Wednesday, July 31, 2019

अपोलो 11 मिशन के 50 साल पूरे, जानिए चंद्रमा की पहली यात्रा के बारे में सबकुछ

चांद पर अमेरिकी मिशन Apollo के 50 साल पूरे होने के मौके पर गूगल ने डूडल बनाया है। इस डूडल में Google ने एक एस्ट्रॉनॉट को चांद पर उतरता हुआ दिखाया है। इसके साथ ही डूडल पर एक प्ले का बटन है जिस पर क्लिक करने के बाद एक वीडियो के जरिए पूरे घटनाक्रम के बारे में जान सकेंगे। 16 जुलाई 1969 को लॉन्च अपोलो 11 चांद के लिए एक अमेरिकी मिशन था। 

अपोलो 11 का मिशन प्लान दो लोगों को चंद्र सतह पर लाने और उन्हें सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर वापस लाने का था। 

इस मिशन का उद्देश्य चांद की सतह पर लोगों को सुरक्षित तरीके से भेजना और उन्हें वापस लाना था। इस मिशन को 16 जुलाई 1969 में सुबह 8:32 बजे लॉन्च किया गया था। इस मिशन के तहत मिशन कमांडर Neil Armstrong, Edwin “Buzz” Aldrin और Michael Collins के चालक दल को भेजा गया था। जो सफलता पूवर्क चांद पर जाकर वापस लौटे थे। चंद्रमा की सतह पर सुरक्षित रूप से उतरने के बाद नील आर्मस्ट्रॉन्ग ने पहली बार अंतरिक्ष यान से बाहर कदम रखा था और वह चांद की सतह पर उतरने वाले पहले व्यक्ति थे। 


जिस लूनर मॉड्यूल से ये दोनों अंतरिक्ष यात्री अपोलो-11 से निकलकर चंद्रमा तक पहुंचे उसे 'द ईगल' नाम दिया गया था। 

ये दोनों अंतरिक्ष यात्री 21 घंटे 31 मिनट तक चंद्रमा पर रुके थे। एडविन एल्ड्रिन ने नील आर्मस्ट्रांग के 19 मिनट बाद चंद्रमा पर कदम रखा था। दोनों ने अंतरिक्ष यान पर 2 घंटे 15 मिनट बिताए थे। लेकिन आर्मस्ट्रांग और एडविन के लिए चंद्रमा तक पहुंचने का ये सफर आसान नहीं था। सबसे पहले दोनों अंतरिक्ष यात्रियों का पृथ्वी से रेडियो संपर्क टूट गया था। इसके बाद ऑनबोर्ड कम्प्यूटर में कई एरर कोड्स आने लगे थे। 

इतना ही नहीं, 'द ईगल' में ईंधन की कमी भी सामने आई थी। लेकिन नील आर्मस्ट्रांग और एडविन एल्ड्रिन दोनों ने मिलकर सफलतापूर्वक इन परेशानियों का सामना कर 20 जुलाई, 1969 को चंद्रमा पर लैंडिग की थी। 

नासा ने भी आज के दिन याद रखने के लिए इस अभियान का वीडियो शेयर किया है। अपोलो-11 मिशन में दुनियाभर के 40 हजार लोगों ने अपनी भूमिकाएं निभाई थीं। इनमें साइंटिस्ट, मजदूर और इंजीनियर जैसे कई सेक्टर के लोग शामिल थे।

जानिए छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन से जुड़ी बातें

भारत की शान वीर छत्रपति शिवाजी का असली नाम शिवाजी राजे भोसले था| उनका जन्म 19 फरवरी 1630 में शिवनेरी दुर्ग में हुआ था| शिवाजी के पिता शाहजी भोंसले एवं माता जिजाबाई ने देवी शिवाई का आशीर्वाद मान कर बालक का नाम शिवाजी रखा था| 

शिवाजी महाराज का नाम आते ही मन में सबसे पहले किसी निर्भीक मराठा योधा की क्षवि आती है जिसने गुर्रिल्ला युद्ध को नए आयाम दिया साथ ही साथ मुगलों से भी जमकर लोहा लिया|

शिवाजी में नेतृत्व कौशल के साथ जन्मजात योद्धा वाले सारे गुण थे, शिवाजी को भगवा शासन का प्रस्तावक भी कहा जा सकता है, हालांकि वह अपने दृष्टिकोण में अत्यंत धर्मनिरपेक्ष थे। उन्होंने नौसेना भी तैयार की थी| भारतीय नौसेना का उन्हें जनक माना जाता है|


1. शिवाजी की मदद से औरन्जेब ने जीता था बीजापुर
शिवाजी ने मुगलों के साथ शांतिपूर्ण संबंध बनाए रखा। हालांकि, दो राज्यों के बीच का बंधन तब प्रभावित हो गया जब उनके अधिकारीयों ने अहमदनगर और जुन्नर के मुगल साम्राज्य के क्षेत्रों पर छापा मारा था । जवाबी कार्रवाई में मुगलों ने भी शिवाजी के साम्राज्य पर छापा मारा।

2. वह एक पहाड़ी चूहे के रूप में जाना जाता था
अपने क्षेत्र की अच्छी जानकारी होने की वजह से शिवाजी अक्सर अपनी गुरिल्ला रणनीति के माध्यम से अपने दुश्मनों पर आश्चर्यजनक हमले करते थे यही वजह है कि उन्हें एक पहाड़ी चूहे के रूप में जाना जाता था।

शिवाजी कीअप्रैल 1680 को बीमार होने पर मृत्यु हो गई थी|

Monday, July 29, 2019

भारत की सबसे ऊंची मीनार : कुतुब मीनार


कुतुब मीनार लाल और बफ सेंड स्टोन से बनी भारत की सबसे ऊंची मीनार है।

13वीं शताब्‍दी में निर्मित यह भव्‍य मीनार राजधानी, दिल्‍ली में खड़ी है। इसका व्‍यास आधार पर 14.32 मीटर और 72.5 मीटर की ऊंचाई पर शीर्ष के पास लगभग 2.75 मीटर है। यह प्राचीन भारत की वास्‍तुकला का एक नगीना है।

इस संकुल में अन्‍य महत्‍वपूर्ण स्‍मारक हैं जैसे कि 1310 में निर्मित एक द्वार, अलाइ दरवाजा, कुवत उल इस्‍लाम मस्जिद; अलतमिश, अलाउद्दीन खिलजी तथा इमाम जामिन के मकबरे; अलाइ मीनार सात मीटर ऊंचा लोहे का स्‍तंभ आदि।


गुलाम राजवंश के कुतुब उद्दीन ऐबक ने ए. डी. 1199 में मीनार की नींव रखी थी और यह नमाज़ अदा करने की पुकार लगाने के लिए बनाई गई थी तथा इसकी पहली मंजिल बनाई गई थी, जिसके बाद उसके उत्तरवर्ती तथा दामाद शम्‍स उद्दीन इतुतमिश (ए डी 1211-36) ने तीन और मंजिलें इस पर जोड़ी। इसकी सभी मंजिलों के चारों ओर आगे बढ़े हुए छज्‍जे हैं जो मीनार को घेरते हैं तथा इन्‍हें पत्‍थर के ब्रेकेट से सहारा दिया गया है, जिन पर मधुमक्‍खी के छत्ते के समान सजावट है और यह सजावट पहली मंजिल पर अधिक स्‍पष्‍ट है।

कुवत उल इस्‍लाम मस्जिद मीनार के उत्तर - पूर्व ने स्थित है, जिसका निर्माण कुतुब उद्दीन ऐबक ने ए डी 1198 के दौरान कराया था। यह दिल्‍ली के सुल्‍तानों द्वारा निर्मित सबसे पुरानी ढह चुकी मस्जिद है। इसमें नक्‍काशी वाले खम्‍भों पर उठे आकार से घिरा हुआ एक आयातकार आंगन है और ये 27 हिन्‍दु तथा जैन मंदिरों के वास्‍तुकलात्‍मक सदस्‍य हैं, जिन्‍हें कुतुब उद्दीन ऐबक द्वारा नष्‍ट कर दिया गया था, जिसका विवरण मुख्‍य पूर्वी प्रवेश पर खोदे गए शिला लेख में मिलता है। आगे चलकर एक बड़ा अर्ध गोलाकार पर्दा खड़ा किया गया था और मस्जिद को बड़ा बनाया गया था। यह कार्य शम्‍स उद्दीन इतुतमिश ( ए डी 1210-35) द्वारा और अला उद्दीन खिलजी द्वारा किया गया था। इसके आंगन में स्थित लोहे का स्‍तंभ चौथी शताब्‍दी ए डी की ब्राह्मी लिपि में संस्‍कृत के शिला लेख दर्शाता है, जिसके अनुसार इस स्‍तंभ को विष्‍णु ध्‍वज (भगवान विष्‍णु के एक रूप) द्वारा स्‍थापित किया गया था और यह चंद्र नाम के शक्ति शाली राजा की स्‍मृति में विष्‍णु पद नामक पहाड़ी पर बनाया गया था। इस स्‍तंभ के ऊपरी सिरे में एक गहरी खांच दिखाई देती है जो संभव तया गरूड़ को इस पर लगाने के लिए थी।

इतुतमिश (1211-36 ए डी) का मकबरा ए डी 1235 में बनाया गया था। यह लाल सेंड स्‍टोन का बना हुआ सादा चौकोर कक्ष है, जिसमें ढेर सारे शिला लेख, ज्‍यामिति आकृतियां और अरबी पैटर्न में सारसेनिक शैली की लिखावटे प्रवेश तथा पूरे अंदरुनी हिस्‍से में दिखाई देती है। इसमें से कुछ नमूने इस प्रकार हैं: पहिए, झब्‍बे आदि हिन्‍दू डिज़ाइनों के अवशेष हैं।

अलाइ दरवाजा, कुवात उल्‍ल इस्‍माल मस्जिद के दक्षिण द्वार का निर्माण अला उद्ददीन खिलजी द्वारा ए एच 710 ( ए डी 1311) में कराया गया था, जैसा कि इस पर तराशे गए शिला लेख में दर्ज किया गया है। यह निर्माण और सजावट के इस्‍लामी सिद्धांतों के लागू करने वाली पहली इमारत है।

अलाइ मीनार, जो कुतुब मीनार के उत्तर में खड़ी हैं, का निर्माण अला उद्दीन खिलजी द्वारा इसे कुतुब मीनार से दुगने आकार का बनाने के इरादे से शुरू किया गया था। वह केवल पहली मंजिल पूरी करा सका, जो अब 25 मीटर की ऊंचाई की है। कुतुब के इस संकुल के अन्‍य अवशेषों में मदरसे, कब्रगाहें, मकबरें, मस्जिद और वास्‍तुकलात्‍मक सदस्‍य हैं।

यूनेस्‍को को भारत की इस सबसे ऊंची पत्‍थर की मीनार को विश्‍व विरासत घोषित किया है।

Tuesday, July 23, 2019

ऑस्कर पुरस्कार में जो मूर्ति दी जाती है वह किस महापुरुष की होती है?


किसी की नहीं| सन 1927 में ऐकेडमी ऑफ़ मोशन पिक्चर्स आर्ट्स ऐंड साइन्सिस की बैठक में जब ट्रोफ़ी के डिज़ाइन पर चर्चा हुई तो लॉस ऐन्जिलिस के कई कलाकारों से अपने अपने डिज़ाइन सामने रखने को कहा गया| और पसन्द की गई मूर्तिकार जॉर्ज स्टैनली की प्रतिमा| इसमें फ़िल्म की रील पर खड़े एक आदमी को हाथ में एक तलवार पकड़े दिखाया गया है|


1929 से अब तक दो हज़ार से ज़्यादा ऑस्कर ट्रोफ़ियां दी जा चुकी हैं| इनका निर्माण कार्य शिकागो की आर एस ओएन्स ऐंड कम्पनी के सुपुर्द है और उन्हे पचास प्रतिमाएं बनाने में तीन से चार सप्ताह का समय लगता है| शुरु में यह प्रतिमा तांबे की बनती थी क्योंकि विश्व युद्ध के दौरान धातु की कमी थी, लेकिन अब यह सोने का पानी चढ़े ब्रिटैनियम से बनती है| ऑस्कर ट्रोफ़ी तेरह इंच लम्बी होती है और इसका वज़न है आठ पाउन्ड|

Thursday, July 18, 2019

ऐसे कैसे लिखा जाता है इतिहास और यह है इसके अध्यन के स्रोत

हमे बचपन से ही इतिहास पढाया और सुनाया जाता है| ये कहना भी गलत नहीं होगा की यह हम सभी को बोरिंग सब्जेक्ट लगता था क्योकि इतिहास की घटनाओ की तारीखे याद करना बहुत मुश्किल होता है, अगर ध्यान से देखा जाये तो इतिहास एक रोचक सब्जेक्ट भी है| इसके जरिये हम अपने अतीत को समझते है और उससे कई तरह की चीजे सीखते भी है। 

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है की इतिहासकारों को इतने समय पहली घटी घटनाओ का कैसे पता चल जाता है? कैसे आज से 5000 साल पुरानी हड़प्पा सभ्यता के रहन सहन, पहनावे, धार्मिक जीवन, कृषि एवं पशुपालन, उद्योग-धंधे, व्यापार और पतन के बारे में इतिहासकार इतने सटीक दावे करते है? अगर नहीं, तो जानते है यह द्वारा.... 


इतिहास को जानने, समझे और इसका अध्ययन करने के लिए 2 प्रकार के स्त्रोतो का सहारा लिया जाता है – साहित्यिक और पुरातात्विक स्रोत| साहित्यिक स्रोतों से प्राचीन काल के सामाजिक जीवन, धार्मिक जीवन, रहन सेहन, सांस्कृतिक जीवन की जानकारी प्राप्त होती है| 

साहित्यिक स्रोत वह लिखित प्रमाण होते है जिनकी रचना उस काल में होती है जिसका अध्यन किया जा रहा हो| साहित्यिक स्त्रोतो में कई तरह की चीजे शामिल होती है जैसे मौलिक दस्तावेज, राजकीय रिकॉर्ड, पांडुलिपि, कविता, नाटक, संगीत, कला आदि| इतिहासकार इन्ही की मदद से उस काल या समय की जानकारी जुटाते है| उदहारण के तौर पर मोर्यकाल की जानकारी का सबसे अच्छा स्रोत कोटिल्य का अर्थशास्त्र माना जाता है| वही दक्षिण भारत के इतिहास को जानने का सर्वोतम स्रोत संगम साहित्य है| 

इतिहास के अध्यन के लिए पुरातात्विक स्रोतों का भी बहुत महत्व है| इनमे अभिलेख, सिक्के, मुहरों, स्तूपों, चट्टानों, स्मारक और भवनों, मूर्तियों, चित्रकला और अन्य अवशेषों को रखा जाता है| हड़प्पा सभ्यता की जानकरी हमें पुरातात्विक स्रोतों से प्राप्त होती है| मोहें-जो-दड़ो से प्राप्त मुहरो के आधार पर ही इतिहासकारों ने हड़प्पा सभ्यता के धर्मिक जीवन पर प्रकाश डाला| इसी तरह कई तरह के स्मारकों से जहा उस समय की जीवन शैली का ज्ञान होता है वही उनके निर्माता के बारे में भी सूचनाये मिल जाती है|

Saturday, July 13, 2019

कविताओं में एक से नजर आने वाले सागर और समंदर में क्या फर्क होता है?

मशहूर गीतकार आनंद बख्शी के सालों पहले लोकप्रिय हुए एक गीत के बोल हैं, ‘सात समंदर पार से, गुड़ियों के बाजार से… अच्छी सी गुड़िया लाना... पप्पा जल्दी आ जाना’ यहां बख्शी साब ने एक बच्ची की मासूम-सी इच्छा बोलों में पिरोई है और जाहिर है कि एक कवि जब बच्चे की कल्पना में कुछ बोलेगा तो सात समुंदर क्या, उसके पिता को सात आसमान भी पार करा सकता है! 

लेकिन हकीकत समझें तो सात तो बहुत ही बड़ी बात है, एक भी समंदर पार कर पाना किसी के बस की बात नहीं, फिर चाहे आने वाला किसी का भी पप्पा क्यों न हो! 

हां, अगर कोई समुद्र पार करने की बात कहे तो वह जरूर हो सकता है| अब यहां पर अचानक ही एक सवाल जेहन में आ जाता है कि समुद्र (सागर) और समंदर (महासागर) क्या अलग-अलग हैं| 


सागर महासागरों से छोटे होते हैं| समुद्र या सागर असल में महासागर का वह हिस्सा होता है जो आंशिक रूप से जमीन से जुड़ा होता है| कई सागरों को खुद में समाने वाले महासागर, खारे पानी का एक बहुत बड़ा जल क्षेत्र होते हैं| 

वैसे तो धरती पर पांच अलग-अलग महासागर बताए जाते हैं| लेकिन ये सभी आपस में जुड़े हुए हैं और धरती का लगभग तीन चौथाई हिस्सा घेरे हुए हैं| इन्हीं की बदौलत धरती पर अलग-अलग मौसम और जीवन संभव हो पाता है| इस तरह धरती का 71% हिस्सा घेरने वाले इन महासागरों में इस ग्रह पर मौजूद पानी का करीब 97% हिस्सा है| 

सागर और महासागर में एक बड़ा अंतर यह होता है कि महासागर, सागरों से कहीं ज्यादा गहरे होते हैं| सागर के तल की गहराई नापी जा सकती है जबकि महासागर की वास्तविक गहराई नाप पाना बहुत मुश्किल है| 

जहाँ समुद्रो में प्रयोगों के लिए पहुँचा जा सकता है, महासागरो में ऐसे कामो के लिए पहुचना कठिन होता है| महासागर ही ऐसा स्थान होता है जहाँ समुद्र अपने पानी को खाली करते है, जबकि महासागर अपने पानी की निकासी नहीं खोजते| समुद्र जो की भूमि के निकट होते है महासागरो की तुलना में कम गहरे होते है और इस कारण पौधे और जीव जंतुओ के लिए यहाँ फलना फूलना संभव होता है क्योकि ये आमतौर पर रोशनी से प्रकाशित होते है| जबकि महासागर जो की बहुत गहरे होते है यहाँ समुद्री जीवन का बचा रहना मुश्किल होता है क्योकि यहाँ रोशनी नहीं पहुँच पाती और दबाव भी अधिक होता है|

एक बार फिर से आकार पर लौटें तो सबसे बड़े महासागर, प्रशांत महासागर (पैसेफिक ओशन) का विस्तार करीब 6,41, 86,000 वर्ग मील तक फैला हुआ है जबकि सबसे बड़े सागर, भूमध्य सागर (मेडिटरेनियन सी) का क्षेत्रफल लगभग 11, 44,800 वर्ग मील है| आंकड़ों पर ही थोड़ा और गौर करें तो पता चलता है कि दुनिया का सबसे छोटा महासागर, आर्कटिक ओशन (54,27,000 वर्ग मील) भी सबसे बड़े सागर से करीब पांच गुना बड़ा है| लगे हाथ हिंद महासागर की भी बात करते चलें तो इसका विस्तार करीब 2,64,69,900 वर्ग मील तक है| 

अब तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, प्रशांत महासागर का सबसे गहरा क्षेत्र मारिआना ट्रेंच है जिसकी गहराई करीब 36,200 फीट मापी गई है, लेकिन वैज्ञानिक इसे प्रशांत महासागर की अधिकतम गहराई नहीं मानते| वहीं सबसे गहरे समुद्र, कैरेबियन सागर की गहराई करीब 22,788 फीट बताई जाती है| औसतन महासागरों की गहराई करीब 3,953 फीट से 15,215 फीट के बीच होती है|





Tuesday, July 2, 2019

प्रधानमंत्री आवास योजना

प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के तहत कमजोर आय वर्ग (ईडब्ल्यूएस या EWS) और लोअर इनकम ग्रुप (एलआईजी या LIG) को मिलने वाली क्रेडिट लिंक्ड सब्सिडी स्कीम (ब्याज सब्सिडी) का फायदा अगले साल तक उठाया जा सकता है| 

दरअसल सरकार ने PMAY को 31 मार्च 2020 तक बढ़ा दिया है| PMAY के तहत पहला घर बनाने या खरीदने के लिए होम लोन (Home Loan) पर ब्याज सब्सिडी का फायदा उठाया जा सकता है| होम लोन (Home Loan) के ब्याज पर 2.60 लाख रुपये का फायदा कमजोर आय वर्ग के लोग उठा सकते हैं| में खत्म हो रही थी| 


जिन लोगों की आमदनी तीन लाख रुपये सालाना से कम है वे EWS कैटेगरी में आते हैं| छह लाख रुपये सालाना तक कमाने वाले लोग LIG में आते हैं| इन दोनों कैटेगरी में PMAY के तहत छह लाख रुपये तक के लोन पर 6.5 फीसदी तक ब्याज सब्सिडी का फायदा उठाया जा सकता है| 

मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजना सबके लिए घर-2022 के तहत सरकार ने CLSS शुरू की थी| बाद में इसे बढ़ाकर छह लाख से 12 लाख रुपये सालाना और 12 से 18 लाख रुपये सालाना तक की आमदनी वाले लोगों तक भी कर दिया गया था| 

क्रेडिट लिंक्ड सब्सिडी स्कीम (CLSS) में मध्यम आय वर्ग के ऐसे लोगों को जिनकी सालाना आय 6 लाख से 12 लाख रुपए के बीच है, उन्हें 9 लाख रुपये के 20 साल अवधि वाले होम लोन (Home Loan) पर 4 फीसदी की ब्याज सब्सिडी मिलेगी| 

मसलन होम लोन (Home Loan) पर ब्याज की दर 9 फीसदी है तो आपको PMAY के तहत यह 5 फीसदी ही चुकानी होगी| 12 लाख से 18 लाख रुपये की सालाना आय वाले लोगों को 4 फीसदी की ब्याज सब्सिडी मिलेगी| 
बैंक, हाउसिंग फाइनेंस कंपनी, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, स्माल फाइनेंस बैंक और बहुत से संस्थान इस योजना का लाभ ग्राहकों को उपलब्ध करा रहे हैं| नेशनल हाउसिंग बैंक (NHB) और हुडको (HUDCO) भी इस योजना में शामिल हैं|