Friday, May 31, 2019

देश की पहली महिला 'वित्तमंत्री' बनीं निर्मला सीतारमण

निर्मला सीतारमण को पिछली सरकार में रक्षा मंत्री और उससे पहले कॉरपोरेट कार्य का मंत्री बनाया गया था| वह साल 2008 में भाजपा का हिस्सा बनीं और तभी से पार्टी से जुड़ी हुई हैं|

निर्मला सीतारमण देश की पहली महिला रक्षा मंत्री बन गई हैं| निर्मला सीतारमण उन महिला नेताओं में से एक हैं जो बेहद कम समय में राजनीति के शिखर तक पहुंची हैं| देश की पहली रक्षा मंत्री रहीं निर्मला सीतारमण ने एक बार फिर इतिहास रच दिया है|

हालांकि उनसे पहले तात्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पीएम पद के साथ-साथ वित्त मंत्री का कार्यभार 16 जुलाई 1969 से 27 जून 1970 तक संभाला था, लेकिन अभी तक किसी भी महिला को वित्तमंत्री के रूप में स्वंत्रत रूप से पद नहीं मिला था| इस कारण से निर्मला सीतारमण पहली महिला वित्तमंत्री बनी गई हैं|

निर्मला सीतारमण: पिछली सरकार में

निर्मला सीतारमण को पिछली सरकार में रक्षा मंत्री और उससे पहले कॉरपोरेट कार्य का मंत्री बनाया गया था| वह साल 2008 में भाजपा का हिस्सा बनीं और तभी से पार्टी से जुड़ी हुई हैं|

सुखोई में उड़ान भरने वाली पहली महिला रक्षा मंत्री बनी थी

निर्मला सीतारमण ने 17 जनवरी 2018 को सुखोई-30 लड़ाकू विमान में उड़ान भरी थी| निर्मला सीतारमण पहली महिला रक्षा मंत्री रहीं, जिन्होंने लड़ाकू विमान में उड़ान भरी थी|

निर्मला सीतारमण के सामने बड़ी चुनौतियां:

निर्मला सीतारमण के सामने बड़ी चुनौतियों में भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था को मजबूती देना उनका सबसे महत्‍वपूर्ण काम होगा| निर्मला सीतारमण को अगले महीने बजट पेश करना है| उन्‍हें इससे पहले बढ़ती महंगाई, बढ़ती तेल की कीमतें, रुपये की कमजोरी जैसे मुद्दों का भी सामना करना है|

Thursday, May 30, 2019

भूदान यज्ञ के प्रणेता : भूदान आंदोलन


विनोबा भावे का 'भूदान आंदोलन' का विचार 1951 में जन्मा। जब वह आन्ध्र प्रदेश के गाँवों में भ्रमण कर रहे थे, भूमिहीन अस्पृश्य लोगों या हरिजनों के एक समूह के लिए ज़मीन मुहैया कराने की अपील के जवाब में एक ज़मींदार ने उन्हें एक एकड़ ज़मीन देने का प्रस्ताव किया। इसके बाद वह गाँव-गाँव घूमकर भूमिहीन लोगों के लिए भूमि का दान करने की अपील करने लगे और उन्होंने इस दान को गांधीजी के अहिंसा के सिद्धान्त से संबंधित कार्य बताया।


भावे के अनुसार, यह भूमि सुधार कार्यक्रम हृदय परिवर्तन के तहत होना चाहिए न कि इस ज़मीन के बँटवारे से बड़े स्तर पर होने वाली कृषि के तार्किक कार्यक्रमों में अवरोध आएगा, लेकिन भावे ने घोषणा की कि वह हृदय के बँटवारे की तुलना में ज़मीन के बँटवारे को ज़्यादा पसंद करते हैं। हालांकि बाद में उन्होंने लोगों को 'ग्रामदान' के लिए प्रोत्साहित किया, जिसमें ग्रामीण लोग अपनी भूमि को एक साथ मिलाने के बाद उसे सहकारी प्रणाली के अंतर्गत पुनर्गठित करते। आपके भूदान आन्दोलन से प्रेरित होकर हरदोई जनपद के सर्वोदय आश्रम टडियांवा द्वारा उत्तर प्रदेश के 25 जनपदों में श्री रमेश भाई के नेतृत्व में उसर भूमि सुधार कार्यक्रम सफलता पूर्वक चलाया गया।

Wednesday, May 29, 2019

सचिनदेव बर्मन : ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना

सचिनदेव बर्मन का जन्म वर्ष 1 अक्टूबर, 1906 में त्रिपुरा हुआ। उनके पिता जाने-माने सितारवादक और ध्रुपद गायक थे। बचपन के दिनों से ही सचिनदेव बर्मन का रुझान संगीत की ओर था और वे अपने पिता से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लिया करते थे। इसके साथ ही उन्होंने उस्ताद बादल खान और भीष्मदेव चट्टोपाध्याय से भी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली। 

अपने जीवन के शुरुआती दौर में सचिनदेव बर्मन ने रेडियो से प्रसारित पूर्वोतर लोक-संगीत के कार्यक्रमों में काम किया। वर्ष 1930 तक वे लोकगायक के रूप में अपनी पहचान बना चुके थे। 

वर्ष 1944 में संगीतकार बनने का सपना लिए सचिनदेव बर्मन मुंबई आ गए, जहां सबसे पहले उन्हें 1946 में फिल्मिस्तान की फिल्म ‘एट डेज’ में बतौर संगीतकार काम करने का मौका मिला, लेकिन इस फिल्म के जरिए वे कुछ खास पहचान नहीं बना पाए। 


इसके बाद 1947 में उनके संगीत से सजी फिल्म ‘दो भाई’ के पार्श्वगायिका गीता दत्त के गाए गीत ‘मेरा सुंदर सपना बीत गया…’ की कामयाबी के बाद वे कुछ हद तक संगीतकार अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए। 

सचिनदेव बर्मन ने करीब 3 दशक के सिने करियर में लगभग 90 फिल्मों के लिए संगीत दिया। उनके फिल्मी सफर पर नजर डालने पर पता लगता है कि उन्होंने सबसे ज्यादा फिल्में गीतकार साहिर लुधियानवी के साथ ही की हैं। 

1951 में फिल्म नौजवान के गीत ‘ठंडी हवाएं, लहरा के आए…’ के जरिए लोगों का मन मोहा। वर्ष 1951 में ही गुरुदत्त की पहली निर्देशित फिल्म ‘बाजी’ के गीत ‘तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना दे…’ में एस.डी. बर्मन और साहिर की जोड़ी ने संगीत प्रेमियों का दिल जीत लिया। 

एस.डी. बर्मन और साहिर लुधियानवी की सुपरहिट जोड़ी फिल्म ‘प्यासा’ के बाद अलग हो गई। एसडी बर्मन की जोड़ी गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी के साथ भी बहुत जमी। देवानंद की फिल्मों के लिए एसडी बर्मन ने सदाबहार संगीत दिया और उनकी फिल्मों को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बर्मन दा के पसंदीदा निर्माता-निर्देशकों में देवानंद के अलावा विमल राय, गुरुदत्त, ऋषिकेश मुखर्जी आदि प्रमुख रहे हैं। 

बर्मन दा की फिल्म जगत के किसी कलाकार या गायक के साथ शायद ही अनबन हुई हो, लेकिन 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘पेइंग गेस्ट’ के गाने ‘चांद फिर निकला…’ के बाद लता मंगेशकर और उन्होंने एकसाथ काम करना बंद कर दिया। दोनों ने लगभग 5 वर्ष तक एक-दूसरे के साथ काम नहीं किया। बाद में बर्मन दा के पुत्र आर.डी. बर्मन के कहने पर लता मंगेशकर ने बर्मन दा के संगीत निर्देशन में फिल्म ‘बंदिनी’ के लिए ‘मेरा गोरा अंग लई ले…’ गाना गाया। 

संगीत निर्देशन के अलावा बर्मन दा ने कई फिल्मों के लिए गाने भी गाए। इन फिल्मों में ‘सुन मेरे बंधु रे, सुन मेरे मितवा…’, ‘मेरे साजन है उस पार…’ और ‘अल्लाह मेघ दे छाया दे…’ जैसे गीत आज भी श्रोताओं को भाव-विभोर करते हैं। 

एस.डी. बर्मन को 2 बार फिल्म फेयर के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार से नवाजा गया है। एसडी बर्मन को सबसे पहले 1954 में प्रदर्शित फिल्म ‘टैक्सी ड्राइवर’ के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फिल्म फेयर पुरस्कार दिया गया। इसके बाद वर्ष 1973 में प्रदर्शित फिल्म ‘अभिमान’ के लिए भी वे सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के फिल्म फेयर पुरस्कार से नवाजे गए। 

फिल्म ‘मिली’ के संगीत ‘बड़ी सूनी-सूनी है…’ की रिकॉर्डिंग के दौरान एस.डी. बर्मन अचेतन अवस्था में चले गए। हिन्दी सिने जगत को अपने बेमिसाल संगीत से सराबोर करने वाले सचिन दा 31 अक्टूबर 1975 को इस दुनिया को अलविदा कह गए।

Tuesday, May 28, 2019

रुपिन दर्रा : उत्तरकाशी

रूपिन दर्रा भारत के हिमाचल प्रदेश राज्य में हिमालय पर्वत श्रृंखला के पार एक उच्च ऊंचाई वाला दर्रा है। यह एक पारंपरिक चरवाहा और लंबी पैदल यात्रा मार्ग पर स्थित है जो उत्तराखंड के धौला से शुरू होता है और हिमाचल प्रदेश के सांगला में समाप्त होता है। यह मार्ग समुद्र तल से 15,250 फीट (4,650 मीटर) की ऊँचाई पर हिमालय पर्वतमाला में ज्यादातर निर्जन क्षेत्रों में स्थित है। इस दर्रे पर सरस्वती ग्लेशियर की पहचान कुछ स्रोतों के रूप में की गई है| 


पिन दर्रा ट्रेक हर ट्रेकर के लिए जाने के लिए सबसे परमानंद और रमणीय ट्रेक में से एक है। यह 4650 मीटर की ऊंचाई पर एक उच्च ऊंचाई वाला ट्रेक है जो उत्तराखंड के धौला से शुरू होता है और हिमाचल प्रदेश के सांगला में समाप्त होता है। रूपिन दर्रा ट्रेक न केवल एक उच्च ऊंचाई वाला दर्रा है बल्कि यह सभी प्रकृति प्रेमियों के लिए किसी स्वर्गीय जगह से कम नहीं है। रुपिन दर्रा उन लोगों के लिए जो हिमालय में हर तरह की सैर का पूरा आनन्द लेना चाहते हैं| 

रूपिन पास ट्रेक की यात्रा करने का सबसे अच्छा समय मई, जून और सितंबर के महीनों के दौरान है। हालांकि वायुमंडलीय दबाव में थोड़ी सी भी बदलाव या हवा में बदलाव, रूपिन दर्रा ट्रेक के दौरान वर्षा या बर्फबारी ला सकता है| रूपिन में आप ऊंचे पहाड़ों के साथ–साथ झरने भी देख सकते है| 

निकटतम हवाई अड्डा जॉली ग्रांट हवाई अड्डा हैं यहाँ से रूपिन पास ट्रेक उत्तरकाशी की दूरी लगभग 129 किलोमीटर हैं| यहाँ से आप आसानी से टैक्सी अथवा से आसानी से जा सकते हैं| 

निकटतम रेलवे स्टेशन देहरादून रेलवे हैं यहाँ से रूपिन पास ट्रेक उत्तरकाशी की दूरी लगभग 116 किलोमीटर हैं| यहाँ से आप आसानी से टैक्सी अथवा से आसानी से जा सकते हैं|

Monday, May 27, 2019

अमीर ख़ुसरो जीवनी

अबुल हसन अमीर ख़ुसरु चौदहवीं सदी के आसपास दिल्ली के पास रहने वाले एक प्रमुख कवि (शायर), गायक और संगीतकार थे। खुसरो को हिन्दुस्तानी खड़ीबोली का पहला लोकप्रिय कवि माना जाता है। किसके द्वारा? वे अपनी पहेलियों और मुकरियों के लिए जाने जाते हैं। सबसे पहले उन्हीं ने अपनी भाषा को हिन्दवी का उल्लेख किया था। वे फारसी के कवि भी थे। उनको दिल्ली सल्तनत का आश्रय मिला हुआ था। उनके ग्रंथो की सूची लम्बी है। साथ ही इनका इतिहास स्रोत रूप में महत्त्व है। 


अमीर खुसरो ने स्वंय अपने गुरुओं के नामों का उल्लेख किया है जिनका उन्होंने अनुसरण किया है अथवा उनका प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रुप से इन पर प्रभाव पड़ा है। गज़ल के क्षेत्र में सादी, मसनवी के क्षेत्र में निज़ामी, सूफ़ी और नीति संबंधी काव्यक्षेत्र में खाकानी और सनाई एवं कसीदे के क्षेत्र में कमाल इस्माइल हैं। खुसरो की गज़लें तो भाव और कला की दृष्टि से इतनी उत्तम हैं कि बड़े-बड़े संगीतज्ञ उन्हें गा गा कर लोगों को आनंद विभोर करते थे। 

उनमें अनेक स्थलों पर उदात्त प्रेम के दर्शन होते हैं। इन सभी काव्यों में काव्य का मनोज्ञ रुप हमें दृष्टिगोचर होता है। खुसरो ने स्वयं अपनी कविता की अनेक स्थलों पर प्रशंसा की है। वे अपने दीवान गुर्रतुल कमाल ६९३ हिज्री। सन १२९३ ई. तीसरा दीवान ३४-४३ वर्ष, सबसे बड़ा दीवान, इसकी भूमिका काफ़ी बड़ी एवं विस्तृत है। इसमें खुसरो ने अपने जीवन संबंधी बहुत सी रोचक बातें दी हैं, कविता के गुण, अरबी से फ़ारसी कविता की श्रेष्ठता, भारत की फ़ारसी अन्य देशों के मुक़ाबले शुद्ध व श्रेष्ठ हैं, काव्य और छंदों के भेद आदि अनेक बातों पर प्रकाश डाला गया है। 
इस दीवान में व मसनवियाँ, बहुत सी रुबाइयाँ, कते, गज़लें, मरसिये, नता और कसीदे हैं। मसनवियों में मिफताहुल फ़तूह बहुत प्रसिद्ध है। मरसियों में खुसरो के बेटे तथा फ़ीरोज़ खिलजी के बड़े लड़के या साहबज़ादे महमूद ख़ानखाना के मरसिए उल्लेखनीय हैं। एक बड़ी नात है जो खाकानी से प्रभावित ज़रुर है पर अपना अनोखा व नया अंदाज लिए है। कसीदों में खुसरो का सबसे अधिक प्रसिद्ध क़सीदा 'दरियाए अबरार' (अच्छे लोगों की नदी) इसी में है। इसमें हज़रत निजामुद्दीन औलिया की तारीफ़ है। अन्य कसीदे जलालुद्दीन और अलाउद्दीन खिलजी से संबंधित है।

Sunday, May 26, 2019

लड़ाकू विमान उड़ाने वाली दूसरी महिला पायलट बनीं भावना कंठ

फ्लाइंग ऑफिसर भावना कंठ ने शुक्रवार को इतिहास में अपना नाम दर्ज करा लिया। वह भारतीय वायु सेना की दूसरी महिला पायलट है जिन्होंने लड़ाकू विमान अकेले उड़ाया है। भावना ने यह उड़ान भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमान मिग-21 'बाइसन' में अंबाला एयर फोर्स स्टेशन से भरी।

बिहार के दरभंगा की रहने वाली भावना कंठ ने कहा कि बचपन से ही उनका सपना एक आसमान में उड़ने का था और उसी के कारण उन्होंने भारतीय वायु सेना में भर्ती होने का फैसला लिया। भारतीय वायु सेना में सबसे बेहतरीन पायलट को फाइटर स्ट्रीम में जाने का मौका मिलता है। भावना का कहना है कि वह अपने देश के लिए लड़ना चाहती हैं और चाहती हैं कि उनके पैरंट्स को उन पर गर्व हो।

भावना से पहले इसी साल फरवरी में फ्लाइंग ऑफिसर अवनी चतुर्वेदी भारतीय वायु सेना की पहली महिला पायलट बनीं थीं जिन्होंने अकेले लड़ाकू विमान उड़ाया था। अवनी ने भी 19 फरवरी को मिग-21 'बाइसन' में जामनगर बेस से उड़ान भरी थी। गौरतलब है कि मिग-21 'बाइसन' दुनिया में सबसे तेज लैंडिंग और टेकऑफ के लिए जाना जाता है। यह 340 किलोमीटर प्रति घंटा की अधिकतम रफ्तार से लैंडिंग और टेकऑफ करता है।

भावना कंठ और अवनी चतुर्वेदी के अलावा मोहना सिंह भी भारतीय वायु सेना में फाइटर पायलट की ट्रेनिंग ले रही हैं। इन तीनों को ही बेसिक ट्रेनिंग के बाद जून 2016 में फाइटर स्ट्रीम में शामिल किया गया था। प्रायोगिक तौर पर इन तीनों महिला फाइटर पायलट को 5 साल के लिए वायु सेना की फाइटर स्ट्रीम में लिया गया है।

Thursday, May 23, 2019

लोक सभा

लोक सभा, भारतीय संसद का निचला सदन है। भारतीय संसद का ऊपरी सदन राज्य सभा है। लोक सभा सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर लोगों द्वारा प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों से गठित होती है। भारतीय संविधान के अनुसार सदन में सदस्यों की अधिकतम संख्या 552 तक हो सकती है, जिसमें से 530 सदस्य विभिन्न राज्यों का और 20 लोकसभा की कार्यावधि 5 वर्ष है परंतु इसे समय से पूर्व भंग किया जा सकता है।
प्रथम लोक सभा 1952 पहले आम चुनाव होने के बाद देश को अपनी पहली लोक सभा मिली। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस 260 सीटों के साथ जीत हासिल करके सत्ता में पहुँची। इसके साथ ही जवाहर लाल नेहरू भारत के पहले प्रधानमंत्री बने।
भारत के प्रत्येक राज्य को उसकी जनसंख्या के आधार पर लोकसभा-सदस्य मिलते है। वर्तमान मे यह 1971 की जनसंख्या पर आधारित है। अगली बार लोकसभा के सदस्यों की संख्या वर्ष 2026 मे निर्धारित किया जायेगा। इससे पहले प्रत्येक दशक की जनगणना के आधार पर सदस्य स्थान निर्धारित होते थे। यह कार्य बकायदा 84वें संविधान संशोधन(2001) से किया गया था ताकि राज्य अपनी आबादी के आधार पर ज्यादा से ज्यादा स्थान प्राप्त करने का प्रयास नही करें।

लोक सभा का कार्यकाल

यदि समय से पहले भंग ना किया जाये तो, लोक सभा का कार्यकाल अपनी पहली बैठक से लेकर अगले पाँच वर्ष तक होता है उसके बाद यह स्वत: भंग हो जाती है। लोक सभा के कार्यकाल के दौरान यदि [[आपातकाल की घोषणा] की जाती है तो संसद को इसका कार्यकाल कानून के द्वारा एक समय में अधिकतम एक वर्ष तक बढ़ाने का अधिकार है, जबकि आपातकाल की घोषणा समाप्त होने की स्थिति में इसे किसी भी परिस्थिति में छ: महीने से अधिक नहीं बढ़ाया जा सक। उत्तर प्रदेश में लोकसभा की सीटो की संख्या 80 होती है|

लोकसभा की विशेष शक्तियाँ

1.   मंत्री परिषद केवल लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है। अविश्वास प्रस्ताव सरकार के विरूद्ध केवल यहीं लाया जा सकता है।
2.   धन बिल पारित करने मे यह निर्णायक सदन है।
3.   राष्ट्रीय आपातकाल को जारी रखने वाला प्रस्ताव केवल लोकसभा मे लाया और पास किया जायेगा।

Wednesday, May 22, 2019

गेटवे ऑफ इंडिया

भारत के सबसे लोकप्रिय धरोहरों में से एक गेटवे ऑफ इंडिया वर्ष 1924 में निर्मित हुआ था और ये मुंबई, महाराष्ट्र में स्थित है| ये जगह दुनिया भर से पर्यटकों को बहुत आकर्षित करती है और देश के प्रमुख बंदरगाहों के लिए एक प्रमुख केंद्र के रूप में कार्य करती है| 

इस संरचना के निर्माण में भारत सरकार द्वारा नकद निवेश लगभग 21 लाख की राशि का हुआ था और आज की स्थिति के अनुसार ये जगह कई फोटोग्राफरों, विक्रेताओं और खाद्य विक्रेताओं को व्यवसाय के लिए एक ठेका मिल गयी है| ये जगह हमेशा पर्यटकों और सामान्य भीड़ से भरी होती है| 

गेटवे ऑफ इंडिया की संरचना के निर्माण के पीछे मुख्य उद्देश्य किंग जॉर्ज पंचम और बंबई (अब मुंबई) के क्वीन मैरी की यात्रा को स्वीकार करना था, आज यह भारत के सबसे महत्वपूर्ण स्मारकों में से एक के रूप में बना हुआ है, ये ताकत, शक्ति और शांति का चित्रण है| 


गेटवे ऑफ इंडिया दिसंबर 1911 में किंग जॉर्ज और रानी मैरी की मुंबईकी यात्रा को याद करने के उपलक्ष्य में बनाया गया था| गेटवे ऑफ इंडिया का निर्माण दिल्ली दरबार से पहले हुआ था| हालांकि किंग जॉर्ज और रानी मैरी संरचना का एक मॉडल ही देख पाए| 

क्योंकि इसका निर्माण तब तक शुरू नहीं किया था और इसका निर्माण असल में 1915 में शुरू हुआ| गेटवे ऑफ इंडिया की नींव 31 मार्च, 1911 को बंबई के राज्यपालसर जॉर्ज सिडेनहैम क्लार्क ने रखी थी| जॉर्ज विट्टेट ने 31 मार्च, 1914 को अंतिम डिजाइन पर मंजूरी दी थी| 

गेटवे ऑफ इंडिया पीले बेसाल्ट और कंक्रीट से बनाया गया था| 1915 और 1919 के बीच अपोलो बुंदर पर काम शुरू हुआ जहां पर गेटवे ऑफ इंडिया और नए समुद्री दीवार का निर्माण किया गया| गेटवे ऑफ इंडिया की नींव का काम 1920 में पूरा किया गया था और निर्माण 1924 में समाप्त हो गया था| गेटवे ऑफ इंडिया 4 दिसंबर, 1924 को वायसराय द्वारा खोला गया| 

गेटवे ऑफ इंडिया साल 1920 में भारत सरकार द्वारा बनाया गया था| गेटवे ऑफ इंडिया की इमारत का नक्शा एक प्रवेश द्वार यानी आगंतुकों के लिए समुद्री मार्ग से भारत आने के लिए एक प्रवेश द्वार था| गेटवे ऑफ इंडिया की नींव 31 मार्च 1911 को रखी गई थी| 

आश्चर्यजनक तथ्य यह है नींव के तीन साल बाद भारत सरकार ने गेटवे ऑफ इंडिया के डिजाइन को मंजूरी दी है| डिजाइन साल 1914 में जॉर्ज विट्टेट द्वारा दिया गया था| 

निर्माण की लागत राशि 21 लाख रुपये की थी जिसको भारत सरकार द्वारा दिया गया था| पीला बेसाल्ट और प्रबलित कंक्रीट सामग्री गेटवे के निर्माण में इस्तेमाल किये गए थे| केंद्रीय गुंबद का व्यास 15 मीटर है और यह जमीन के ऊपर 26 मीटर की ऊंचाई तक है| 

4 दिसंबर 1924 कोवायसराय, पढ़ना के अर्ल द्वारा उद्घाटन किया गया था| गेटवे के चार बुर्ज है और इसको जटिल जाली के साथ बनाया गया था| छत्रपति शिवाजी और स्वामी विवेकानंद की प्रतिमाए गेटवे पर बाद में स्थापित की गयी थी|

Monday, May 20, 2019

शून्य की खोज भारत में कब और कैसे हुई?

शून्य, कुछ भी नहीं या कुछ नहीं होने की अवधारणा का प्रतीक है| आजकल शून्य का प्रयोग एक सांख्यिकीय प्रतीक और एक अवधारणा दोनों के रूप में जटिल समीकरणों को सुलझाने में तथा गणना करने में किया जाता है| इसके साथ ही शून्य कंप्यूटर का मूल आधार भी है| यह आलेख भारत में शून्य के आविष्कार से संबंधित है अर्थात इस आलेख में इस बात का उल्लेख किया गया है कि भारत में शून्य का अविष्कार कैसे और कब हुआ था| 


यह कहना गलत नहीं होगा कि गणित में शून्य की अवधारणा का आविष्कार क्रांतिकारी था| शून्य कुछ भी नहीं या कुछ नहीं होने की अवधारणा का प्रतीक है| यह एक आम व्यक्ति को गणित में सक्षम होने की क्षमता पैदा करता है| इससे पहले, गणितज्ञों को सरल अंकगणितीय गणना करने के लिए संघर्ष करना पड़ता था| आजकल शून्य का प्रयोग एक सांख्यिकीय प्रतीक और एक अवधारणा दोनों के रूप में जटिल समीकरणों को सुलझाने में तथा गणना करने में किया जाता है| इसके साथ ही शून्य कंप्यूटर का मूल आधार भी है| 

भारत में शून्य पूरी तरह से पांचवीं शताब्दी के दौरान विकसित हुआ था| वास्तव में भारतीय उपमहाद्वीप में गणित में शून्य का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है| तीसरी या चौथी शताब्दी की बख्शाली पाण्डुलिपि में पहली बार शून्य दिखाई दिया था| ऐसा कहा जाता है कि 1881 में एक किसान ने पेशावर, जो की अब पाकिस्तान में है, के पास बख्शाली गांव में इस दस्तावेज से जुड़े पाठ को खोद कर निकाला था|
यह काफी जटिल दस्तावेज है क्योंकि यह सिर्फ दस्तावेज़ का एक टुकड़ा नहीं है, बल्कि इसमें बहुत से टुकड़े हैं जो कई शताब्दी पहले लिखे गए थे| रेडियोकार्बन डेटिंग तकनीक की मदद से, जोकि आयु निर्धारित करने के लिए कार्बनिक पदार्थों में कार्बन आइसोटोप की सामग्री को मापने की एक विधि है, से यह पता चलता है कि बख्शाली पांडुलिपि में कई ग्रंथ हैं| सबसे पुराना हिस्सा 224-383 ईस्वी का है, उससे नया हिस्सा 680-779 ईस्वी का है और सबसे नया हिस्सा 885- 993 ईस्वी का है| इस पांडुलिपि में सनौबर के पेड़ के 70 पत्ते और बिंदु के रूप में सैकड़ों शून्य को दिखाया गया है| 

उस समय ये डॉट्स संख्यात्मक रूप में शून्य नहीं थे, बल्कि 101, 1100 जैसे बड़े संख्याओं के निर्माण के लिए इसे स्थान निर्धारक अंक के रूप में इस्तेमाल किया गया था| पहले इन दस्तावेजों की सहायता से व्यापारियों को गणना करने में मदद मिलती थी| कुछ और प्राचीन संस्कृतियां हैं जोकि शून्य को स्थान निर्धारक अंक के रूप में इस्तेमाल करती थी जैसे कि बेबीलोन के लोग शून्य को दो पत्ते के रूप में इस्तेमाल करते थे, माया संस्कृति के लोगों ने इसे शैल की संख्या के रूप में इस्तेमाल करते थे| इसलिए, हम कह सकते हैं कि प्राचीन सभ्यताओं को “कुछ भी नहीं” की अवधारणा पता थी लेकिन उनके पास इसे दर्शाने के लिए कोई प्रतीक नहीं था| ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के अनुसार, भारत में ग्वालियर में नौवीं शताब्दी के एक मंदिर के शिलालेख में वर्णित शून्य को सबसे पुराने रिकॉर्ड के रूप में माना जाता है| 

शून्य भारत में संख्या पद्धति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है| यहां तक कि पहले गणितीय समीकरणों को कविता के रूप में गाया जाता था| आकाश और अंतरिक्ष जैसे शब्द “कुछ भी नहीं” अर्थात शून्य का प्रतिनिधित्व करते हैं| एक भारतीय विद्वान पिंगला ने द्विआधारी संख्या का इस्तेमाल किया और वह पहले थे जिन्होंने जीरो के लिए संस्कृत शब्द 'शून्य' का इस्तेमाल किया था| 

628 ईस्वी में ब्रह्मगुप्त नामक विद्वान और गणितज्ञ ने पहली बार शून्य और उसके सिद्धांतों को परिभाषित किया और इसके लिए एक प्रतीक विकसित किया जो कि संख्याओं के नीचे दिए गए एक डॉट के रूप में था| उन्होंने गणितीय संक्रियाओं अर्थात जोड़ और घटाव के लिए शून्य के प्रयोग से संबंधित नियम भी लिखे हैं| इसके बाद महान गणितज्ञ और खगोलविद आर्यभट्ट ने दशमलव प्रणाली में शून्य का इस्तेमाल किया था|

Saturday, May 18, 2019

थ्री-डी टेलीविज़न

आप अब तक केवल 3-डी फिल्मों और वीडियो गेम्स के बारे में ही सुना होगा लेकिन शायद आप नहीं जानते कि अब टीवी मोबाइल फोन और अखबार भी 3-डी आने लगे हैं जो विज्ञान की दुनिया में सचमुच एक करिश्मा है। 

पहले बात करते हैं 3-डी फिल्मों की। आमतौर पर फिल्में द्विआयामी या टू डाइमेंशनल होती है जिसमें चित्रों की केवल लंबाई और चौड़ाई ही दिखती है जबकि त्रिआयामी यानी 3-डी फिल्मों की लंबाई चौड़ाई के अलावा दृश्यों की गहराई भी दिखाई देती है। क्या आप जानते हैं कि विश्व की सबसे पहली 3-डी फिल्म कौन सी थी? अंग्रेजी भाषा में बनी इस फिल्म का नाम 'बी' वाना डेविल' था जो कि सन् 1952 में बनी थी। शुरूआती दौर में ये फिल्में दो कैमरों के प्रयोग से बनाई जाती थीं और इन्हें देखने के लिए एक विशेष प्रकार के चश्मे को लगाना पड़ता था। 


आजकल 3-डी फिल्मों की तकनीक में थोड़ा बदलाव आ गया है। अब ऐसी फिल्मों के निर्माण के लिए ऐनाग्लिफिक 3-डी तथा पोलेराइज्ड 3-डी नामक दो प्रणालियों का इस्तेमाल होता है। ऐग्नाग्लिफिक 3-डी प्रणाली के द्वारा केवल ब्लेक एंड व्हाइट फिल्में ही बनाई जा सकती हैं। इसमें दो प्रोजेक्टरों का इस्तेमाल होता है, एक पर लाल तथा दूसरे पर नीला फिल्टर लगा होता है। जब फिल्म देखना होता है तो बायी आंख पर लाल तथा दायी आंख पर नीले फिल्टर वाला चश्मा लगाना पड़ता है जिससे आंखों द्वारा देखे गए लाल और नीले प्रतिबिंब हमारे मस्तिष्क में श्याम और श्वेत त्रिआयामी प्रतिबिंब बनाते हैं। जबकि दूसरी प्रणाली पोलेराइज्ड 3-डी में प्रोजेक्टर तथा दर्शक द्वारा ध्रुवित यानी पोलेराइज्ड फिल्डर प्रयोग किए जाते हैं। जब प्रकाश फिल्टर से गुजरता है तो ध्रुवण के फलस्वरूप दो प्रतिबिंब अलग अलग हो जाते हैं। इन फिल्मों का रंग धूसर होता है। इसके माध्यम से सभी रंगों का त्रिआयामी फिल्में बनाई जाती हैं। हां, इस फिल्मों को दिखाने के लिए एल्यूमिनाइज्ड सिल्वर स्क्रीन नामक एक विशेष परदे का इस्तेमाल करना होता है। फिलहाल सिनेमाघरों तक सीमित थ्री-डी तकनीक टेलीविजन में नजर आएगी। 

सोनी पैनासॉनिक मित्सुबिशी जैसी नामी कंपनियों ने थ्री-डी टीवी बाजार में उतारने की तैयारी कर ली है। इन कंपनियों का दावा है कि मौजूदा हाई डेफिनिशन प्लाज्मा तकनीक से लैस टेलीविजन के 3-डी स्वरूप में सामने आने से टीवी क्रांति में नए युग की शुरूआत होगी। इसका लुत्फ उठाने के लिए आपको पुराना सेट हटाना पड़ेगा। इसके साथ सेट टॉप बॉक्स और थ्री-डी चश्मे की भी जरूरत पड़ेगी। इसमें दिखाने वाले कार्यक्रम कैमरे में एक साथ दो लैसों के जरिए शूट किए जाएंगे। इससे बाई और दाई आंख में अलग-अलग तस्वीरें नजर आएंगी। हमारा दिमाग दोनों तस्वीरों को जोड़कर त्रिविमीय तस्वीरें तैयार करेगा। 

दक्षिण कोरिया की कंपनी एलजी ने दुनिया का पहला 3-डी एलईडी टीवी बाजार में पेश किया है। एलएक्स 9500 नाम के इस 55 इंच के टीवी में 480 हट्र्ज का टू मोशन प्रोसेसर, वायरलेस एवी लिंक और एचडीएमआई 1.4 सपोर्ट भी है। अगर इसमें वीडियो कैमरा लगाया जाए तो इसमें वीडियो कॉन्फ्रेसिंग भी की जा सकती है। यह डीआईवी एक्स एमपी 3 एमपीओ और जेपीईजी फाइलों को सपोर्ट करता है। इसमें क्लियर वाइस टेक्नोलॉजी वाले वूफर्स लगे हैं। बेल्जियम में फ्रेंच भाषा में छपने वाले एक अखबार ने योरोप का पहला 3-डी त्रिआयामी अंक प्रकाशित कर प्रिंट मीडिया में एक क्रांतिकारी कदम बढ़ाया है। 

अखबार ला डार्नियर (डीएच) ने अपने इस विशेषांक के सभी फोटो और विज्ञान को 3-डी प्रारूप में प्रकाशित किया है। अखबार के इस विशेषांक को मोटे कागज से बने हुए चश्मे की मदद से देखा जा सकता है। ला डार्नियर के संपादक कहना है कि इस 3-डी अंक की लागत को देखते हुए इस तरह के और अंक छापे जाने की कोई योजना नहीं है। फ्रांस के विश्लेषकों ने अखबार के इस साहसिक कदम को सलाम किया है, लेकिन कहा है कि यह अभी यह पूरी तरह दोष रहित होने से काफी दूर है। सभी प्रतियों के साथ एक 3-डी चश्मा भी बांटा गया। बिना चश्मे के सभी विज्ञापन धुंधले दिख रहे थे। एक दिन पहले इसकी सूचना भी दी गई थी। 

चीन के ग्वांगजू इंस्टीटयूट ऑफ साइंस एंड टेक्नालॉजी के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा 3-डी ई-बुक तैयार किया है, जिसमें कहानी के कथानकों को आप जीवंत रूप में देख सकते हैं। इसके लिए आपको खासतौर पर बने कम्प्यूटर स्क्रीन वाले चश्मे पहनने पडेंगे। इससे न सिर्फ किताब का कंटेंट थ्री-डी यानी त्रिविमीय रूप में दिखेगा, बल्कि उसमें शामिल चित्र और कथानक भी बिल्कुल जीवंत स्वरूप में नजर आएंगे। ग्वांगजू इंस्टीटयूट के वैज्ञानिकों ने फिलहाल इस तकनीक के जरिए स्थानीय कथानकों के आधार पर दो ई-बुक्स बनाई है। इन किताबों में दहाड़ने वाले ड्रेगन, उड़ने वाले पात्र से नदी पहाड़ आदि शामिल है। वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्होंने पृथ्वी का अब तक का सबसे सूक्ष्म त्रिआयामी 3-डी मानचित्र तैयार किया है। यह मानचित्र इतना सूक्ष्म है कि नमक के एक दाने के आकार में ऐसे 1000 मानचित्र समा सकते हैं। 

कम्प्यूटर की दिग्गज कम्पनी आईवीएम के एक दल ने अनोखी तकनीक की मदद से यह मानचित्र तैयार किया है, जो पेंसिल की नोंक से एक लाख गुना छोटा है और इसका आकार 15 नैनोमीटर जितना है इसके बनाने में जहां कम जटिलताओं का सामना करना पड़ा है, वहीं इसकी लागत भी काफी कम आई है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस नई तकनीक के ईजाद होने से इलेक्ट्रानिक भविष्य की चिप तकनीक, औषधि विज्ञान, जीवन विज्ञान और ऑप्टो इलेक्ट्रानिक्स जैसे क्षेत्रों में नैनो उत्पाद के विकास को लेकर नया द्वार खुलेगा। इस 3-डी नक्शे का आकार 2211 माइक्रोमीटर हैं जिसे पॉलिमर पर लिखा गया है। नमक के एक दाने में ऐसे 1000 नक्शे समा सकते हैं।

Thursday, May 16, 2019

ग्रीनहाउस प्रभाव क्या है?


ग्रीनहाउस प्रभाव एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी ग्रह या उपग्रह के वातावरण में उपस्तिथि कुछ गैसें वातावरण के तापमान को अपेक्षाकृत अधिक बनाने में सहयता करतीं हैं| इन ग्रीनहाउस गैसों में कार्बन डाई आक्साइड, जल-वाष्प, मिथेन आदि गैस शामिल हैं| यदि ग्रीनहाउस प्रभाव नहीं होता तो शायद ही धरती पर जीवन होता|  अगर ग्रीनहाउस प्रभाव नहीं होता तो पृथ्वी का औसत तापमान -18° सेल्सियस होता न कि वर्तमान 15° सेल्सियस होता| धरती के वातावरण के तापमान को प्रभावित करने वाले बहुत से कारक हैं जिसमें से ग्रीनहाउस प्रभाव एक कारक है|

Wednesday, May 15, 2019

केन्द्रीय गृह मंत्रालय लिया ने भारतीय मूल के लोगों की “ब्लैक लिस्ट” को समाप्त करने का फैसला

केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने हाल ही में भारतीय मूल के लोगों के लिए “ब्लैक लिस्ट” को समाप्त करने का निर्णय लिया है। यह सूची भारतीय मिशन (विभिन्न देशों में मौजूद भारतीय दूतावास) के पास होती है। 


इस सूची में उन भारतीय मूल के लोगों के नाम शामिल होता हैं जो भारत में उत्पीड़न किये जाने का हवाला दे कर दूसरे देश में शरण मांगते हैं। इस प्रकार की शरण मांगने वाले भारतीय मूल के लोगों में सिख समुदाय के लोगों की अधिकता हैं।

इस सूची में शामिल लोगों को भारतीय मिशन (भारतीय दूतावास) द्वारा वीज़ा नहीं दिया जाता है। 

भारतीय मूल के वे लोग (तथा उनके परिवार के सदस्य) जिन्होंने किसी दूसरे देश में शरण ली है और उनका नाम “ब्लैक लिस्ट” में नहीं है, उन्हें निवास के देश के नागरिक की तरह ही भारत का वीज़ा मिलेगा। यदि उनका पिछले दो वर्षों का वीज़ा सामान्य है तो वे ओवरसीज सिटीजनशिप ऑफ़ इंडिया (OCI) कार्ड प्राप्त कर सकते हैं।
ओवरसीज सिटीजनशिप ऑफ़ इंडिया (OCI) कार्ड एक प्रवासी स्टेटस है, इससे भारतीय मूल के विदेशी नागरिक भारत में अनिश्चित काल तक रह सकता है तथा यहाँ पर कार्य कर सकता है।