Monday, May 20, 2019

शून्य की खोज भारत में कब और कैसे हुई?

शून्य, कुछ भी नहीं या कुछ नहीं होने की अवधारणा का प्रतीक है| आजकल शून्य का प्रयोग एक सांख्यिकीय प्रतीक और एक अवधारणा दोनों के रूप में जटिल समीकरणों को सुलझाने में तथा गणना करने में किया जाता है| इसके साथ ही शून्य कंप्यूटर का मूल आधार भी है| यह आलेख भारत में शून्य के आविष्कार से संबंधित है अर्थात इस आलेख में इस बात का उल्लेख किया गया है कि भारत में शून्य का अविष्कार कैसे और कब हुआ था| 


यह कहना गलत नहीं होगा कि गणित में शून्य की अवधारणा का आविष्कार क्रांतिकारी था| शून्य कुछ भी नहीं या कुछ नहीं होने की अवधारणा का प्रतीक है| यह एक आम व्यक्ति को गणित में सक्षम होने की क्षमता पैदा करता है| इससे पहले, गणितज्ञों को सरल अंकगणितीय गणना करने के लिए संघर्ष करना पड़ता था| आजकल शून्य का प्रयोग एक सांख्यिकीय प्रतीक और एक अवधारणा दोनों के रूप में जटिल समीकरणों को सुलझाने में तथा गणना करने में किया जाता है| इसके साथ ही शून्य कंप्यूटर का मूल आधार भी है| 

भारत में शून्य पूरी तरह से पांचवीं शताब्दी के दौरान विकसित हुआ था| वास्तव में भारतीय उपमहाद्वीप में गणित में शून्य का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है| तीसरी या चौथी शताब्दी की बख्शाली पाण्डुलिपि में पहली बार शून्य दिखाई दिया था| ऐसा कहा जाता है कि 1881 में एक किसान ने पेशावर, जो की अब पाकिस्तान में है, के पास बख्शाली गांव में इस दस्तावेज से जुड़े पाठ को खोद कर निकाला था|
यह काफी जटिल दस्तावेज है क्योंकि यह सिर्फ दस्तावेज़ का एक टुकड़ा नहीं है, बल्कि इसमें बहुत से टुकड़े हैं जो कई शताब्दी पहले लिखे गए थे| रेडियोकार्बन डेटिंग तकनीक की मदद से, जोकि आयु निर्धारित करने के लिए कार्बनिक पदार्थों में कार्बन आइसोटोप की सामग्री को मापने की एक विधि है, से यह पता चलता है कि बख्शाली पांडुलिपि में कई ग्रंथ हैं| सबसे पुराना हिस्सा 224-383 ईस्वी का है, उससे नया हिस्सा 680-779 ईस्वी का है और सबसे नया हिस्सा 885- 993 ईस्वी का है| इस पांडुलिपि में सनौबर के पेड़ के 70 पत्ते और बिंदु के रूप में सैकड़ों शून्य को दिखाया गया है| 

उस समय ये डॉट्स संख्यात्मक रूप में शून्य नहीं थे, बल्कि 101, 1100 जैसे बड़े संख्याओं के निर्माण के लिए इसे स्थान निर्धारक अंक के रूप में इस्तेमाल किया गया था| पहले इन दस्तावेजों की सहायता से व्यापारियों को गणना करने में मदद मिलती थी| कुछ और प्राचीन संस्कृतियां हैं जोकि शून्य को स्थान निर्धारक अंक के रूप में इस्तेमाल करती थी जैसे कि बेबीलोन के लोग शून्य को दो पत्ते के रूप में इस्तेमाल करते थे, माया संस्कृति के लोगों ने इसे शैल की संख्या के रूप में इस्तेमाल करते थे| इसलिए, हम कह सकते हैं कि प्राचीन सभ्यताओं को “कुछ भी नहीं” की अवधारणा पता थी लेकिन उनके पास इसे दर्शाने के लिए कोई प्रतीक नहीं था| ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के अनुसार, भारत में ग्वालियर में नौवीं शताब्दी के एक मंदिर के शिलालेख में वर्णित शून्य को सबसे पुराने रिकॉर्ड के रूप में माना जाता है| 

शून्य भारत में संख्या पद्धति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है| यहां तक कि पहले गणितीय समीकरणों को कविता के रूप में गाया जाता था| आकाश और अंतरिक्ष जैसे शब्द “कुछ भी नहीं” अर्थात शून्य का प्रतिनिधित्व करते हैं| एक भारतीय विद्वान पिंगला ने द्विआधारी संख्या का इस्तेमाल किया और वह पहले थे जिन्होंने जीरो के लिए संस्कृत शब्द 'शून्य' का इस्तेमाल किया था| 

628 ईस्वी में ब्रह्मगुप्त नामक विद्वान और गणितज्ञ ने पहली बार शून्य और उसके सिद्धांतों को परिभाषित किया और इसके लिए एक प्रतीक विकसित किया जो कि संख्याओं के नीचे दिए गए एक डॉट के रूप में था| उन्होंने गणितीय संक्रियाओं अर्थात जोड़ और घटाव के लिए शून्य के प्रयोग से संबंधित नियम भी लिखे हैं| इसके बाद महान गणितज्ञ और खगोलविद आर्यभट्ट ने दशमलव प्रणाली में शून्य का इस्तेमाल किया था|

Thursday, May 16, 2019

थ्री-डी टेलीविज़न

आप अब तक केवल 3-डी फिल्मों और वीडियो गेम्स के बारे में ही सुना होगा लेकिन शायद आप नहीं जानते कि अब टीवी मोबाइल फोन और अखबार भी 3-डी आने लगे हैं जो विज्ञान की दुनिया में सचमुच एक करिश्मा है। 

पहले बात करते हैं 3-डी फिल्मों की। आमतौर पर फिल्में द्विआयामी या टू डाइमेंशनल होती है जिसमें चित्रों की केवल लंबाई और चौड़ाई ही दिखती है जबकि त्रिआयामी यानी 3-डी फिल्मों की लंबाई चौड़ाई के अलावा दृश्यों की गहराई भी दिखाई देती है। क्या आप जानते हैं कि विश्व की सबसे पहली 3-डी फिल्म कौन सी थी? अंग्रेजी भाषा में बनी इस फिल्म का नाम 'बी' वाना डेविल' था जो कि सन् 1952 में बनी थी। शुरूआती दौर में ये फिल्में दो कैमरों के प्रयोग से बनाई जाती थीं और इन्हें देखने के लिए एक विशेष प्रकार के चश्मे को लगाना पड़ता था। 


आजकल 3-डी फिल्मों की तकनीक में थोड़ा बदलाव आ गया है। अब ऐसी फिल्मों के निर्माण के लिए ऐनाग्लिफिक 3-डी तथा पोलेराइज्ड 3-डी नामक दो प्रणालियों का इस्तेमाल होता है। ऐग्नाग्लिफिक 3-डी प्रणाली के द्वारा केवल ब्लेक एंड व्हाइट फिल्में ही बनाई जा सकती हैं। इसमें दो प्रोजेक्टरों का इस्तेमाल होता है, एक पर लाल तथा दूसरे पर नीला फिल्टर लगा होता है। जब फिल्म देखना होता है तो बायी आंख पर लाल तथा दायी आंख पर नीले फिल्टर वाला चश्मा लगाना पड़ता है जिससे आंखों द्वारा देखे गए लाल और नीले प्रतिबिंब हमारे मस्तिष्क में श्याम और श्वेत त्रिआयामी प्रतिबिंब बनाते हैं। जबकि दूसरी प्रणाली पोलेराइज्ड 3-डी में प्रोजेक्टर तथा दर्शक द्वारा ध्रुवित यानी पोलेराइज्ड फिल्डर प्रयोग किए जाते हैं। जब प्रकाश फिल्टर से गुजरता है तो ध्रुवण के फलस्वरूप दो प्रतिबिंब अलग अलग हो जाते हैं। इन फिल्मों का रंग धूसर होता है। इसके माध्यम से सभी रंगों का त्रिआयामी फिल्में बनाई जाती हैं। हां, इस फिल्मों को दिखाने के लिए एल्यूमिनाइज्ड सिल्वर स्क्रीन नामक एक विशेष परदे का इस्तेमाल करना होता है। फिलहाल सिनेमाघरों तक सीमित थ्री-डी तकनीक टेलीविजन में नजर आएगी। 

सोनी पैनासॉनिक मित्सुबिशी जैसी नामी कंपनियों ने थ्री-डी टीवी बाजार में उतारने की तैयारी कर ली है। इन कंपनियों का दावा है कि मौजूदा हाई डेफिनिशन प्लाज्मा तकनीक से लैस टेलीविजन के 3-डी स्वरूप में सामने आने से टीवी क्रांति में नए युग की शुरूआत होगी। इसका लुत्फ उठाने के लिए आपको पुराना सेट हटाना पड़ेगा। इसके साथ सेट टॉप बॉक्स और थ्री-डी चश्मे की भी जरूरत पड़ेगी। इसमें दिखाने वाले कार्यक्रम कैमरे में एक साथ दो लैसों के जरिए शूट किए जाएंगे। इससे बाई और दाई आंख में अलग-अलग तस्वीरें नजर आएंगी। हमारा दिमाग दोनों तस्वीरों को जोड़कर त्रिविमीय तस्वीरें तैयार करेगा। 

दक्षिण कोरिया की कंपनी एलजी ने दुनिया का पहला 3-डी एलईडी टीवी बाजार में पेश किया है। एलएक्स 9500 नाम के इस 55 इंच के टीवी में 480 हट्र्ज का टू मोशन प्रोसेसर, वायरलेस एवी लिंक और एचडीएमआई 1.4 सपोर्ट भी है। अगर इसमें वीडियो कैमरा लगाया जाए तो इसमें वीडियो कॉन्फ्रेसिंग भी की जा सकती है। यह डीआईवी एक्स एमपी 3 एमपीओ और जेपीईजी फाइलों को सपोर्ट करता है। इसमें क्लियर वाइस टेक्नोलॉजी वाले वूफर्स लगे हैं। बेल्जियम में फ्रेंच भाषा में छपने वाले एक अखबार ने योरोप का पहला 3-डी त्रिआयामी अंक प्रकाशित कर प्रिंट मीडिया में एक क्रांतिकारी कदम बढ़ाया है। 

अखबार ला डार्नियर (डीएच) ने अपने इस विशेषांक के सभी फोटो और विज्ञान को 3-डी प्रारूप में प्रकाशित किया है। अखबार के इस विशेषांक को मोटे कागज से बने हुए चश्मे की मदद से देखा जा सकता है। ला डार्नियर के संपादक कहना है कि इस 3-डी अंक की लागत को देखते हुए इस तरह के और अंक छापे जाने की कोई योजना नहीं है। फ्रांस के विश्लेषकों ने अखबार के इस साहसिक कदम को सलाम किया है, लेकिन कहा है कि यह अभी यह पूरी तरह दोष रहित होने से काफी दूर है। सभी प्रतियों के साथ एक 3-डी चश्मा भी बांटा गया। बिना चश्मे के सभी विज्ञापन धुंधले दिख रहे थे। एक दिन पहले इसकी सूचना भी दी गई थी। 

चीन के ग्वांगजू इंस्टीटयूट ऑफ साइंस एंड टेक्नालॉजी के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा 3-डी ई-बुक तैयार किया है, जिसमें कहानी के कथानकों को आप जीवंत रूप में देख सकते हैं। इसके लिए आपको खासतौर पर बने कम्प्यूटर स्क्रीन वाले चश्मे पहनने पडेंगे। इससे न सिर्फ किताब का कंटेंट थ्री-डी यानी त्रिविमीय रूप में दिखेगा, बल्कि उसमें शामिल चित्र और कथानक भी बिल्कुल जीवंत स्वरूप में नजर आएंगे। ग्वांगजू इंस्टीटयूट के वैज्ञानिकों ने फिलहाल इस तकनीक के जरिए स्थानीय कथानकों के आधार पर दो ई-बुक्स बनाई है। इन किताबों में दहाड़ने वाले ड्रेगन, उड़ने वाले पात्र से नदी पहाड़ आदि शामिल है। वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्होंने पृथ्वी का अब तक का सबसे सूक्ष्म त्रिआयामी 3-डी मानचित्र तैयार किया है। यह मानचित्र इतना सूक्ष्म है कि नमक के एक दाने के आकार में ऐसे 1000 मानचित्र समा सकते हैं। 

कम्प्यूटर की दिग्गज कम्पनी आईवीएम के एक दल ने अनोखी तकनीक की मदद से यह मानचित्र तैयार किया है, जो पेंसिल की नोंक से एक लाख गुना छोटा है और इसका आकार 15 नैनोमीटर जितना है इसके बनाने में जहां कम जटिलताओं का सामना करना पड़ा है, वहीं इसकी लागत भी काफी कम आई है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस नई तकनीक के ईजाद होने से इलेक्ट्रानिक भविष्य की चिप तकनीक, औषधि विज्ञान, जीवन विज्ञान और ऑप्टो इलेक्ट्रानिक्स जैसे क्षेत्रों में नैनो उत्पाद के विकास को लेकर नया द्वार खुलेगा। इस 3-डी नक्शे का आकार 2211 माइक्रोमीटर हैं जिसे पॉलिमर पर लिखा गया है। नमक के एक दाने में ऐसे 1000 नक्शे समा सकते हैं।

ग्रीनहाउस प्रभाव क्या है?


ग्रीनहाउस प्रभाव एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी ग्रह या उपग्रह के वातावरण में उपस्तिथि कुछ गैसें वातावरण के तापमान को अपेक्षाकृत अधिक बनाने में सहयता करतीं हैं| इन ग्रीनहाउस गैसों में कार्बन डाई आक्साइड, जल-वाष्प, मिथेन आदि गैस शामिल हैं| यदि ग्रीनहाउस प्रभाव नहीं होता तो शायद ही धरती पर जीवन होता|  अगर ग्रीनहाउस प्रभाव नहीं होता तो पृथ्वी का औसत तापमान -18° सेल्सियस होता न कि वर्तमान 15° सेल्सियस होता| धरती के वातावरण के तापमान को प्रभावित करने वाले बहुत से कारक हैं जिसमें से ग्रीनहाउस प्रभाव एक कारक है|

Wednesday, May 15, 2019

केन्द्रीय गृह मंत्रालय लिया ने भारतीय मूल के लोगों की “ब्लैक लिस्ट” को समाप्त करने का फैसला

केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने हाल ही में भारतीय मूल के लोगों के लिए “ब्लैक लिस्ट” को समाप्त करने का निर्णय लिया है। यह सूची भारतीय मिशन (विभिन्न देशों में मौजूद भारतीय दूतावास) के पास होती है। 


इस सूची में उन भारतीय मूल के लोगों के नाम शामिल होता हैं जो भारत में उत्पीड़न किये जाने का हवाला दे कर दूसरे देश में शरण मांगते हैं। इस प्रकार की शरण मांगने वाले भारतीय मूल के लोगों में सिख समुदाय के लोगों की अधिकता हैं।

इस सूची में शामिल लोगों को भारतीय मिशन (भारतीय दूतावास) द्वारा वीज़ा नहीं दिया जाता है। 

भारतीय मूल के वे लोग (तथा उनके परिवार के सदस्य) जिन्होंने किसी दूसरे देश में शरण ली है और उनका नाम “ब्लैक लिस्ट” में नहीं है, उन्हें निवास के देश के नागरिक की तरह ही भारत का वीज़ा मिलेगा। यदि उनका पिछले दो वर्षों का वीज़ा सामान्य है तो वे ओवरसीज सिटीजनशिप ऑफ़ इंडिया (OCI) कार्ड प्राप्त कर सकते हैं।
ओवरसीज सिटीजनशिप ऑफ़ इंडिया (OCI) कार्ड एक प्रवासी स्टेटस है, इससे भारतीय मूल के विदेशी नागरिक भारत में अनिश्चित काल तक रह सकता है तथा यहाँ पर कार्य कर सकता है।