Sunday, March 31, 2019

भारत का राजचिन्ह

भारत का राजचिन्ह, भारतीय पहचान और विरासत का मूलभूत हिस्‍सा हैं। विश्‍व भर में बसे विविध पृष्‍ठभूमियों के भारतीय इन राष्‍ट्रीय प्रतीकों पर गर्व करते हैं क्‍योंकि वे प्रत्‍येक भारतीय के हृदय में गौरव और देश भक्ति की भावना का संचार करते हैं। 

अशोक चिह्न भारत का राजकीय प्रतीक है। इसको सारनाथ में मिली अशोक लाट से लिया गया है। मूल रूप इसमें चार शेर हैं जो चारों दिशाओं की ओर मुंह किए खड़े हैं। इसके नीचे एक गोल आधार है जिस पर एक हाथी के एक दौड़ता घोड़ा, एक सांड़ और एक सिंह बने हैं। ये गोलाकार आधार खिले हुए उल्टे लटके कमल के रूप में है। हर पशु के बीच में एक धर्म चक्र बना हुआ है। 


राष्‍ट्र के प्रतीक में जिसे 26 जनवरी 1950 में भारत सरकार द्वारा अपनाया गया था केवल तीन सिंह दिखाई देते हैं और चौथा छिपा हुआ है, दिखाई नहीं देता है। चक्र केंद्र में दिखाई देता है, सांड दाहिनी ओर और घोड़ा बायीं ओर और अन्‍य चक्र की बाहरी रेखा बिल्‍कुल दाहिने और बाई छोर पर। घंटी के आकार का कमल छोड़ दिया जाता है। 

प्रतीक के नीचे सत्यमेव जयते देवनागरी लिपि में अंकित है। शब्‍द सत्‍यमेव जयते शब्द मुंडकोपनिषद से लिए गए हैं, जिसका अर्थ है केवल सच्‍चाई की विजय होती है। वास्तविक सारनाथ राज चिन्ह में चार एशियाई शेरों के पीछे पीछे खड़े हुए हैं,जो शक्ति, साहस, आत्मविश्वास और गौरव का प्रतीक है। नीचे एक घोड़ा और एक बैल है, और इसके केंद्र में एक सुंदर पहिया (धर्म चक्र) है। एक हाथी (पूरब के), एक बैल (पश्चिम), घोड़े (दक्षिण), और शेर (उत्तर की) है जो बीच में पहियों से अलग होते हैं। पूरे फूल में एक कमल पर, जीवन के स्फटिक और रचनात्मक प्रेरणा का उदाहरण देते हुए। बलुआ पत्थर के एक ही खंड से खुदी हुई, पॉलिश पूंजी को कानून के पहिये (धर्म चक्र) द्वारा ताज पहनाया गया है।

1 9 50 में माधव साहनी द्वारा अपनाया गया प्रतीक में, केवल तीन शेर दृश्यमान हैं, चौथा दृश्य से छिपा हुआ है। दायीं तरफ बैल और बाईं ओर घूमने वाला घोड़ा है, और चरम दाएं और बायीं ओर धर्म चक्र की रूपरेखा है। प्रतीक का एक अभिन्न अंग बनाने से देवनागरी लिपि में अभिलेख के नीचे लिखा गया आदर्श वाक्य है: सत्यमेव जयते यह मुंडका उपनिषद से एक उद्धरण है, पवित्र हिंदू वेदों का समापन भाग का श्लोक है।

Saturday, March 30, 2019

FSSAI क्या है?

हम सभी कुछ न कुछ बाज़ार से खाने की चीजे खरीदते रहते है| आप शायद एसी चीजों पर FSSAI लिखा हुआ देखा होगा; पर क्या आपको यह सवाल उठता है कि FSSAI क्या है? 

अगर आपके दिमाग में ऐसा सवाल नहीं भी उठा तो भी आपको FSSAI के बारे में जरूर जानना चाहिए क्युकी यह कोई साधारण चीज नहीं है और कई बार इसे जुड़े हुए सवाल कई सारे पेपर्स में भी आते है। अब जब खाने-पीने की चीजों में इसका आइकॉन आता है तो अब आप यह तो समझ ही गए होंगे की यह Foods अर्थात खाध्य सामग्री से जुड़ा हुआ है।


FSSAI का लक्ष्य ग्राहकों को जहरीले तथा खतरनाक खाद्य पदार्थों से बचाना होता है। खाद्य पदार्थों के विनिर्माण से लेकर उनकी पैकेजिंग तक के लिए FSSAI ने मानक निर्धारित किया है। जिससे की ग्राहकों को वह खाद्य पदार्थ उपलब्ध हो सके जिससे की उन्हें नुकसान ना हो।

खाद्य पदार्थों की सुरक्षा को लेकर इस एजेंसी की स्थापना की गई। खाद्य सुरक्षा के अधिनियम के तहत खाद्य पदार्थ में मिलावट, तथा उत्पाद के लिए किसी ग्राहक को भ्रम में रखने पर बहुत सख्ती होती है। इसलिए अगर खाद्य से सम्बन्धित आप किसी प्रकार का बिज़नेस करते है तो उसके लिए FSSAI लाइसेंस होना ज़रुरी है।

FSSAI भारत सरकार की एजेंसी है। यह मानव के उपभोग के लिए भोजन का वितरण, उत्पादन, भंडारण, बिक्री को उपलब्ध करवाने का काम करती है। इसका काम यह सुनिश्चित करना भी होता है की नागरिकों को स्वस्थ और सुरक्षित भोजन मिल रहा है या नहीं।

FSSAI सिर्फ देश में ही खाद्य वस्तुओं की देखरेख नहीं करता बल्कि देश से जो वस्तुएँ इम्पोर्ट होती है उनकी भी देख-रेख करता है। FSSAI की स्थापना केंद्र सरकार द्वारा एक्ट 2006 के तहत 2011 में की गई थी। इसका मुख्यालय दिल्ली में स्थित है।

FSSAI खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता, भोजन में प्रयोग किया जान वाला रासायनिक, भोजन का रंग, महक, आकार आदि की जांच करता है। तथा जांच सही होने पर ही उसे विक्रेताओं के माध्यम से बाजार में बेचा जाता है। FSSAI समय-समय पर खुदरा एवं थोक खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता भी जांचता है।

Friday, March 29, 2019

गणित के जादूगर रामानुजन

महज 32 साल की उम्र में दुनिया से विदा हो गए रामानुजन, लेकिन इस कम समय में भी वह गणित में ऐसा अध्याय छोड़ गए, जिसे भुला पाना मुश्किल है। अंकों के मित्र कहे जाने वाले इस जुनूनी गणितज्ञ की क्या है कहानी? 

जुनून जब हद से गुजरता है, तो जन्म होता है रामानुजन जैसी शख्सियत का। स्कूली शिक्षा भी पूरी न कर पाने के बावजूद वे दुनिया के महानतम गणितज्ञों में शामिल हो गए, तो इसकी एक वजह थी गणित के प्रति उनका पैशन। सुपर-30 के संस्थापक और गणितज्ञ आनंद कुमार की मानें, तो रामानुजन ने गणित के ऐसे फार्मूले दिए, जिसे आज गणित के साथ-साथ टेक्नोलॉजी में भी प्रयोग किया जाता है। उनके फार्मूलों को समझना आसान नहीं है। यदि कोई पूरे स्पष्टीकरण के साथ उनके फार्मूलों को समझ ले, तो कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से उसे पीएचडी की उपाधि आसानी से मिल सकती है। 


अंकों से दोस्ती 

22 दिसंबर, 1887 को मद्रास [अब चेन्नई] के छोटे से गांव इरोड में जन्म हुआ था श्रीनिवास रामानुजन का। पिता श्रीनिवास आयंगर कपड़े की फैक्ट्री में क्लर्क थे। आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, लेकिन बच्चे की अच्छी परवरिश के लिए वे सपरिवार कुंभकोणम शहर आ गए। हाईस्कूल तक रामानुजन सभी विषयों में अच्छे थे। पर गणित उनके लिए एक स्पेशल प्रोजेक्ट की तरह था, जो धीरे-धीरे जुनून की शक्ल ले रहा था। सामान्य से दिखने वाले इस स्टूडेंट को दूसरे विषयों की क्लास बोरिंग लगती। वे जीव विज्ञान और सामाजिक विज्ञान की क्लास में भी गणित के सवाल हल करते रहते। 

छिन गई स्कॉलरशिप 

चमकती आंखों वाले छात्र रामानुजन को अटपटे सवाल पूछने की आदत थी। जैसे विश्व का पहला पुरुष कौन था? पृथ्वी और बादलों के बीच की दूरी कितनी होती है? बेसिर-पैर के लगने वाले सवाल पूछने वाले रामानुजन शरारती बिल्कुल भी नहीं थे। वह सबसे अच्छा व्यवहार करते थे, इसलिए स्कूल में काफी लोकप्रिय भी थे। दसवीं तक स्कूल में अच्छा परफॉर्म करने की वजह से उन्हें स्कॉलरशिप तो मिली, लेकिन अगले ही साल उसे वापस ले लिया गया। कारण यह था कि गणित के अलावा वे बाकी सभी विषयों की अनदेखी करने लगे थे। फेल होने के बाद स्कूल की पढ़ाई रुक गई। 

कम नहीं हुआ हौसला 

अब पढ़ाई जारी रखने का एक ही रास्ता था। वे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगे। इससे उन्हें पांच रुपये महीने में मिल जाते थे। पर गणित का जुनून मुश्किलें बढ़ा रहा था। कुछ समय बाद दोबारा बारहवीं कक्षा की प्राइवेट परीक्षा दी, लेकिन वे एक बार फिर फेल हो गए। देश भी गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा था और उनके जीवन में भी निराशा थी। ऐसे में दो चीजें हमेशा रहीं-पहला ईश्वर पर अटूट विश्वास और दूसरा गणित का जुनून। 

नौकरी की जद्दोजहद 

शादी के बाद परिवार का खर्च चलाने के लिए वे नौकरी की तलाश में जुट गए। पर बारहवीं फेल होने की वजह से उन्हें नौकरी नहीं मिली। उनका स्वास्थ्य भी गिरता जा रहा था। बीमार हालात में जब भी किसी से मिलते थे, तो उसे अपना एक रजिस्टर दिखाते। इस रजिस्टर में उनके द्वारा गणित में किए गए सारे कार्य होते थे। किसी के कहने पर रामानुजन श्री वी. रामास्वामी अय्यर से मिले। अय्यर गणित के बहुत बड़े विद्वान थे। यहां पर श्री अय्यर ने रामानुजन की प्रतिभा को पहचाना और उनके लिए 25 रुपये मासिक छात्रवृत्ति का प्रबंध भी कर दिया। मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में भी क्लर्क की नौकरी भी मिल गई। यहां काम का बोझ ज्यादा न होने के कारण उन्हें गणित के लिए भी समय मिल जाता था। 

बोलता था जुनून 

रात भर जागकर वे गणित के नए-नए सूत्र तैयार करते थे। शोधों को स्लेट पर लिखते थे। रात को स्लेट पर चॉक घिसने की आवाज के कारण परिवार के अन्य सदस्यों की नींद चौपट हो जाती, पर आधी रात को सोते से जागकर स्लेट पर गणित के सूत्र लिखने का सिलसिला रुकने के बजाय और तेज होता गया। इसी दौरान वे इंडियन मैथमेटिकल सोसायटी के गणितज्ञों संपर्क में आए और एक गणितज्ञ के रूप में उन्हें पहचान मिलने लगी। 

सौ में से सौ अंक 

ज्यादातर गणितज्ञ उनके सूत्रों से चकित तो थे, लेकिन वे उन्हें समझ नहीं पाते थे। पर तत्कालीन विश्वप्रसिद्ध गणितज्ञ जी. एच. हार्डी ने जैसे ही रामानुजन के कार्य को देखा, वे तुरंत उनकी प्रतिभा पहचान गए। यहां से रामानुजन के जीवन में एक नए युग का सूत्रपात हुआ। हार्डी ने उस समय के विभिन्न प्रतिभाशाली व्यक्तियों को 100 के पैमाने पर आंका था। अधिकांश गणितज्ञों को उन्होने 100 में 35 अंक दिए और कुछ विशिष्ट व्यक्तियों को 60 अंक दिए। लेकिन उन्होंने रामानुजन को 100 में पूरे 100 अंक दिए थे। 

उन्होंने रामानुजन को कैंब्रिज आने के लिए आमंत्रित किया। प्रोफेसर हार्डी के प्रयासों से रामानुजन को कैंब्रिज जाने के लिए आर्थिक सहायता भी मिल गई। अपने एक विशेष शोध के कारण उन्हें कैंब्रिज विश्वविद्यालय द्वारा बी.ए. की उपाधि भी मिली, लेकिन वहां की जलवायु और रहन-सहन में वे ढल नहीं पाए। उनका स्वास्थ्य और खराब हो गया। 

अंतिम सांस तक गणित 

उनकी प्रसिद्घि बढ़ने लगी थी। उन्हें रॉयल सोसायटी का फेलो नामित किया गया। ऐसे समय में जब भारत गुलामी में जी रहा था, तब एक अश्वेत व्यक्ति को रॉयल सोसायटी की सदस्यता मिलना बहुत बड़ी बात थी। और तो और, रॉयल सोसायटी के पूरे इतिहास में इनसे कम आयु का कोई सदस्य आज तक नहीं हुआ है। रॉयल सोसायटी की सदस्यता के बाद वह ट्रिनिटी कॉलेज की फेलोशिप पाने वाले पहले भारतीय भी बने। 

करना बहुत कुछ था, लेकिन स्वास्थ्य ने साथ देने से इनकार कर दिया। डॉक्टरों की सलाह पर भारत लौटे। बीमार हालात में ही उच्चस्तरीय शोध-पत्र लिखा। मौत की घड़ी की टिकटिकी तेज होती गई। और वह घड़ी भी आ गई, जब 26 अप्रैल, 1920 की सुबह हमेशा के लिए सो गए और शामिल हो गए गौस, यूलर, जैकोबी जैसे सर्वकालीन महानतम गणितज्ञों की पंक्ति में। 

महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन की 125वीं जयंती के अवसर पर भारत सरकार द्वारा वर्ष 2012 को राष्ट्रीय गणित वर्ष और हर साल 22 दिसंबर को राष्ट्रीय गणित दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की गई थी।

Wednesday, March 27, 2019

पंचायती राज में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी


पंचायती राज में महिलाओं का दबदबा बढ़ता ही जा रहा है। आज देश में 2.5 लाख पंचायतों में लगभग 32 लाख प्रतिनिधि चुनकर आ रहे हैं। इनमें से 13 से 14 लाख महिलाएं चुन कर आयी हैं। यह आंकड़ा यह बताने के लिए प्रयाप्त है कि किस तरह से महिलाएं राजनीतिक कार्यों में रूचि ले रही हैं। महिलाओं की गांव के कामों में बढ़ती भागीदारी न केवल महिलाओं के खुद के स्वाभिमान के लिए सकारात्मक संकेतक है बल्कि इससे हिन्दुस्तान के गांवों में फैली सामाजिक असमानता भी दूर होगी। खासतौर से लिंग के आधार पर किए जाने वाली गैर-बराबरी अब संभव नहीं रह गयी है। महिलाओं का बढ़ता कद उन्हें घर व बाहर की दुनिया में स्वतंत्र होकर जीने में सहयोग प्रदान कर रहा है। दहेज के नाम पर महिलाओं का हो रहा उत्पीड़न हो अथवा घरेलू हिंसा-इन तमाम सामाजिक कुरीतियों से आज की महिला लड़ने में सशक्त हो चुकी है। 

सन् 1959 में बलवन्त राय मेहता समिति की सिफारिशों के आधार पर त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू की गई। तब भी यह माना गया कि देश का समग्र विकास महिलाओं को अनदेखा करके नहीं किया जा सकता। इसलिए पंचायती राज व्यवस्था को सुदृढ़ करने तथा पंचायतों में महिलाओं की एक तिहाई भागीदारी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से 1992 में 73 वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम पारित किया गया। इस संशोधन अधिनियम के द्वारा ग्रामसभा का गठन होना अनिवार्य हो गया और ग्राम पंचायतों, और सदस्यों की कुल संख्या की कम से कम एक तिहाई संख्या महिलाओं के लिए आरक्षित कर दी गई। वर्तमान में मध्यप्रदेश, बिहार सहित कई राज्यों ने तो महिलाओं का प्रतिनिधित्व 50 फीसदी तक आरक्षित कर दिया है।

Tuesday, March 26, 2019

लेट नाइट शो होस्ट करेंगी भारतीय मूल की लिली सिंह

लिली सिंह आम तौर पर उसका यूट्यूब खाता का उपयोगकर्ता नाम सुपरवुमन से जाना जाता है, भारतीय मूल के कनाडाई यूट्यूब शख़्सियत, प्रेरक वक्ता, अभिनेत्री और गायिका है। उसने अपना यूट्यूब खाता को 2010 में खोला और तब से उसने 30 करोड़ व्यूज़ मिली और उसका खाता पर 30 लाख सबस्क्रिपशन हैं। वह रोज़मर्रा की ज़िन्दगी और उसके माँ-बाप पर चुटकुले बनाने के लिए मशहूर है। 


यूट्यूब स्टार और कॉमेडियन लिली सिंह एनबीएस चैनल में एक लेट नाइट (देर रात) के शो को होस्ट करेंगी। ऐसा करने वाली वह भारतीय मूल की पहली महिला होंगी। 30 साल की लिली का शो अ लिटिल लेट विद लिली सिंह इस साल सितंबर से टेलिकास्ट होगा। यूट्यूब पर भी वे इसी नाम से टॉक शो होस्ट करती हैं। उनके शो में द रॉक के नाम से मशहूर हॉलीवुड स्टार ड्वेन जॉनसन, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की पत्नी मिशेल और प्रियंका चोपड़ा भी हिस्सा ले चुकी हैं। खास बात यह है कि लिली ने 9 साल पहले यह शो शुरू किया था। कुछ साल में ही यूट्यूब पर उनके शो को फॉलो करने वालों की संख्या करोड़ो में हो गई। अभी यूट्यूब चैनल में उनके करीब 1.5 करोड़ फॉलोअर्स हैं। उनका यह शो एनबीसी के लोकप्रिय कारसन डाली के शो की जगह लेगा। 

लिली के माता-पिता भारत के पंजाब से हैं। उनका जन्म कनाडा के ओंटारियो में हुआ। टोरंटो की यॉर्क यूनिवर्सिटी से 2010 में ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद उन्होंने एक्ट्रेस और कॉमेडियन के तौर पर अपना यूट्यूब चैनल शुरू किया। इसमें वे दक्षिण एशिया के बारे में फैली भ्रांतियों को दूर करने के लिए सटायर (व्यंग्य) पेश करती हैं।एक महीने पहले ही ट्वीट में लिली ने दक्षिण एशियाई मूल का होने पर गर्व जताते हुए कहा था- मैं महिला, अश्वेत और बाइसेक्शुअल हूं। 

खास बात यह है कि अमेरिका में अभी चार बड़े मीडिया ग्रुप्स के किसी भी चैनल में महिला शो प्रेजेंटर नहीं हैं। इसी शुक्रवार लोकप्रिय शो द टुनाइट शो विद जिमी फैलन में उन्होंने अपने लेट नाइट शो का ऐलान किया। महिला सशक्तीकरण पर काम करने के लिए संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ ने लिली को गुडविल एम्बेसडर बनाया है। इसके अलावा महिलाओं में नफरत कम करने के लिए उन्होंने गर्ल लव नाम का एक अभियान भी शुरू किया है।

एशिया का सबसे बडा गुलाब के फूलों का बाग : रोज गार्डन चंडीगढ

अक्सर ऊंची-ऊंची इमारतों से घिरे हुए शहरों में रहते हुए इनसान अपनी खूबियों से दूर होता जा रहा है। इनके करीब आने के लिए उसे हरे भरे बाग-बगीचों में वक्त बिताने की जरूरत है। हरी-भरी जगहों पर वक्तव बिताने से इनसान में सकारात्मिकता आती है, साथ ही खुद पर उसका नियंत्रण भी बढ़ता है।

एशिया का सबसे बडा गार्डन भारत के प्रमुख शहर चंडीगढ के सेक्टर 16 में स्थित हैज जिसका नाम है रोज गार्डन चंडीगढ। चंडीगढ शहर में स्थित यह खुबसूरत रोज गार्डन वहा के लोगो के साथ साथ पर्यटको के लिए भी वरदान जैसा है। गार्डनो में घुमना मौज मस्ती या फिर मनोरंजन इसका यही मकसद नही है। बाग बगीचो और गार्डनो में घुमने के बहुत से फायदे होते है।


1967 में बना यह रोज गार्डन लगभग 30 एकड भू भाग में बनाया गया है। इस रोज गार्डन को जाकिर हुसैन रोज गार्डन के नाम से जाना जाता है। इस गार्डन 17000 पोधो से भरा हुआ है; जिसमे 1600 से भी अधिक किस्मो के गुलाब के फूलो की प्रजातियां देखने को मिलती है। इतनी भारी संख्या में गुलाब कि किस्मो के कारण यह गुलाब के फूलो के बगीचो की श्रेणी में एशिया का सबसे बडा रोज गार्डन है।

यहा का सौंदर्य पर्यटको को आश्चर्यचकित कर देता है। फरवरी माह में यहा कई किस्मो के गुलाब के फूल खिले रहते है। इस समय यहा का सौंदर्य पूरे शबाब पर रहता है। उस समय यहा रोज फेस्टीवल भी बडी धूम धाम से मनाया जाता है।

इस दौरान इस गार्डन में पर्यटको के साथ साथ स्थानीय लोगो की भी काफी भीड होती है। यहा हर रोज 5000 के करीब लोग गुलाब के फूलो की सुंदरता को निहारने के लिए आते है। इस दौरान पर्यटक यहा खूब फोटोग्राफी भी करते है।

इस बाग के मध्य में लगभग 70 फुट का एक फव्वारा भी है। जो इस रोज गार्डन की सुंदरता में चार चांद लगा देता है। यह गार्डन अप्रैल से सितंबर के महिनो में सुबह में 5 बजे से शाम 9 बजे तक खुला रहता है। शेष महिनो में यह एक घंटा देरी से खोला जाता है।

Friday, March 15, 2019

दुनिया की एक मात्र तैरती झील : लोकतक झील

लोकतक झील उत्तर-पूर्व भारत की सबसे बड़ी साफ़ पानी की झील है। इसे दुनिया के एकमात्र तैरती हुई झील भी कहा जाता है क्योंकि यहां छोटे-छोटे भूखंड या द्वीप पानी में तैरते हैं। इन द्वीप को फुमदी के नाम से जाना जाता है। ये फुमदी मिट्टी, पेड़-पौधों और जैविक पदार्थों से मिलकर बनते है और धरती की तरह ही कठोर होते हैं। इन्होंने झील के काफी बड़े भाग को कवर किया हुआ है।

फुमदियों से बनी इस झील को देखना अपने आप में एक एक अनोखा अहसास है जो की पुरे विश्व में केवल यहीं अनुभव किया जा सकता है। इतने से भी मन न भरे, तो फुमदी पर ही बने टूरिस्ट कॉटेज में रह भी सकते हैं।

फुमदी का सबसे बड़ा भाग झील के दक्षिण पूर्व भाग में स्थित है, जो 40 स्क्वायर किलोमीटर तक फैला हुआ है। इस सबसे बड़े भाग में दुनिया के सबसे लंबा और एकमात्र तैरता हुआ पार्क भी है; जिसका नाम किबुल लामिआयो नेशनल पार्क है। इस पार्क में दुर्लभ प्रजाति के हिरण भी पाए जाते हैं। इन्हें मणिपुरी भाषा में संगई कहा जाता है।
 

लोकतक झील का मणिपुर के आर्थिक विकास में अहम योगदान है। इस झील के पानी का उपयोग जलविद्युत परियोजनाओं, सिंचाई और पीने के पानी के लिए किया जाता है। इसके अलावा इस झील के आसपास रहने वाले मछुआरों की जीविका भी यही है। स्थानीय भाषा में इन मछुआरों को ''फुमशोंग्स'' कहा जाता है। फुमदी का उपयोग स्थानीय लोग मछली पकड़ने, अपनी झोपड़ी बनाने और अन्य उपयोग के लिए करते हैं। इन मछुआरों की मछली पालन की कला भी अनोखी है। ये गांव वाले मछली पालने के लिए फुमदी का नकली गोल घेरा बनाते हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि करीबन 1 लाख लोगों से ज्यादा इस झील पर आश्रित हैं।

लोकतक झील जैव विविधता से भी परिपूर्ण है। इसमें पानी के पौधों की तकरीबन 233 प्रजातियां, पक्षियों की 100 से अधिक प्रजातियां रहती हैं। इसके अलावा जानवरों के 425 प्रजातियां भी हैं, जिनमें भारतीय पाइथन, सांभर और दुर्लभ सूची में दर्ज भौंकने वाले हिरण भी हैं।

Tuesday, March 12, 2019

WHO की डिप्टी जनरल बनने वाली पहली भारतीय सौम्या स्वामीनाथन

डॉ. सौम्या स्वामीनाथन प्रसिद्ध चिकित्सा शोधकर्ता और स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञ हैं। वो पहली भारतीय हैं जिनको विश्व स्वास्थ्य संगठन के डिप्टी जनरल के तौर पर नियुक्त किया गया है। सौम्या जो एचआईवी और तपेदिक की प्रमुख शोधकर्ता हैं।

वो भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के महानिदेशक के रूप में कार्यरत थीं। सौम्या स्वास्थ्य मंत्रालय में स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग की सचिव भी हैं। उनकी नियुक्ति की घोषणा 3 अक्टूबर को डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेडरोस अदोनोम गिबरेयसस ने की थी। इस नवीनतम नियुक्ति के साथ सौम्या को डब्ल्यूएचओ की दूसरी सबसे बड़ी स्थिति रखने वाला पहला भारतीय बना देता है।

सौम्या, एमएस स्वामीनाथन की बेटी हैं। एमएस स्वामीनाथन को भारत की हरित क्रांति का जनक माना जाता है। सौम्या की मां मीना स्वामीनाथन एक प्रसिद्ध शिक्षाविद हैं। 

डॉ. सौम्या स्वामीनाथन प्रसिद्ध चिकित्सा शोधकर्ता और स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञ हैं। वो पहली भारतीय हैं जिनको विश्व स्वास्थ्य संगठन के डिप्टी जनरल के तौर पर नियुक्त किया गया है। सौम्या जो एचआईवी और तपेदिक की प्रमुख शोधकर्ता हैं। वो भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के महानिदेशक के रूप में कार्यरत थीं। सौम्या स्वास्थ्य मंत्रालय में स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग की सचिव भी हैं। उनकी नियुक्ति की घोषणा 3 अक्टूबर को डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेडरोस अदोनोम गिबरेयसस ने की थी। इस नवीनतम नियुक्ति के साथ सौम्या को डब्ल्यूएचओ की दूसरी सबसे बड़ी स्थिति रखने वाला पहला भारतीय बना देता है।

फर्स्टपोस्ट के अनुसार, डब्ल्यूएचओ ने अपनी घोषणा में कहा, 'सौम्या तपेदिक और एचआईवी पर एक विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त शोधकर्ता हैं। उन्हें क्लीनिकल केयर और शोध में 30 वर्षों का है। वो अपने करियर में प्रभावी कार्यक्रमों में अनुसंधान का अनुवाद करने का काम कर चुकी है।' पुणे में सशस्त्र सेना मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस पूरा करने के बाद, सौम्या ने अपने एमडी को ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज से पूरा किया। पेशे के तौर पर वो एक बाल रोग विशेषज्ञ हैं। उन्होंने 250 से अधिक प्रकाशनों और किताबों के अध्याय प्रकाशित किए हैं।

सौम्या ने डब्लूएचओ विशेष कार्यक्रम में 2009 और 2011 के बीच यूनिसेफ, यूएनडीपी, विश्व बैंक के समन्वयक के रूप में कार्य किया। अब तक उन्हें दवा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए नौ पुरस्कार दिए जा चुके हैं। सौम्या, एमएस स्वामीनाथन की बेटी हैं। एमएस स्वामीनाथन को भारत की हरित क्रांति का जनक माना जाता है। सौम्या की मां मीना स्वामीनाथन एक प्रसिद्ध शिक्षाविद हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अन्य सदस्यों में स्वास्थ्य के पूर्व मंत्री, दुनिया के अग्रणी चिकित्सकों, शोधकर्ताओं और वैज्ञानिक शामिल हैं। लाइवमिंट के मुताबिक, डब्ल्यूएचओ के अन्य सदस्यों की नियुक्ति के बाद डॉ टेडरोस ने कहा, टीम डब्लूएचओ 14 देशों का प्रतिनिधित्व करती है और इसमें 60 प्रतिशत से अधिक महिलाएं हैं। ये हमारी इस गहरी धारणा को दर्शाती है कि हमें दुनिया के लिए अपने मिशन को पूरा करने के लिए शीर्ष प्रतिभा चाहिए होती है। इसमें लिंग समानता और भौगोलिक दृष्टि के विविध दृष्टिकोणों की जरूरत होती है।

सौम्या, घाना से डॉ. अनारफी असमौआ बाह की जगह लेंगी, जिन्होंने अब डब्ल्यूएचओ को डायरेक्टर-जनरल के वरिष्ठ नीति सलाहकार के रूप में ज्वॉइन किया है। उन्होंने संचरितअमेरिका में लाखों की नौकरी छोड़कर चेन्नई में करोड़ों का स्टार्टअप खोलने वाली अश्विनी अशोकन रोग कार्यक्रम के सहायक निदेशक-जनरल और एचआईवी-एड्स, टीबी और मलेरिया कार्यक्रम के रूप में काम किया था।

Saturday, March 9, 2019

10 Year Challenge : Game या खतरा? क्या है इसके पीछे Facebook क्या Plan?

10yearchallenge नाम के हैश टैग से प्रशिद्ध हुआ यह Trend असल मे क्या है इसके बारे में Detail में बात करते है। इस Challenge में आपको आपकी 10 साल पुरानी Photo को इस साल की Latest Photo के साथ Upload करना होता है। यह दिखाने के लिए की 10 साल में आपके चेहरे पे कितना Change आया है।

10 Year Challenge बिल्कुल एक Game की तरह ही है। Social Media पे लोग इस Challenge Accept कर अपनी 10 साल पुरानी और नई Photos Upload कर रहे है। Facebook, Twitter, Instagram इन सभी Social Media पे Millions से भी ज्यादा Photos Upload हो चुकी है। 
 

Social Media पे लोग इस गेम को काफी Enjoy कर रहे है। पर इसके पीछे Facebook या अन्य Social Media का मकशद क्या है। इसके बारे में लोग नही जानते है। क्यों Social Media पे यह Trend अचानक से वायरल हुआ? और क्यों यह Trend वायरल हुआ? इसके बारे में भी आपको जानना आवश्यक है। चलिए यह जानते है, की यह Trend क्यों Social Media पे Viral हुआ।

एक अहवाल के मुताबिक 10 Year Challenge को Artificial Intelligence System के लिए आपके Data को उपयोग में लेने की बात कही गई है। Face Recognize System को मजबूत बनाने के लिए, इस हैश टैग का उपयोग किया जा सकता है।

तो इस बात को लेके कई लोग अपने तर्क सामने रख रहे है, की Facebook के पास पहले से ही यह Photos थी, तो Challenge के बिना भी वह Data ले सकते थे। इसके जवाब में अहवाल में कहा गया है कि, 10 Year पहले Upload की गई Photo उसी समय की है, की उससे पहले की, यह बात Facebook नही जान सकता था। किन्तु लोग सामने से 10 Year पहले की Photos को सामने से Upload कर रहे है। इस से 10 Year में व्यक्ति के चहरे पे कितना परिवर्तन हुआ, यह जान के Artificial Intelligence को मजबूत कर सकते है।

हालांकि यह जानकारी पुख्ता नही है। Facebook, Twitter, Instagram पे यह Trend किस मकसद से Viral हुआ यह तो हमे Social Media ही बता सकते है। पर ऊपर की गई बातों को भी जाया नही कर सकते है। यह भी सच हो सकता है, की Artificial Intelligence को मजबूत करने के लिए भी यह Trend चलाया जा रहा हो। कुछ भी हो लेकिन यह 10 Year Challenge को लोग बहुत ही Enjoy कर रहे है।