तबाही को रोका क्यों नहीं जा सकता है? बादल कोई गुब्बारा तो नहीं होता, ऐसे में यह फट कैसे सकता है?


पुराना शब्द है बादल फटना

बादल का "फटना" कोई वैज्ञानिक शब्द नहीं है। बादल फटने की घटना विज्ञान के विकास से पहले भी होती रही है। पहले के जमाने में माना जाता था कि बादल किसी गुब्बारे की तरह होते हैं। इनमें पानी भरा होता है। जहां बारिश होती है, इनमें से धीरे धीरे पानी रिसता है। जब बादल फटता है, तो गुब्बारे की तरह फट जाता है और बहुत सारा पानी एक साथ जमीन पर गिर जाता है। लेकिन विज्ञान के विकसित होने के साथ ही पता चला कि बादल गुब्बारे के जैसे नहीं होते। ये भाप के बने होते हैं। इनमें मौजूद नमी इकट्ठा होकर बूंदों का रूप ले लेती है जो बारिश के रूप में जमीन पर गिरती है। बादलों को लेकर इंसानी धारणा तो बदल गई लेकिन शब्द नहीं बदला और इसे आज भी बादल फटना ही कहा जाता है।

होता क्या है बादल फटना?

बादल फटने का मतलब होता है एक जगह पर बड़ी मात्रा में बारिश एक साथ हो जाना। बादल फटने के साथ तूफान या ओले पड़ना भी सामान्य है। 100 मिलीमीटर प्रति घंटे यानी 4।94 इंच प्रति घंटे की रफ्तार से बारिश पड़े तो उसे बादल फटना कहा जाता है। ऐसी परिस्थिति में बूंदों का आकार भी सामान्य से बड़ा होता है। इसकी वजह होती है ऑरोग्राफिक लिफ्ट। यही वजह है की बादल फटने की घटनाएं अकसर पहाड़ों पर होती हैं। पहाड़ की तलहटी में मौजूद गर्म हवा पहाड़ों से टकराकर ऊपर उठने लगती है। जब यह गर्म हवा ऊपर मौजूद बादलों से टकराती है, बादलों में मौजूद पानी के अणुओं के बीच लगने वाला अंतरआण्विक बल कमजोर हो जाता है। इस वजह से पानी की बूंदें भी हवा के साथ ऊपर उठने लगती हैं। ये बूंदे आपस में मिलकर बड़ी बूंदों में बदल जाती हैं। ये संघनित तो हो जाती हैं लेकिन इलेक्ट्रो बलों के चलते ये बादलों से बाहर नहीं निकल पाती। ज्यादा नमी वाले ऐसे बहुत सारे बादल एक साथ इकट्ठा होते जाते हैं।

जैसे-जैसे ये बूंदे इकट्ठी होती जाती हैं वैसे ही पानी की सघनता बढ़ने लगती है और पानी का वजन बढ़ने लगता है। इस बढ़ते बोझ को बादल सहन नहीं कर पाते हैं और एक साथ सारा पानी बरसा देते हैं। ऐसे बादलों को प्रैग्नेंट क्लाउड यानी गर्भवती बादल कहते हैं। ऐसे बादल अकसर कम ऊंचाई यानी 15 किलोमीटर के आसपास ही होते हैं। बादल फटने का इलाका ज्यादा नहीं होता है। लेकिन एक ही जगह पर इतनी ज्यादा बारिश होने से अव्यवस्था हो जाती है। पहाड़ों से यह पानी तेज बहाव से नीचे आता है। इस पानी के साथ कीचड़ और मलबा भी होता है जो ज्यादा घातक होता है।

ऐसा जरूरी नहीं है कि बादल फटने की घटनाएं सिर्फ पहाड़ों पर ही हों। 2005 में मुंबई में बादल फटने की घटना सामने आई थी। इसकी वजह बादलों के सामने पहाड़ की जगह गर्म हवा का अवरोध होना था। गर्म हवा के अवरोध की वजह से ज्यादा नमी वाले बादल वहां इकट्ठा होते गए और बहुत मात्रा में बारिश एक साथ हो गई। 2013 में हुई केदारनाथ त्रासदी के पीछे भी वजह बादल फटना ही थी।

Wednesday, August 21, 2019

क्या आप जानते हैं, पेड़ों में क्यों लगाया जाता है सफेद रंग?

अक्सर आप पेड़ों पर सफेद रंग की पुताई देखे होंगे। पर क्या आप जानते हैं, पेड़ों पर सफेद रंग क्यों लगाया जाता है। 

अक्सर आप पेड़ों पर सफेद रंग की पुताई देखे होंगे। पर क्या आप जानते हैं, पेड़ों पर सफेद रंग क्यों लगाया जाता है। तो चलिए आपको इस लेख द्वारा बताते हैं। 



पेड़ो पर क्यों की जाती है सफेद रंग की पुताई 


दरअसल, पेड़ों पर रंग करने का मतलब है कि ये पेड़ सरकारी प्रौपर्टी हैं। और वन विभाग इसका देखभाल कर रहा है। इसके साथ ही पेड़ पर सफ़ेद रंग लगाने का ये भी मतलब है कि सरकार के इजाजत के बिना आप पेड़ को नहीं काट सकते। 

पेड़ पर सफेद रंग इसलिए भी लगाया जाता है क्योंकि सफेद रंग अंधेरे में अधिक दिखाई देता है और ऐसे में रात में हादसा होने से बच सकता है। इसके साथ ही पेड़ों पर रंग करने से पेड़ों में दीमक और अन्य जीवजंतु नहीं आते और इस वजह से ही पेड़ लंबे समय तक खड़े रहते हैं।

Monday, August 19, 2019

मैन वर्सेस वाइल्ड: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जंगल में होना इसकी सबसे रोमांचकारी बात नहीं है

अगर बराक ओबामा से तुलना करें तो ‘मैन वर्सेस वाइल्ड’ का नरेंद्र मोदी वाला एपिसोड रोमांच के मामले में ज्यादा नंबर बटोर लेता है। 

अगर मजे-मजे में इस आलेख की शुरूआत करनी हो तो कहा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी दुनिया के ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं, जो हिंदी बोलकर भी बेयर ग्रिल्स जैसे अंग्रेजों को अपनी बात समझा लेते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, ‘मैन वर्सेस वाइल्ड’ के इस स्पेशल एपिसोड में ज्यादातर वक्त हिंदी में बात करते नज़र आते हैं। जब वे ऐसा कर रहे होते हैं, तब शो के एंकर बेयर ग्रिल्स सहमति में सिर हिलाते दिखाई देते हैं लेकिन उनका तरीका जरा बनावटी लगता है। इस पर भी अगर चुटकी लेने की इजाजत मिले तो हम कहना चाहेंगे कि हमारे प्रधानमंत्री इस शो में ग्रिल्स से कहीं बेहतर अभिनय करते नज़र आए हैं। 

‘मैन वर्सेस वाइल्ड’ के इस एपिसोड में नरेंद्र मोदी और बेयर ग्रिल्स के अभिनय करने की बात गंभीरता से भी कही जा सकती है क्योंकि जानने वाले इस बात को जानते हैं कि ग्रिल्स को जरा भी हिंदी नहीं आती है। इसका सीधा मतलब है कि नरेंद्र मोदी को अनजानी रोमांचक यात्रा पर ले जाने का दावा करने वाले इस शो की बातचीत तक स्क्रिप्टेड थी। हालांकि मोदी जैसी हस्तियों के मामले में अक्सर ऐसा होता ही है। लेकिन इस शो में बिलकुल हिंदी न जानने वाले बेयर ग्रिल्स के साथ जिस सहजता से प्रधानमंत्री की बातचीत को दिखाया गया है वह कुछ लोगों को थोड़ा अटपटा लग सकता है। 


इस कार्यक्रम के एक बड़े हिस्से में बड़े इत्मीनान से मोदीजी, ग्रिल्स को बताते हैं कि उनका बचपन बेहद गरीबी में कटा, वे एक समय स्टेशन पर चाय बेचा करते थे और पढ़ाई में बहुत अच्छा न होने के बावजूद एक अनुशासित छात्र थे। इसके अलावा, बचपन में वे मगरमच्छ के बच्चे को घर उठा लाने की घटना भी सुनाते हैं। पर्यावरण संरक्षण के बारे में जागरुकता का संदेश देने के लिए इस कार्यक्रम में शामिल हुए प्रधानमंत्री मोदी, प्रकृति से जुड़े कुछ प्रभावित करने वाले किस्से भी बांटते हैं। मसलन, वे बताते हैं कि उनके पिता बारिश के आने पर चिट्ठी लिखकर लोगों को इसकी खबर दिया करते थे, यह प्रकृति के त्यौहार को मनाने का अनूठा तरीका कहा जा सकता है। साथ ही, वे ओस की बूंदों की वजह से जमी हुई नमक की परत से कपड़े धोने और नहाने की बात भी कहते हैं जो थोड़ी अजीब लगने के चलते आपका ध्यान खींचती है। इसके अलावा, वे कार्यक्रम के दौरान जानवरों से हिंसा ना करने और शाकाहारी होने की जरूरी बात भी कहते नज़र आते हैं। 

इस बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री, बेयर ग्रिल्स के केवल एक ही सवाल का उत्तर नहीं देते हैं। जब ग्रिल्स उनसे पूछते हैं कि रिटायरमेंट के बाद वे खुद को क्या करते हुए देखते हैं, तो मोदी इसका जवाब देने की बजाय उनसे विदा ले लेते हैं। ऐसे में एक अंदेशा होता है कि शायद ग्रिल्स ने यह सवाल स्क्रिप्ट से अलग हटकर पूछ लिया था और नरेंद्र मोदी इसका जवाब कुछ विशेष कारणों से नहीं देना चाहते थे। क्योंकि इसके बाद चलते-चलते सेल्फी लेते हुए ग्रिल्स प्रधानमंत्री से उनके अंडरपैंट्स के सूखे होने के बारे में पूछते हैं तो मोदी बहुत हाजिर जवाबी से कहते हैं कि वे आज के दिन का काम चला लेंगे। 

इस कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब अपने बचपन, हिमालय में गुजारे समय और राजनीति के बारे में बात करते हैं तो ज्यादातर वक्त लगभग वही बातें दोहराते हैं जो वे पहले भी कई बार कह चुके हैं। ‘मैन वर्सेस वाइल्ड’ के बारे में दावा किया जाता है कि यह एक ऐसा कार्यक्रम है जो दुनिया के 180 देशों में प्रसारित होता है। इसका मतलब है कि इसके दर्शकों का एक बड़ा हिस्सा अंग्रेजी बोलने-समझने वाले लोगों का होगा और उसे प्रधानमंत्री के बारे में ये सामान्य बातें भी नहीं मालूम होंगी। लेकिन अगर इन बातों को दोहराने का मकसद, इन्हें ऐसे दर्शकों तक पहुंचाना ही था तो फिर ये हिंदी में क्यों कही गईं? वह भी तब जब प्रधानमंत्री के बारे में यह बात प्रचारित रही है कि वे हिंदी और गुजराती के साथ, अंग्रेजी भी भली तरह से समझते और बोलते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि इंटरनेशनल टेलीविजन पर सीधे अपनी बात पहुंचाने के बजाय पीएम मोदी ने यह काम अनुवादकों के जिम्मे क्यों छोड़ दिया? 

वे ऐसा क्यों करते हैं, इसका अंदाजा आपको थोड़े टेढ़े रास्ते से ‘मैन वर्सेस वाइल्ड’ के इसी एपिसोड से ही मिल जाता है। कार्यक्रम की शुरूआत में बेयर ग्रिल्स प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में बताते हुए कहते हैं कि ‘उन्हें हाल ही में यूएन चैम्पियनशिप ऑफ द अर्थ अवॉर्ड’ से सम्मानित किया गया है।’ यहां पर ध्यान देने वाली बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह अवार्ड अक्टूबर-2018 में दिया गया था और यह कार्यक्रम फरवरी-2019 में शूट किया गया है। फरवरी में तो यह कहा जा सकता था कि अवॉर्ड ‘हाल ही में’ दिया गया है लेकिन अगस्त में इस बारे में जानकारी देते हुए कहा जाएगा कि यह अवॉर्ड ‘बीते साल’ अक्टूबर में दिया गया था। इससे अंदाजा लगता है कि यह कार्यक्रम न सिर्फ फरवरी-2019 में शूट किया था बल्कि इसे उसी समय यानी लोकसभा चुनाव से ठीक पहले प्रसारित किया जाना था। बहुत संभावना है कि शूटिंग वाले दिन ही पुलवामा हमला हो जाने के चलते, किसी विवाद से बचने के लिए इसका प्रसारण कुछ महीनों के लिए टाल दिया गया हो। अब चाहें तो सोच सकते हैं कि शायद इस कार्यक्रम के जरिये प्रधानमंत्री दुनिया भर के लोगों से अप्रत्यक्ष तरीके से और भारतीय जनता से सीधे तरीके से संवाद स्थापित करने की कोशिश कर रहे थे। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पहले अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा भी मैन वर्सेस वाइल्ड में शिरकत कर चुके हैं। अगर उनसे तुलना करें तो नरेंद्र मोदी वाला एपिसोड रोमांच के मामले में ज्यादा नंबर बटोर लेता है। इसमें प्रधानमंत्री चाकू से भाला बनाने और बांस की नाव पर लटकने में ग्रिल्स की मदद करते और उसके जरिए नदी पार करते दिखाई देते हैं। जबकि ओबामा वाले एपिसोड में ऐसा कोई दृश्य नहीं है। बातचीत के दौरान बराक ओबामा जहां बतौर राष्ट्रपति अपने जीवन के बारे में बहुत सहजता से बताते हैं और यह स्वीकार करते हैं कि वे जंगल में बहुत सुरक्षित महसूस नहीं करते हैं, वहीं प्रधानमंत्री मोदी इसमें एक आदर्श निडर पुरुष के रूप में नजर आते हैं। इसके अलावा, अलास्का ग्लेशियर के संरक्षण की बात करने पहुंचे ओबामा कार्यक्रम के दौरान बहुत गंभीरता से इस पर चर्चा करते दिखते हैं, जबकि मोदी काफी हल्के-फुल्के तरीके से और भारतीय संस्कृति के उदाहरण देकर बताते हैं कि प्रकृति का संरक्षण तो हमारी परंपरा का हिस्सा है। 

Friday, August 16, 2019

स्वतंत्रता लोकतंत्र और गणतंत्र में क्या अंतर है

स्वतंत्रता बहुत व्यापक अवधारणा है। इसका सीधा मतलब है व्यक्ति का अपने कार्य-व्यवहार में स्वतंत्र होना पराधीन नहीं होना। व्यावहारिक अर्थ है ऐसी व्यवस्था में रहना जिसमें व्यक्ति की स्वतंत्रता उसका मौलिक अधिकार हो। 

हज़ारों साल के मनुष्य जाति के इतिहास में हमने व्यक्ति के कुछ प्राकृतिक अधिकारों को स्वीकार किया है जैसे जीवन, विचरण भरण-पोषण, निवास वगैरह। इन प्राकृतिक अधिकारों को अतीत में राज-व्यवस्थाओं ने अपने लिखित-अलिखित कानूनों में स्थान देकर नागरिक अधिकार बनाया। 10 दिसम्बर 1948 को जारी संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार घोषणापत्र में इन अधिकारों को जगह दी। 

इन अधिकारों पर नजर डालेंगे तो आप पाएंगे कि दुनिया के नागरिकों को अभी उनके पूरे अधिकार प्राप्त नहीं हैं। सम्भव है कभी मिलें। 


लोकतंत्र एक व्यवस्था का नाम है, जिसकी एक संवैधानिक व्यवस्था भी हो। जब शासन पद्धति पर यह लागू हो तो शासन व्यवस्था लोकतांत्रिक होती है। इसमें हिस्सा लेने वाले या तो आमराय से फैसले करते हैं और यदि ऐसा न हो तो मत-विभाजन से करते हैं। ये निर्णय सामान्य बहुमत से और कई बार ज़रूरी होने पर विशेष बहुमत से भी होते हैं। मसलन कुछ परिस्थितियों में दो तिहाई मत से भी निर्णय किए जाते हैं। 

गणतंत्र वह शासन पद्धति जहाँ राज्यप्रमुख का निर्वाचन सीधे जनता करे या जनता के प्रतिनिधि करें। यानी राष्ट्रप्रमुख वंशानुगत या तानाशाही तरीके से सत्ता पर कब्जा करके न आया हो। 

कुछ ऐसे देश भी हैं, जहाँ शासन पद्धति लोकतांत्रिक होती है, पर राष्ट्राध्यक्ष लोकतांत्रिक तरीके से नहीं चुना जाता। 

Monday, August 12, 2019

पूरे विश्व में बोली की संख्या कितनी?


दुनिया के हर देश में अलग अलग भाषा बोली जाती है। लेकिन क्या आपको पता है कि दुनिया में कुल कितनी भाषाएँ बोली जाती हैं। इसका जवाब तो किसी के पास प्रमाणिक तौर पर नहीं है लेकिन लेकिन U.N. के अनुसार, दुनिया भर में बोली जाने वाली कुल भाषाएँ 6809 है।

वर्ष 2019 को संयुक्त राष्ट्र की स्थानीय भाषा का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष घोषित किया गया है संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार पापुआ न्यू गिनी में दुनिया की सबसे अधिक 840 स्वदेशी भाषाएँ बोली जाती है, जबकि भारत 453 भाषाओं के साथ चौथे स्थान पर है

हर किसी को लगता है कि अंग्रेजी और स्पेनिश भाषा पूरे विश्व में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। वास्तव में अंग्रेजी को बोलने वाले लोगों की संख्या चीन की मंदारिन भाषा से बहुत कम है। कुल आंकड़ों में अगर बात की जाए तो यह भाषा एक अरब से ज्यादा लोग बोलते हैं।

अंग्रेजी भाषा पूरे विश्व में अपनी पकड़ बना चुकी है मूल रूप से यह भाषा अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन में बोली जाती है। लेकिन लगभग पूरे विश्व में 508 मिलियन लोग इस भाषा का इस्तेमाल करते हैं यह दुनिया की तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में से है।


पर भारत एक ऐसा देश हैं, जहां हर शहर नहीं, बल्कि हर गांव, हर जिले के साथ भाषा बदल जाती है। विभिन्न सभ्यता, संस्कृति के साथ भारत में लगभग 780 भाषाएं बोली जाती हैं।

भारत में 22 भाषाओं को आधिकारिक तौर पर मान्यता प्राप्त है। जबकि मुख्य रूप से यहां सरकारी कामकाज की दो ही भाषा है, हिंदी व अंग्रेजी। हालांकि, हिंदी की उपयोगिता को लेकर राजनीतिक तौर पर समय समय पर विवाद उठता रहा है।

वहीं, संस्कृत को सभी भाषा की जनक के रूप में देखा जाता है। इसने कई भाषाओं को जन्म दिया है। लेकिन संस्कृत की तरह ही हर भाषा का अपना इतिहास, अपनी एक कहानी होती है। किसी भाषा की यात्रा मात्र साल दो साल की नहीं, सदियों की होती है। वहीं, यह काफी दिलचस्प भी होती है।
मराठी को योद्धाओं के भाषा के रूप में माना जाता है। भारत में मराठी मुख्य रूप से महाराष्ट्र में बोली जाती है।

मलयालम मुख्य रूप से भारत के केरल राज्य में बोली जाती है। जबकि दुनिया भर में 90 मिलियन से ज्यादा लोग मलयालम बोलते हैं।

भारत में हिंदी भाषा 77 प्रतिशत जनसंख्या द्वारा बोली जाती है। वहीं, विश्व भर में इसे 500 मिलियन से ज्यादा लोग बोलते हैं। यह भाषा दुनिया में सर्वाधिक बोले जाने वाली भाषाओं में चौथे स्थान पर आती है। इस भाषा को पूरे विश्व में 80 करोड लोग समझ सकते हैं। हिंदुस्तान में लगभग 45 करोड़ लोग हिंदी भाषा का उपयोग करते हैं।

कन्नड़ 2,500 वर्ष प्राचीन भाषा है। भारत में मुख्य रूप से यह कर्नाटक में बोली जाती है।

खरोष्ठी लिपि अब विलुप्त हो चुकी है। पहले यह गांधार क्षेत्र में बोली जाती थी। इसे भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व की सबसे पुरानी लिपि में से एक माना गया है

भारत में तमिल बोलने वालों की तादाद बहुत ज्यादा है। यह भाषा भारत के जड़ों में बसी है।
पंजाबी 750 AD and 1400 AD के बीच एक भिन्न भाषा के रूप में पहचाना गया। यह गुरुमुखी लिपि में लिखा जाता है।

उड़िया भारत की राज्यभाषा है। वहीं, पूरे विश्व भर में यह 35 मिलियन से ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाती है।

नेपाली भारत में पश्चिम बंगाल, असम और सिक्किम के की इलाकों में बोली जाती है। यह नेपाल की राष्ट्र भाषा है।

तेलुगु भाषा भारत में मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश में बोली जाती है। 11वीं सदी में सबसे पहले तेलुगु साहित्य में 'महाभारत' लिखी गई थी।

विश्व भर में 210 मिलियन से ज्यादा लोग बंगाली बोलते हैं। भारत में प्रमुख रूप से यह पश्चिम बंगाल में बोला जाता है।

Wednesday, August 7, 2019

टीकाकरण क्या है?

आप लोग अक्सर यह सोचते होंगें कि टीका क्या है और क्यों हमारे शिशु को दिया जाता है। आखिर नवजात शिशु के जन्म के बाद टीके लगवाना क्यों आवश्यक होते है। तो हम आपको बता दें कि टीका एक जीवन रक्षक औषधि की तरह है जो आपके बच्चे का रक्षा कवच बनकर उसके जीवन की सुरक्षा करता है। 

टीका बच्चे के शरीर को संक्रामक रोगों से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है ताकि नवजात शिशु को कोई भी संक्रामक रोग छू भी न सकें। बच्चों को टीका लगवाने की यह क्रिया वैक्सीनेशन कहलाती है। संक्रामक रोगों की रोकथाम के लिये यह प्रक्रिया सबसे सस्ती और सबसे प्रभावी है। 

टीकाकरण के प्रकार

वैक्सीनेशन के निम्न तीन प्रकार होते हैं। 

1. प्राथमिक टीकाकरण

नवजात शिशु संक्रामक रोगों से बचा रहें और उसके शरीर में रोगों से लड़ने के लिए प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत हो इसके लिए नवजात शिशु के जन्म के समय से ही प्राथमिक टीकाकरण किया जाता है। समय समय पर दिए जाने वाले टीके बच्चे को कई जान लेवा बीमारियों से बचाते है इसलिए समय पर बच्चों को टीका अवश्य लगवाएं। 

2. बूस्टर टीकाकरण

बूस्टर खुराकें प्राथमिक टीकाकरण के प्रभाव को बढ़ाने के लिए दी जाती हैं। ताकि जिन शिशुओं में पहले टीके के बाद प्रतिरक्षण क्षमता विकसित नही हुई हो, उन्हें बूस्टर ख़ुराक़ देकर रोगों से लड़ने की क्षमता विकसित की जाए ताकि शिशु हमेशा रोगों से बचा रहें। 

3. सार्वजनिक टीकाकरण

जब किसी जगह किसी विशेष बीमारी का भयावह रूप बच्चों पर दिखने लगता है तो उस बीमारी से सभी बच्चों की रक्षा के लिए और उस बीमारी को जड़ से ख़तम करने के लिए सार्वजनिक टीकाकरण कार्यक्रम चलाया जाता है। जैसे प्लस पोलियों अभियान सरकार के द्वारा पोलियो को जड़ से ख़तम करने के लिए चलाया गया और जनता के सहयोग से यह अभियान सफल रहा जिससे आज भारत पोलियो मुक्त बन चुका है। 

टीके देने का तरीक़ा

पोलियो के अतिरिक्‍त बाकि सभी टीके इंजेक्‍शन द्वारा दिये जाते हैं। सिर्फ़ पोलियो के टीके की दो बूंद बच्‍चे के मुंह में डालकर पिलाई जाती है।

Monday, August 5, 2019

धारा-370 क्या है?

धारा-370 का खात्मा हो गया है और इसके खत्म होते ही देश की राजनीति में हंगामा मच गया है। जहां कुछ राजनेता इसे एक देश-एक संविधान बता रहे हैं। वहीं ज्यादातर विपक्षी दल इसका विरोध कर रहे हैं। जानकारों का भी मानना है कि धारा-370 खत्म होने के बाद जम्मू-कश्मीर सही मायनों में भारत का अभिन्न अंग हो गया है।
क्या है धारा 370
धारा 370 भारतीय संविधान का एक विशेष अनुच्छेद यानी धारा है। जो जम्मू-कश्मीर राज्य को भारत में अन्य राज्यों के मुकाबले विशेष अधिकार या विशेष दर्ज़ा देती है। भारतीय संविधान में अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष उपबन्ध सम्बन्धी भाग 21 का अनुच्छेद 370 जवाहरलाल नेहरू के विशेष हस्तक्षेप से तैयार किया गया था।
राजा हरि सिंह ने रखा था प्रस्ताव
देश आजाद होने के बाद छोटी-छोटी रियासतों को भारतीय संघ में शामिल किया गया था। जब जम्मू-कश्मीर को भारतीय संघ में शामिल करने की प्रक्रिया शुरू हुई तभी पाकिस्तान समर्थित कबिलाइयों ने वहां आक्रमण कर दिया। कश्मीर के तत्कालीन राजा हरि सिंह ने ही कश्मीर के भारत में विलय का प्रस्ताव रखा था।
धारा 306ए से बनी थी धारा 370
उस समय कश्मीर का भारत में विलय करने की संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करने का वक्त नहीं था। इसी हालात को देखते हुए संघीय संविधान सभा में गोपालस्वामी आयंगर ने धारा 306-ए का प्रारूप प्रस्तुत किया था, जो बाद में धारा 370 बन गई। जिसकी वजह से जम्मू-कश्मीर को भारत के अन्य राज्यों से अलग अधिकार मिले हैं।
देश के अन्य राज्यों के लोगों के लिए ये बहुत बड़ी खुशखबरी है, जिसका इंतजार देश को आजादी के बाद से ही था। धारा-370 हटने से कश्मीर में ये 10 बड़े परिवर्तन हुए हैं :
1. अब जम्मू-कश्मीर में अब कोई भेदभाव नहीं होगा, देश के अन्य राज्यों के लोग भी वहां जमीन लेकर बस सकेंगे।
2. कश्मीर का अब अलग झंडा नहीं होगा। मतलब वहां भी अब तिरंगा शान से लहराएगा।
3. धारा-370 के साथ ही जम्मू-कश्मीर का अलग संविधान भी इतिहास बन गया है। अब वहां भी भारत का संविधान लागू होगा।
4. जम्मू-कश्मीर में स्थानीय लोगों की दोहरी नागरिकता समाप्त हो जाएगी।
5. जम्मू-कश्मीर के दो टुकड़े कर दिए गए हैं। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख अब अलग-अलग राज्य होंगे।
6. दोनों नए राज्य जम्मू-कश्मीर व लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश होंगे।
7. जम्मू-कश्मीर में विधानसभा होगी, लेकिन लद्दाख में विधानसभा नहीं होगी। मतलब जम्मू-कश्मीर में राज्य सरकार बनेगी, लेकिन लद्दाख की कोई स्थानीय सरकार नहीं होगी।
8. जम्मू-कश्मीर की लड़कियों को अब दूसरे राज्य के लोगों से भी शादी करने की स्वतंत्रता होगी। दूसरे राज्य के पुरुष से शादी करने पर उनकी नागरिकता खत्म नहीं होगी।
9. धारा-370 में पहले भी कई बदलाव हुए हैं। 1965 तक जम्मू और कश्मीर में राज्यपाल की जगह सदर-ए-रियासत और मुख्यमंत्री की जगह प्रधानमंत्री हुआ करता था।
10. धारा-370 को खत्म करने की मंजूरी राष्ट्रपति ने पहले ही दे दी थी। दरअसल ये अनुच्छेद पूर्व में राष्ट्रपति द्वारा ही लागू किया गया था। इसलिए इसे खत्म करने के लिए संसद से पारित कराने की आवश्यकता नहीं थी।

Saturday, August 3, 2019

ट्यूबलाईट देरी से क्यों जलती हैं?

ऐसा इसलिए है क्योंकि एक स्टार्टर, जो capacitor होता है, चार्ज किया जाना चाहिए और फिर यह ट्यूब में गैस को आयनीकृत करता है। इस प्रक्रिया में पहली बार समय लगता है।


आइए देखें कि ट्यूबलटाइट कैसे काम करता है: 

फ्लोरोसेंट ट्यूब एक कम दबाव वाला पारा-वाष्प गैस-निर्वहन लैंप है जो दृश्य प्रकाश उत्पन्न करने के लिए फ्लोरोसेंस का उपयोग करता है। गैस में एक विद्युत प्रवाह पारा वाष्प को उत्तेजित करता है, जो शॉर्ट-वेव पराबैंगनी प्रकाश उत्पन्न करता है जो तब दीपक के अंदर चमकने के लिए फॉस्फर कोटिंग का कारण बनता है। 

स्टार्टर: एक स्टार्टर वास्तव में फ्लोरोसेंट दीपक के साथ समानांतर में जुड़ा एक capacitor होता है। 

स्टार्टर चार्ज करने और गैस को आयनित करने में समय लगता है। 

यह भी वही कारण है कि यदि आप इसे बंद कर देते हैं और इसे वापस चालू करते हैं, तो यह जल्दी से रोशनी करता है। 

ऐसा इसलिए है क्योंकि गैस पहले ही आयनित है। 

विभिन्न गैसों (Neon) और जैसे विभिन्न रंगों के साथ कई प्रकार के ट्यूबलाइट्स हैं।

Wednesday, July 31, 2019

अपोलो 11 मिशन के 50 साल पूरे, जानिए चंद्रमा की पहली यात्रा के बारे में सबकुछ

चांद पर अमेरिकी मिशन Apollo के 50 साल पूरे होने के मौके पर गूगल ने डूडल बनाया है। इस डूडल में Google ने एक एस्ट्रॉनॉट को चांद पर उतरता हुआ दिखाया है। इसके साथ ही डूडल पर एक प्ले का बटन है जिस पर क्लिक करने के बाद एक वीडियो के जरिए पूरे घटनाक्रम के बारे में जान सकेंगे। 16 जुलाई 1969 को लॉन्च अपोलो 11 चांद के लिए एक अमेरिकी मिशन था। 

अपोलो 11 का मिशन प्लान दो लोगों को चंद्र सतह पर लाने और उन्हें सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर वापस लाने का था। 

इस मिशन का उद्देश्य चांद की सतह पर लोगों को सुरक्षित तरीके से भेजना और उन्हें वापस लाना था। इस मिशन को 16 जुलाई 1969 में सुबह 8:32 बजे लॉन्च किया गया था। इस मिशन के तहत मिशन कमांडर Neil Armstrong, Edwin “Buzz” Aldrin और Michael Collins के चालक दल को भेजा गया था। जो सफलता पूवर्क चांद पर जाकर वापस लौटे थे। चंद्रमा की सतह पर सुरक्षित रूप से उतरने के बाद नील आर्मस्ट्रॉन्ग ने पहली बार अंतरिक्ष यान से बाहर कदम रखा था और वह चांद की सतह पर उतरने वाले पहले व्यक्ति थे। 


जिस लूनर मॉड्यूल से ये दोनों अंतरिक्ष यात्री अपोलो-11 से निकलकर चंद्रमा तक पहुंचे उसे 'द ईगल' नाम दिया गया था। 

ये दोनों अंतरिक्ष यात्री 21 घंटे 31 मिनट तक चंद्रमा पर रुके थे। एडविन एल्ड्रिन ने नील आर्मस्ट्रांग के 19 मिनट बाद चंद्रमा पर कदम रखा था। दोनों ने अंतरिक्ष यान पर 2 घंटे 15 मिनट बिताए थे। लेकिन आर्मस्ट्रांग और एडविन के लिए चंद्रमा तक पहुंचने का ये सफर आसान नहीं था। सबसे पहले दोनों अंतरिक्ष यात्रियों का पृथ्वी से रेडियो संपर्क टूट गया था। इसके बाद ऑनबोर्ड कम्प्यूटर में कई एरर कोड्स आने लगे थे। 

इतना ही नहीं, 'द ईगल' में ईंधन की कमी भी सामने आई थी। लेकिन नील आर्मस्ट्रांग और एडविन एल्ड्रिन दोनों ने मिलकर सफलतापूर्वक इन परेशानियों का सामना कर 20 जुलाई, 1969 को चंद्रमा पर लैंडिग की थी। 

नासा ने भी आज के दिन याद रखने के लिए इस अभियान का वीडियो शेयर किया है। अपोलो-11 मिशन में दुनियाभर के 40 हजार लोगों ने अपनी भूमिकाएं निभाई थीं। इनमें साइंटिस्ट, मजदूर और इंजीनियर जैसे कई सेक्टर के लोग शामिल थे।

जानिए छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन से जुड़ी बातें

भारत की शान वीर छत्रपति शिवाजी का असली नाम शिवाजी राजे भोसले था| उनका जन्म 19 फरवरी 1630 में शिवनेरी दुर्ग में हुआ था| शिवाजी के पिता शाहजी भोंसले एवं माता जिजाबाई ने देवी शिवाई का आशीर्वाद मान कर बालक का नाम शिवाजी रखा था| 

शिवाजी महाराज का नाम आते ही मन में सबसे पहले किसी निर्भीक मराठा योधा की क्षवि आती है जिसने गुर्रिल्ला युद्ध को नए आयाम दिया साथ ही साथ मुगलों से भी जमकर लोहा लिया|

शिवाजी में नेतृत्व कौशल के साथ जन्मजात योद्धा वाले सारे गुण थे, शिवाजी को भगवा शासन का प्रस्तावक भी कहा जा सकता है, हालांकि वह अपने दृष्टिकोण में अत्यंत धर्मनिरपेक्ष थे। उन्होंने नौसेना भी तैयार की थी| भारतीय नौसेना का उन्हें जनक माना जाता है|


1. शिवाजी की मदद से औरन्जेब ने जीता था बीजापुर
शिवाजी ने मुगलों के साथ शांतिपूर्ण संबंध बनाए रखा। हालांकि, दो राज्यों के बीच का बंधन तब प्रभावित हो गया जब उनके अधिकारीयों ने अहमदनगर और जुन्नर के मुगल साम्राज्य के क्षेत्रों पर छापा मारा था । जवाबी कार्रवाई में मुगलों ने भी शिवाजी के साम्राज्य पर छापा मारा।

2. वह एक पहाड़ी चूहे के रूप में जाना जाता था
अपने क्षेत्र की अच्छी जानकारी होने की वजह से शिवाजी अक्सर अपनी गुरिल्ला रणनीति के माध्यम से अपने दुश्मनों पर आश्चर्यजनक हमले करते थे यही वजह है कि उन्हें एक पहाड़ी चूहे के रूप में जाना जाता था।

शिवाजी कीअप्रैल 1680 को बीमार होने पर मृत्यु हो गई थी|

Monday, July 29, 2019

भारत की सबसे ऊंची मीनार : कुतुब मीनार


कुतुब मीनार लाल और बफ सेंड स्टोन से बनी भारत की सबसे ऊंची मीनार है।

13वीं शताब्‍दी में निर्मित यह भव्‍य मीनार राजधानी, दिल्‍ली में खड़ी है। इसका व्‍यास आधार पर 14.32 मीटर और 72.5 मीटर की ऊंचाई पर शीर्ष के पास लगभग 2.75 मीटर है। यह प्राचीन भारत की वास्‍तुकला का एक नगीना है।

इस संकुल में अन्‍य महत्‍वपूर्ण स्‍मारक हैं जैसे कि 1310 में निर्मित एक द्वार, अलाइ दरवाजा, कुवत उल इस्‍लाम मस्जिद; अलतमिश, अलाउद्दीन खिलजी तथा इमाम जामिन के मकबरे; अलाइ मीनार सात मीटर ऊंचा लोहे का स्‍तंभ आदि।


गुलाम राजवंश के कुतुब उद्दीन ऐबक ने ए. डी. 1199 में मीनार की नींव रखी थी और यह नमाज़ अदा करने की पुकार लगाने के लिए बनाई गई थी तथा इसकी पहली मंजिल बनाई गई थी, जिसके बाद उसके उत्तरवर्ती तथा दामाद शम्‍स उद्दीन इतुतमिश (ए डी 1211-36) ने तीन और मंजिलें इस पर जोड़ी। इसकी सभी मंजिलों के चारों ओर आगे बढ़े हुए छज्‍जे हैं जो मीनार को घेरते हैं तथा इन्‍हें पत्‍थर के ब्रेकेट से सहारा दिया गया है, जिन पर मधुमक्‍खी के छत्ते के समान सजावट है और यह सजावट पहली मंजिल पर अधिक स्‍पष्‍ट है।

कुवत उल इस्‍लाम मस्जिद मीनार के उत्तर - पूर्व ने स्थित है, जिसका निर्माण कुतुब उद्दीन ऐबक ने ए डी 1198 के दौरान कराया था। यह दिल्‍ली के सुल्‍तानों द्वारा निर्मित सबसे पुरानी ढह चुकी मस्जिद है। इसमें नक्‍काशी वाले खम्‍भों पर उठे आकार से घिरा हुआ एक आयातकार आंगन है और ये 27 हिन्‍दु तथा जैन मंदिरों के वास्‍तुकलात्‍मक सदस्‍य हैं, जिन्‍हें कुतुब उद्दीन ऐबक द्वारा नष्‍ट कर दिया गया था, जिसका विवरण मुख्‍य पूर्वी प्रवेश पर खोदे गए शिला लेख में मिलता है। आगे चलकर एक बड़ा अर्ध गोलाकार पर्दा खड़ा किया गया था और मस्जिद को बड़ा बनाया गया था। यह कार्य शम्‍स उद्दीन इतुतमिश ( ए डी 1210-35) द्वारा और अला उद्दीन खिलजी द्वारा किया गया था। इसके आंगन में स्थित लोहे का स्‍तंभ चौथी शताब्‍दी ए डी की ब्राह्मी लिपि में संस्‍कृत के शिला लेख दर्शाता है, जिसके अनुसार इस स्‍तंभ को विष्‍णु ध्‍वज (भगवान विष्‍णु के एक रूप) द्वारा स्‍थापित किया गया था और यह चंद्र नाम के शक्ति शाली राजा की स्‍मृति में विष्‍णु पद नामक पहाड़ी पर बनाया गया था। इस स्‍तंभ के ऊपरी सिरे में एक गहरी खांच दिखाई देती है जो संभव तया गरूड़ को इस पर लगाने के लिए थी।

इतुतमिश (1211-36 ए डी) का मकबरा ए डी 1235 में बनाया गया था। यह लाल सेंड स्‍टोन का बना हुआ सादा चौकोर कक्ष है, जिसमें ढेर सारे शिला लेख, ज्‍यामिति आकृतियां और अरबी पैटर्न में सारसेनिक शैली की लिखावटे प्रवेश तथा पूरे अंदरुनी हिस्‍से में दिखाई देती है। इसमें से कुछ नमूने इस प्रकार हैं: पहिए, झब्‍बे आदि हिन्‍दू डिज़ाइनों के अवशेष हैं।

अलाइ दरवाजा, कुवात उल्‍ल इस्‍माल मस्जिद के दक्षिण द्वार का निर्माण अला उद्ददीन खिलजी द्वारा ए एच 710 ( ए डी 1311) में कराया गया था, जैसा कि इस पर तराशे गए शिला लेख में दर्ज किया गया है। यह निर्माण और सजावट के इस्‍लामी सिद्धांतों के लागू करने वाली पहली इमारत है।

अलाइ मीनार, जो कुतुब मीनार के उत्तर में खड़ी हैं, का निर्माण अला उद्दीन खिलजी द्वारा इसे कुतुब मीनार से दुगने आकार का बनाने के इरादे से शुरू किया गया था। वह केवल पहली मंजिल पूरी करा सका, जो अब 25 मीटर की ऊंचाई की है। कुतुब के इस संकुल के अन्‍य अवशेषों में मदरसे, कब्रगाहें, मकबरें, मस्जिद और वास्‍तुकलात्‍मक सदस्‍य हैं।

यूनेस्‍को को भारत की इस सबसे ऊंची पत्‍थर की मीनार को विश्‍व विरासत घोषित किया है।